सार्वजनिक अनुभाग प्रीव्यू
मुख्य बिंदु
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता २०२३ के मुख्य बिंदु यह हैं कि इसने आपराधिक प्रक्रिया को दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ से हटाकर इलेक्ट्रॉनिक सूचना, वैज्ञानिक जाँच, पीड़ित-अधिकार, समय-सीमा और अनुपस्थिति में विचारण की दिशा में आगे बढ़ाया।
१. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता २०२३ ने १ जुलाई २०२४ से दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ को प्रतिस्थापित किया; आधिकारिक अधिनियम पाठ में यह अधिनियम संख्या ४६, २०२३ है और इसमें ५३१ धाराएँ हैं। दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ में ४८४ धाराएँ थीं। यह केवल नाम-बदलाव नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक कानून का विस्तार है।
२. शून्य प्रथम सूचना रिपोर्ट का आधार धारा १७३(१) है, क्योंकि संज्ञेय अपराध की सूचना अपराध जिस क्षेत्र में हुआ हो उससे स्वतंत्र होकर दी जा सकती है। धारा १७३(३) शून्य प्रथम सूचना रिपोर्ट नहीं है; वह तीन वर्ष या अधिक और सात वर्ष से कम दंड वाले अपराधों में प्रारंभिक जाँच से जुड़ी है।
३. इलेक्ट्रॉनिक प्रथम सूचना रिपोर्ट भी धारा १७३(१) में मान्य है। इलेक्ट्रॉनिक संचार से दी गई सूचना अभिलेख पर ली जाएगी और सूचना देने वाले व्यक्ति से तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर कराए जाएँगे।
४. विचारण और जाँच की समय-सीमाएँ नए कानून की पहचान हैं: निर्दिष्ट लैंगिक और बाल यौन अपराधों की जाँच सूचना दर्ज होने से दो माह में पूरी करनी है; पीड़ित या सूचनादाता को जाँच की प्रगति नब्बे दिन के भीतर बतानी है; सत्र मामले में आरोप पर प्रथम सुनवाई से साठ दिन में आरोप-निर्माण करना है; निर्णय विचारण समाप्ति के बाद अधिकतम पैंतालीस दिन में सुनाया जाना है।
५. जमानत प्रावधान में धारा ४७९ विचाराधीन कैदियों के लिए महत्वपूर्ण है। अधिकतम सजा का आधा हिस्सा हिरासत में काट चुके विचाराधीन कैदी को, मृत्युदंड और आजीवन कारावास वाले अपराधों को छोड़कर, जमानत पर छोड़ा जाएगा। पहली बार अपराध के आरोपी के लिए सीमा एक-तिहाई है।
६. अनुपस्थिति में विचारण के लिए धारा ३५६ लागू होती है। उद्घोषित अपराधी यदि विचारण से बचने के लिए फरार है और तत्काल गिरफ्तारी की संभावना नहीं है, तो न्यायालय लिखित कारण दर्ज कर उसकी अनुपस्थिति में विचारण चला सकता है; आरोप-निर्माण से नब्बे दिन बीतना जरूरी है।
७. फोरेंसिक जाँच में धारा १७६(३) सात वर्ष या अधिक दंड वाले अपराधों के लिए फोरेंसिक विशेषज्ञ, साक्ष्य-संग्रह और वीडियो रिकॉर्डिंग की दिशा देती है। राज्य सरकार को व्यवस्था अधिसूचित करनी होती है और सुविधा विकसित करने के लिए कानून अधिकतम पाँच वर्ष की खिड़की देता है।
८. पीड़ित अधिकार कई धाराओं में फैले हैं: धारा १९३(३) में जाँच-प्रगति की सूचना, धारा ३६० में अभियोजन वापसी से पहले पीड़ित को सुने जाने का अवसर, धारा ३९६ में पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना, धारा ३९७ में निःशुल्क चिकित्सा उपचार और धारा ३९८ में गवाह संरक्षण योजना।
९. हथकड़ी धारा ४३(३) में कारण-आधारित अपवाद है। आदतन अपराधी, हिरासत से भागा व्यक्ति, संगठित अपराध, आतंकवादी कृत्य, मादक पदार्थ अपराध, हत्या, बलात्कार, अम्ल हमला, जाली मुद्रा, मानव तस्करी, बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध और राज्य के विरुद्ध अपराध जैसे मामलों में ही इसका औचित्य बनता है।
१०. तलाशी और जब्ती की दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग जवाबदेही बढ़ाती है। मोबाइल फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से रिकॉर्डिंग पंचनामा, जब्ती और आरोप-पत्र की विश्वसनीयता को मजबूत करती है।
११. नार्को-विश्लेषण और पॉलीग्राफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता से अपने-आप अनिवार्य नहीं हो जाते। सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य, २०१० के अनुसार जबरन नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन-मैपिंग संवैधानिक सुरक्षा से टकराते हैं।
१२. दया याचिका धारा ४७२ में समयबद्ध है: मृत्युदंड प्राप्त दोषी या उसका विधिक वारिस या रिश्तेदार संबंधित सूचना मिलने से तीस दिन के भीतर राष्ट्रपति या राज्यपाल के सामने दया याचिका दे सकता है।
