प्राचीन भारत में कला, स्थापत्य एवं विज्ञान
मुख्य तथ्य
- परिपक्व हड़प्पाई भौतिक संस्कृति में कांस्य ढलाई, स्टेटाइट मुहरें, मानकीकृत बाट और 1:2:4 अनुपात वाली पकी ईंटें साथ मिलती हैं।
- मोहनजोदड़ो की नर्तकी लगभग 2500 ईसा पूर्व की 10.5 सेमी कांस्य प्रतिमा है, जो लुप्त-मोम विधि से बनाई गई थी।
- ब्रह्मगुप्त ने भीनमाल में कार्य किया और 628 ई. में ब्रह्मस्फुटसिद्धांत लिखकर शून्य तथा ऋणात्मक संख्याओं के नियम व्यवस्थित किए।
- दिलवाड़ा का विमल वसही मंदिर 1031 ई. में पश्चिमी भारतीय नागर परंपरा की मारु-गुर्जर संगमरमर अभिव्यक्ति को दिखाता है।
मुख्य बिंदु
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परिपक्व हड़प्पाई भौतिक संस्कृति में कांस्य ढलाई, स्टेटाइट मुहरें, मानकीकृत बाट और 1:2:4 अनुपात वाली पकी ईंटें साथ मिलती हैं।
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मोहनजोदड़ो की नर्तकी लगभग 2500 ईसा पूर्व की 10.5 सेमी कांस्य प्रतिमा है, जो लुप्त-मोम विधि से बनाई गई थी।
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हनुमानगढ़ का कालीबंगा पूर्व-हड़प्पाई जुते हुए खेत और अग्नि-वेदियों से राजस्थान को हड़प्पाई कृषि से जोड़ता है।
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अशोक के अभिलेखों ने ब्राह्मी, खरोष्ठी और यूनानी-अरामाइक रूपों के सहारे पत्थर को साम्राज्य-व्यापी संचार माध्यम बनाया।
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सारनाथ सिंह शीर्ष चूनार बलुआ पत्थर पर मौर्य पॉलिश में तराशा गया और आगे चलकर भारत के राजचिह्न का आधार बना।
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जयपुर जिले का बैराठ भाब्रू लघु शिलालेख और वृत्ताकार बौद्ध स्थापत्य अवशेषों से राजस्थान की अशोककालीन-बौद्ध कड़ी दिखाता है।
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ब्रह्मगुप्त ने भीनमाल में कार्य किया और 628 ई. में ब्रह्मस्फुटसिद्धांत लिखकर शून्य तथा ऋणात्मक संख्याओं के नियम व्यवस्थित किए।
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दिलवाड़ा का विमल वसही मंदिर 1031 ई. में पश्चिमी भारतीय नागर परंपरा की मारु-गुर्जर संगमरमर अभिव्यक्ति को दिखाता है।
सिंधु घाटी कला और पूर्व-मौर्य भौतिक आधार क्या दिखाते हैं?
सिंधु घाटी कला और पूर्व-मौर्य भौतिक आधार क्या दिखाते हैं?
सिंधु घाटी कला और पूर्व-मौर्य भौतिक आधार बताते हैं कि मौर्य कला से बहुत पहले उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप में मानकीकृत शहरी शिल्प, धातु-कला, मुहर-निर्माण, कृषि-साक्ष्य और लंबी दूरी के विनिमय की परिपक्व परंपरा बन चुकी थी। ३३०० से १३०० ईसा पूर्व के बीच, और विशेषकर २६००-१९०० ईसा पूर्व के परिपक्व हड़प्पाई चरण में, उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप ने ऐसी नगरीय भौतिक संस्कृति विकसित की जिसमें कांस्य ढलाई, टेराकोटा प्रतिमाएं, स्टेटाइट नक्काशी, स्वर्ण-शंख आभूषण, मानकीकृत मुहरें, बाट और ईंटें एक संयुक्त शिल्प अनुशासन दिखाती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उत्खनन-रिपोर्ट सूची में कालीबंगा हड़प्पाई उत्खनन को १९६०-१९६९ के दो भागों में दर्ज किया गया है।
प्रमुख हड़प्पाई वस्तुएं और मानक
| वस्तु / प्रणाली | सामग्री / माप | तिथि / पैमाना | स्थान / संकेत |
|---|---|---|---|
| मोहनजोदड़ो की नर्तकी | कांस्य प्रतिमा, लुप्त-मोम विधि से ढली | लगभग २५०० ईसा पूर्व; १०.५ सेमी ऊंची | आज नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित |
| पुरोहित-राजा बस्ट | स्टेटाइट; तिपतिया अलंकरण वाली चादर | १७.५ सेमी ऊंचा | हड़प्पाई उच्चवर्गीय अभिरुचि का संकेत |
| मानकीकृत घनाकार चर्ट बाट | चर्ट बाट | १, २, ४, ८, १६ अनुपात | सुव्यवस्थित शहरी संसार का प्रमाण |
| पकी ईंटें | ईंट-अनुपात | १:२:४ अनुपात | साझा शहरी अनुशासन का संकेत |
- इन वस्तुओं का महत्व केवल संग्रहालयीय दुर्लभता में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि इनके पीछे मानकीकृत बाट और ईंटों वाला एक सुव्यवस्थित शहरी संसार मौजूद था।
- यही संगठनात्मक अनुशासन मुहरों की दुनिया में भी दिखता है।
मुहरें और प्रतीक-भाषा
- पशुपति मुहर ४००० से अधिक प्रकाशित सिंधु मुहरों में से एक है।
- इसमें बीच में सींगधारी आकृति और उसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा तथा भैंसे को दिखाया गया है।
- जॉन मार्शल ने १९३१ में इसे आद्य-शिव रूप में पढ़ा।
- बाद के विद्वानों ने शामनिक अथवा भैंसा-केंद्रित व्याख्याएं भी दी हैं।
- इसलिए इसे स्थिर धर्मसिद्धांत की बजाय जटिल प्रतीक-भाषा के प्रमाण के रूप में पढ़ना अधिक सुरक्षित है।
| तकनीकी पक्ष | तथ्य |
|---|---|
| सामग्री | अधिकांश मुहरें स्टेटाइट की हैं |
| लिपि | अब भी अपठित है |
| चिह्न-समूह | लगभग ४०० चिह्नों का समूह माना जाता है |
| सबसे अधिक मिलने वाला रूपांक | एक-सींग वाले पशु और आगे रखी पात्र-जैसी आकृति वाला रूपांक |
विनिमय, कार्यशालाएं और घरेलू शिल्प
- मुहरें, मनके, शंख आभूषण और मानकीकृत माप बताते हैं कि हड़प्पाई नगरों के बीच लंबी दूरी का विनिमय था।
- अलग-अलग कार्यशालाएं साझा मानकों के भीतर काम कर सकती थीं।
- सूक्ष्म मनका-छिद्रण, फैयांस परिष्कार और धातु ढलाई को बाद की भारतीय शिल्प परंपराओं की तकनीकी पूर्वपीठिका की तरह पढ़ना चाहिए।
- टेराकोटा खिलौने, चूड़ियां और घरेलू पात्र दिखाते हैं कि हड़प्पाई कला केवल अभिजात वस्तुओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में भी रूप और शिल्प की पुनरावृत्ति मौजूद थी।
राजस्थान आधार: कालीबंगा
| स्थल | वर्तमान स्थान | उत्खनन / तिथि | प्रमुख साक्ष्य | महत्व |
|---|---|---|---|---|
| कालीबंगा | हनुमानगढ़, राजस्थान | १९६० से १९६९ तक बी.बी. लाल और उनके सहयोगियों के उत्खनन | लगभग २८०० ईसा पूर्व का पूर्व-हड़प्पाई जुता हुआ खेत, अनुष्ठानिक चबूतरों पर अग्नि-वेदिकाएं और छोटी स्टेटाइट मुहरें | घग्घर क्षेत्र को व्यापक हड़प्पाई नगरीय नेटवर्क से जोड़ता है |
| लोथल | गुजरात | हड़प्पाई परिदृश्य | ज्वारीय गोदी | विनिमय और समुद्री आयाम का उदाहरण |
| धोलावीरा | कच्छ | हड़प्पाई परिदृश्य | पत्थर-बद्ध जलाशय | जल-प्रबंधन का उदाहरण |
- जुता हुआ खेत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां कृषि केवल अनुमान नहीं बल्कि प्रत्यक्ष पुरातात्विक साक्ष्य बन जाती है।
- अग्नि-वेदिकाएं नगर जीवन में अनुष्ठान की भूमिका पर बहस को जीवित रखती हैं।
- कालीबंगा आरएएस अभ्यर्थी के लिए ऐसा स्थानीय पुरातात्विक आधार देता है जो घग्घर क्षेत्र को व्यापक हड़प्पाई नगरीय नेटवर्क से जोड़ता है।
पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व की ओर संक्रमण
| सांस्कृतिक क्षितिज | काल | विशेषता | स्थल / फैलाव |
|---|---|---|---|
| चित्रित धूसर मृद्भांड | लगभग १२००-६०० ईसा पूर्व | पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के संदर्भों में मिलता है | उत्तर भारतीय संदर्भ |
| उत्तरी काला पॉलिश युक्त मृद्भांड | लगभग ७००-२०० ईसा पूर्व | प्रारंभिक नगरीकरण से जुड़ा अत्यंत चमकीला विलासी मृद्भांड | हस्तिनापुर, कौशांबी, राजघाट, अतरंजीखेड़ा और बैराठ (विराटनगर, जयपुर) |
- पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में यह परंपरा शून्य में नहीं बदलती।
- राजस्थान का यह सूत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बाद में बैराठ में अशोक का भाब्रू शिलालेख मिलता है।
- इस क्रम में हड़प्पाई कांस्य, मुहर-निर्माण, बाट, ईंट-अनुपात, कालीबंगा की कृषि और उत्तरी काला पॉलिश युक्त मृद्भांड की चमक आगे चलकर सारनाथ सिंह शीर्ष और मेहरौली लौह स्तंभ जैसी उपलब्धियों के नीचे मौजूद भौतिक आधार तैयार करती है।
- अशोककालीन शिल्पियों ने शून्य से शुरुआत नहीं की थी।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 MCQ वर्तमान राजस्थान में कौन-सा सिंधु स्थल पूर्व-हड़प्पाई जुते हुए खेत, बी.बी. लाल के 1960-69 उत्खनन, अग्नि-वेदिकाओं और छोटी स्टेटाइट मुहरों से जुड़ा है?
व्याख्या
कालीबंगा सही है क्योंकि यह राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित है और यहां 1960-69 के बीच बी.बी. लाल तथा उनके सहयोगियों ने उत्खनन किया था। यह स्थल पूर्व-हड़प्पाई जुते हुए खेत, अनुष्ठानिक मंचों पर अग्नि-वेदिकाओं और हड़प्पाई मुहरों के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए संकेत कृषि, अनुष्ठान और पुरातत्व को एक साथ जोड़ता है। लोथल आकर्षक विकल्प लगता है क्योंकि वह भी प्रमुख हड़प्पाई स्थल है, पर वह गुजरात में है और ज्वारीय गोदी के लिए जाना जाता है। धोलावीरा भी गुजरात के कच्छ में है और अपने पत्थर-बद्ध जलाशयों तथा जल-प्रबंधन के लिए प्रसिद्ध है। मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध में है, राजस्थान में नहीं।
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