धार्मिक आंदोलन (बौद्ध, जैन, आजीवक)
मुख्य तथ्य
- श्रमण आंदोलन ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के मध्य में उभरे, जब नगर, महाजनपद, व्यापारिक समूह और वैदिक यज्ञ पर बहसें उत्तर भारत को बदल रही थीं।
- गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) — शाक्यमुनि को लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर के क्रम से समझना चाहिए, केवल सामान्य जीवन-परिचय से नहीं।
- बौद्ध सिद्धांत में चार आर्य सत्य एवं आर्य अष्टांगिक मार्ग के साथ अनित्य, अनात्म, दुख, संघ और त्रिपिटक साहित्य जुड़े हैं।
- जैन परंपरा में पार्श्वनाथ के चार व्रत और महावीर के पांच महाव्रत अलग रखने होते हैं, फिर त्रिरत्न, अनेकांतवाद और स्यादवाद को तप-नीति से जोड़ना होता है।
- आजीवक परंपरा बुद्ध और जैन परंपराओं से मक्खलि गोसाल के नियति-सिद्धांत, यानी कठोर नियतिवाद, से अलग होती है।
मुख्य बिंदु
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श्रमण आंदोलन ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के मध्य में उभरे, जब नगर, महाजनपद, व्यापारिक समूह और वैदिक यज्ञ पर बहसें उत्तर भारत को बदल रही थीं।
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गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) — शाक्यमुनि को लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर के क्रम से समझना चाहिए, केवल सामान्य जीवन-परिचय से नहीं।
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बौद्ध सिद्धांत में चार आर्य सत्य एवं आर्य अष्टांगिक मार्ग के साथ अनित्य, अनात्म, दुख, संघ और त्रिपिटक साहित्य जुड़े हैं।
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जैन परंपरा में पार्श्वनाथ के चार व्रत और महावीर के पांच महाव्रत अलग रखने होते हैं, फिर त्रिरत्न, अनेकांतवाद और स्यादवाद को तप-नीति से जोड़ना होता है।
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आजीवक परंपरा बुद्ध और जैन परंपराओं से मक्खलि गोसाल के नियति-सिद्धांत, यानी कठोर नियतिवाद, से अलग होती है।
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राजस्थान ठोस स्थल-आधार देता है: जयपुर के निकट बैराट-विराटनगर के बौद्ध अवशेष और दिलवाड़ा व रणकपुर की जैन कला-पंक्ति।
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संगीति और संप्रदाय प्रश्नों में राजगृह-अजातशत्रु, कश्मीर-कनिष्क, भद्रबाहु-दिगंबर और स्थूलभद्र-श्वेतांबर युग्म निर्णायक होते हैं।
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कला-प्रश्नों में अमूर्त बौद्ध प्रतीक, स्तूप में अवशेष-परंपरा, मथुरा-गांधार प्रतिमाएँ और थेरवाद, महायान, वज्रयान का भेद बार-बार आता है।
बौद्ध, जैन और आजीवक आंदोलन किस श्रमण पृष्ठभूमि से निकले?
बौद्ध, जैन और आजीवक आंदोलन ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के मध्य में गंगा-घाटी के नगरों, बहसों, व्यापार और वैदिक कर्मकांड से असंतोष वाले व्यापक श्रमण संसार से निकले। बौद्ध, जैन और आजीवक धार्मिक आंदोलन ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के मध्य के व्यापक श्रमण संसार से जुड़े थे।
एएसआई जयपुर सर्किल के अनुसार बैराट या प्राचीन विराटनगर में दो अशोक अभिलेख मिले हैं, इसलिए राजस्थान भी इस श्रमण और मौर्यकालीन बौद्ध प्रसार के प्रमाण-मानचित्र में साफ़ दिखता है।
सामाजिक पृष्ठभूमि
- गंगा-घाटी के नगर, आहत सिक्के, व्यापारिक मार्ग, गहपति गृहस्थ और नए महाजनपद ऐसे श्रोता पैदा कर रहे थे जो केवल वंशानुगत यज्ञ-विशेषज्ञों पर निर्भर नहीं थे।
- ऋग्वैदिक यज्ञ महत्वपूर्ण रहा, पर अनेक भ्रमणशील आचार्यों ने पूछा कि जन्म, कर्मकांड और पुरोहित-मध्यस्थता दुख, पुनर्जन्म और मुक्ति को पूरी तरह कैसे समझा सकती है।
- बौद्ध ग्रंथों में अनेक वाद-विवाद समूह मिलते हैं; एनसीईआरटी में ६४ संप्रदायों या विचार-शालाओं का संकेत है।
अलग उत्तर
| परंपरा | श्रमण संसार में स्थिति | मुख्य कथन |
|---|---|---|
| महावीर और गौतम बुद्ध | इसी घने परिवेश में वैदिक अधिकार को चुनौती दी, अनुशासित आचरण पर बल दिया और अनेक सामाजिक समूहों के लिए संघीय मार्ग खोले | अनुशासित आचरण और संघीय मार्ग |
| आजीवक | इसी भ्रमणशील और विवाद-प्रधान संसार में थे | बंधन को नैतिक कोशिश की जगह नियति से समझाया |
राजस्थान संबंध
- राजस्थान इस मानचित्र से बाहर नहीं है।
- जयपुर के निकट बैराट या प्राचीन विराटनगर, मत्स्यदेश की राजधानी, अशोक अभिलेखों और मौर्यकालीन बौद्ध अवशेषों को सुरक्षित रखता है।
- यह स्थल दिखाता है कि बौद्ध धर्म प्रारंभिक ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी किनारे तक पहुँचा।
समाज पहले क्यों
- विषय जीवनी से पहले समाज से शुरू होता है।
- नगरीय परिवर्तन ने आश्रयदाता दिए।
- राजदरबारों ने संरक्षण दिया।
- व्यापारियों ने दान दिया।
- विहारों ने स्थायी संस्था दी।
- बौद्ध, जैन और आजीवक विचार एक ही दबाव के अलग उत्तर थे: जब कर्मकांडीय जन्म-क्रम पूरे नैतिक जगत को नहीं समझाता, तब मनुष्य को कैसे जीना चाहिए।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 MCQ छठी शताब्दी ईसा पूर्व के एक आचार्य से लुंबिनी, शाक्य कुल, बोधगया में ज्ञान और सारनाथ में उपदेश जुड़े हैं। सही पहचान कौन-सी है?
व्याख्या
लुंबिनी-शाक्य-बोधगया-सारनाथ क्रम बुद्ध के जीवन से जुड़ा है। महावीर कुंडग्राम और जैन व्रतों से, मक्खलि गोसाल नियति से, और नागार्जुन दूसरी शताब्दी ईस्वी के माध्यमक विचार से जुड़े हैं।
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