संविधान, प्रस्तावना, नागरिकता और मूल अधिकार
मुख्य तथ्य
- भाग 3 में लाभार्थी-शब्द अलग हैं: नागरिक, व्यक्ति, अभियुक्त, बालक और अल्पसंख्यक।
- अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण को मानता है, पर मनमानी को अस्वीकार करता है।
- अनुच्छेद 21 निरोध प्रक्रिया से आगे गरिमा, जीविका, शिक्षा, पर्यावरण और निजता तक फैला।
- विशाखा राजस्थान, कार्यस्थल सुरक्षा और अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 को जोड़ता है।
- 42वें, 44वें और 86वें संशोधन ने प्रस्तावना, आपातकालीन संरक्षण और शिक्षा-अधिकार को बदला।
मुख्य बिंदु
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भाग 3 में लाभार्थी-शब्द अलग हैं: नागरिक, व्यक्ति, अभियुक्त, बालक और अल्पसंख्यक।
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अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण को मानता है, पर मनमानी को अस्वीकार करता है।
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अनुच्छेद 21 निरोध प्रक्रिया से आगे गरिमा, जीविका, शिक्षा, पर्यावरण और निजता तक फैला।
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विशाखा राजस्थान, कार्यस्थल सुरक्षा और अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 को जोड़ता है।
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42वें, 44वें और 86वें संशोधन ने प्रस्तावना, आपातकालीन संरक्षण और शिक्षा-अधिकार को बदला।
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24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची को मिलने वाला संरक्षण आई.आर. कोएल्हो वाद के बाद सीमित है।
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अनुच्छेद 32 स्वयं एक मूल अधिकार है; अनुच्छेद 226 का दायरा इससे अधिक व्यापक है।
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नागरिकता कानून संसद का एक साधारण कानून है, यह राज्य में निवास से जुड़ा कोई नियम नहीं है।
संवैधानिक पहचान और लागू अधिकार कैसे समझें?
संवैधानिक पहचान का अर्थ है संविधान की मूल राजनीतिक दिशा, प्रस्तावना के मूल्य और भाग ३ के लागू अधिकारों को साथ पढ़ना, जबकि प्रस्तावना स्वयं अलग से उपचार नहीं देती। विधि और न्याय मंत्रालय के संविधान पाठ के अनुसार भारत का अधिकृत पाठ १ मई २०२४ तक १०६वें संशोधन तक अद्यतन है।
मूल संवैधानिक ढांचा
- संविधान २६ नवंबर १९४९ को अंगीकृत हुआ और २६ जनवरी १९५० को लागू हुआ।
- प्रस्तावना भारत को संप्रभु समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बताती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता को व्याख्या का आधार बनाती है।
- संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, १९७६ ने १८ दिसंबर १९७६ को प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जोड़े तथा अनुच्छेद ५१क में मौलिक कर्तव्य जोड़े।
- एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ ने पंथनिरपेक्षता को मूल संरचना से जोड़ा और अनुच्छेद ३५६ की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना।
अधिकार और उनका दायरा
| प्रावधान | भूमिका या संरक्षण |
|---|---|
| भाग ३ | राज्य-शक्ति पर लागू सीमा बनाता है |
| अनुच्छेद १४ | विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण मनमानी रोकता है |
| अनुच्छेद २१ | जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण हर व्यक्ति को विधिक और निष्पक्ष प्रक्रिया के बिना वंचन से बचाता है |
| अनुच्छेद १९ | नागरिकों तक सीमित है |
राजस्थान में व्यवहारिक उपयोग
- जयपुर की भर्ती, जोधपुर का निरोध आदेश और उच्च न्यायालय की अनुच्छेद २२६ रिट इस भेद को व्यावहारिक बनाते हैं।
- मौलिक कर्तव्य नागरिक दायित्व बताते हैं, पर उनका प्रवर्तन सामान्यतः किसी कानून पर निर्भर रहता है।
प्रस्तावना की भूमिका
- संवैधानिक पहचान यह स्पष्ट करती है कि प्रस्तावना व्याख्यात्मक है, स्वतंत्र उपचार नहीं।
- बेरुबारी ने प्रारंभिक सीमित दृष्टि दी।
- केशवानंद ने प्रस्तावना को संविधान का भाग माना।
- बोम्मई ने उसके पंथनिरपेक्ष चरित्र से राज्यों में संघीय हस्तक्षेप नियंत्रित किया।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 MCQ राजस्थान में निरुद्ध विदेशी नागरिक निष्पक्ष प्रक्रिया से वंचन को चुनौती देता है। कौन सा अधिकार-पाठ सबसे सीधा आधार है?
व्याख्या
अनुच्छेद 21 व्यक्ति शब्द का प्रयोग करता है, इसलिए विदेशी नागरिक को भी विधिक और निष्पक्ष प्रक्रिया का संरक्षण देता है। अनुच्छेद 19 नागरिकों तक सीमित है, अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक संस्थाओं से संबंधित है और अनुच्छेद 51A सीधा उपचार-पाठ नहीं है।
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