औद्योगिक विकास एवं आर्थिक सुधार
मुख्य तथ्य
- भारत में औद्योगिक सुधार 1991 के बाद अनुमति-आधारित क्षमता नियंत्रण से प्रतिस्पर्धा, बाजार पहुंच और विनियमित निजी भागीदारी की ओर बढ़े।
- नई औद्योगिक नीति 1991 ने लाइसेंसिंग घटाई और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बदली, पर अवसंरचना, ऋण और अनुबंध-प्रवर्तन निर्णायक सीमाएं रहे।
- विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन में हिस्सा वित्त वर्ष 2023-24 लगभग 17 प्रतिशत पट्टी में रहा, जिससे लक्ष्य और परिणाम का अंतर दिखता है।
- पीएलआई और मेक इन इंडिया 2.0 क्षेत्र-विशिष्ट प्रोत्साहन देते हैं, जबकि एनआईपी, एनएमपी और पीएम गति शक्ति अवसंरचना बाधाएं घटाते हैं।
- राजस्थान का औद्योगिक आधार रीको क्षेत्रों, भिवाड़ी-नीमराणा-खुशखेड़ा, डीएमआईसी, भीलवाड़ा वस्त्र और राइजिंग राजस्थान 2024 से जुड़ता है।
मुख्य बिंदु
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भारत में औद्योगिक सुधार 1991 के बाद अनुमति-आधारित क्षमता नियंत्रण से प्रतिस्पर्धा, बाजार पहुंच और विनियमित निजी भागीदारी की ओर बढ़े।
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नई औद्योगिक नीति 1991 ने लाइसेंसिंग घटाई और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बदली, पर अवसंरचना, ऋण और अनुबंध-प्रवर्तन निर्णायक सीमाएं रहे।
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औद्योगिक विकास को आईआईपी, सकल मूल्यवर्धन, क्षमता उपयोग, निर्यात, एफडीआई, बैंक ऋण और निवेश पाइपलाइन से समझना होता है।
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विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन में हिस्सा वित्त वर्ष 2023-24 लगभग 17 प्रतिशत पट्टी में रहा, जिससे लक्ष्य और परिणाम का अंतर दिखता है।
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जीएसटी, आईबीसी, बैंक पुनःपूंजीकरण, एमएसएमई मानदंड और व्यवसाय-सुगमता सुधार उत्पादन से पहले और संकट के बाद दोनों चरणों को प्रभावित करते हैं।
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पीएलआई और मेक इन इंडिया 2.0 क्षेत्र-विशिष्ट प्रोत्साहन देते हैं, जबकि एनआईपी, एनएमपी और पीएम गति शक्ति अवसंरचना बाधाएं घटाते हैं।
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राजस्थान का औद्योगिक आधार रीको क्षेत्रों, भिवाड़ी-नीमराणा-खुशखेड़ा, डीएमआईसी, भीलवाड़ा वस्त्र और राइजिंग राजस्थान 2024 से जुड़ता है।
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किसी नीति को समझते समय घोषणा, क्रियान्वयन माध्यम, मापनीय परिणाम और राज्य-स्तरीय संबंध को अलग-अलग पढ़ना चाहिए।
१९९१ के आर्थिक सुधार क्यों शुरू हुए?
१९९१ के आर्थिक सुधार भुगतान-संतुलन संकट, घटते विदेशी मुद्रा भंडार, तेज महंगाई और दबे हुए औद्योगिक उत्पादन से शुरू हुए, इसलिए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण सामान्य नीति-समीक्षा नहीं बल्कि संकट से निकला मोड़ था। वित्त मंत्रालय के १९९१-९२ बजट भाषण के अनुसार उस समय विदेशी मुद्रा भंडार करीब २,५०० करोड़ रु. की सीमा में था, जो केवल एक पखवाड़े के आयात के लिए पर्याप्त था।
उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण सुधार १९९१ सामान्य नीति-समीक्षा से नहीं, भुगतान-संतुलन संकट से निकले।
१९९१ का संकट-संदर्भ
- १९९१ के मध्य तक विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम आयात अवधि को ढकता था।
- महंगाई तेज थी।
- बाहरी ऋणदाता सतर्क थे।
- आयात-संपीड़न से औद्योगिक उत्पादन दबा हुआ था।
सुधारों ने जिन चार बाधाओं पर चोट की
| बाधा | सुधार का अर्थ |
|---|---|
| क्षमता पर लाइसेंसिंग | कंपनियां प्रशासनिक अनुमति पर निर्भर रहने के बजाय मूल्य और तकनीक की प्रतिस्पर्धा में आईं। |
| ऊंचा आयात संरक्षण | भारतीय उद्योग को आयातित इनपुट, तकनीक और निर्यात बाजार चाहिए थे। |
| कई क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व | निजीकरण उदारीकरण से अधिक सावधान रहा; भारत ने विनिवेश, आरक्षित क्षेत्रों में कमी और बाद में रणनीतिक बिक्री अपनाई। |
| विदेशी निवेश पर कड़े नियंत्रण | राष्ट्रीय नीति पैमाना, विदेशी सहयोग और मशीनरी आयात को आसान करे, तभी निवेश अधिक खिंच सकता था। |
राजनीतिक और नीतिगत आधार
- डॉ. मनमोहन सिंह के १९९१-९२ बजट भाषण में व्यापार नीति और औद्योगिक नीति को साथ रखा गया, क्योंकि भारतीय उद्योग को आयातित इनपुट, तकनीक और निर्यात बाजार चाहिए थे।
- पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने इस बदलाव को राजनीतिक आधार दिया।
राजस्थान में व्यावहारिक अर्थ
- भिवाड़ी, नीमराणा, जयपुर, जोधपुर, कोटा और भीलवाड़ा के रीको औद्योगिक क्षेत्र तभी अधिक निवेश खींच सकते थे जब राष्ट्रीय नीति पैमाना, विदेशी सहयोग और मशीनरी आयात को आसान करे।
- १९९१ ने भूमि, बिजली, परिवहन या ऋण की समस्या समाप्त नहीं की, पर निजी उद्योग के विस्तार को वैध आर्थिक दिशा बना दिया।
सुधारों का क्रम
- पहले बाहरी विश्वास।
- फिर व्यापार-खोलना।
- फिर औद्योगिक प्रवेश।
- बाद में वित्तीय सुधार।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 MCQ निम्न सुधार मील-पत्थरों को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए।
व्याख्या
विकल्प क वास्तविक क्रम रखता है: 1991 में औद्योगिक डी-लाइसेंसिंग, 2011 में विनिर्माण-क्षेत्र नीति, 2017 में जीएसटी और 2021 में एकीकृत अवसंरचना योजना। अन्य विकल्प जीएसटी या पीएम गति शक्ति को उनके आरंभ-वर्ष से पहले रख देते हैं, इसलिए वे कालक्रम तोड़ते हैं।
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