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मुख्य बिंदु
१. राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम १९५६ (अधिनियम संख्या १५ वर्ष १९५६) राजस्थान में भूमि राजस्व प्रशासन, सरकारी भूमि, राजस्व न्यायालयों और भूमि अभिलेखों से संबंधित कानूनों को समेकित एवं संशोधित करने के लिए बनाया गया। मौजूदा आधिकारिक पाठ पढ़ते समय पुराने नोट्स के धारा-संदर्भ जाँचना जरूरी है, क्योंकि संशोधनों के बाद कई धाराओं की वास्तविक स्थिति बदल चुकी है।
२. नाज़ूल भूमि नगरीय/नगरपालिका सीमाओं के भीतर स्थित वह भूमि है जो राज्य सरकार में निहित होती है; यह कृषि भूमि से भिन्न है। मौजूदा आधिकारिक पाठ में नाज़ूल भूमि की परिभाषा धारा ३ में और स्थानीय निकायों को ऐसी भूमि सौंपने का प्रावधान धारा १०२-क में आता है; पुराने नोट्स में इसे केवल धारा २२ से जोड़ना सही नहीं है। २०२१ पूर्ववर्षीय प्रश्न में पूछा गया।
३. अधिकार अभिलेख राजस्थान में भूमि अधिकार, काश्त, राजस्व और कब्जे की प्रविष्टियों का प्राथमिक राजस्व दस्तावेज है। मौजूदा आधिकारिक पाठ में अधिकार अभिलेख से जुड़ी प्रमुख व्यवस्था धारा ११४, वार्षिक रजिस्टर धारा १३२, परिवर्तन की रिपोर्ट धारा १३३ और प्रविष्टियों की सत्यता की उपधारणा धारा १४० में आती है। इसे पटवारी द्वारा जमाबंदी, खसरा, खतौनी एवं नामांतरण रजिस्टर के रूप में तैयार एवं अद्यतन किया जाता है।
४. राजस्व मंडल राजस्थान में अजमेर में मुख्यालय वाली सर्वोच्च राजस्व प्राधिकरणीय संस्था है। मौजूदा अधिनियम में इसका गठन धारा ४ में है; यह अपीलीय, पुनरीक्षणीय और पर्यवेक्षणीय भूमिका निभाता है तथा राजस्व प्रशासन की निगरानी करने वाला निकाय भी है।
५. राजस्व प्रशासन का व्यवहारिक क्रम इस प्रकार समझें: पटवारी → गिरदावर/कानूनगो → तहसीलदार → नायब-तहसीलदार → उपखंड अधिकारी (राजस्व) → कलेक्टर → संभागीय आयुक्त → राजस्व मंडल। मौजूदा अधिनियम में राजस्व न्यायालयों और अधिकारियों की व्यवस्था अध्याय ३ में आती है, इसलिए धारा-संख्या याद करते समय मूल अधिनियम और संशोधित पाठ में अंतर देखना चाहिए।
६. भूमि राजस्व कृषि भूमि पर राज्य का ऐतिहासिक हिस्सा है, जिसका निर्धारण उत्पादकता, मृदा प्रकार, सिंचाई और बंदोबस्त के आधार पर होता था। वर्तमान में अधिकांश छोटे खातेदार किसानों के लिए बार-बार दी गई छूटों और भूमि राजस्व की घटती राजकोषीय भूमिका के कारण वास्तविक भुगतान बहुत कम या शून्य रहता है।
७. सर्वेक्षण एवं अभिलेख कार्यवाही भूमि की सर्वे संख्या यानी खसरा संख्या स्थापित करती है, सीमाएँ निर्धारित करती है, क्षेत्रफल मापती है, भूमि वर्गीकृत करती है और राजस्व आकलन का आधार बनाती है। मौजूदा अधिनियम में सर्वेक्षण और अभिलेख कार्यवाही अध्याय ७ में धारा १०६ से आगे विस्तृत है।
८. नामांतरण वह औपचारिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा बिक्री, उत्तराधिकार, उपहार, विभाजन या न्यायालय आदेश से स्वामित्व/काश्तकारी परिवर्तन होने पर भूमि अभिलेख अद्यतन किए जाते हैं। मौजूदा पाठ में धारा १३३ उत्तराधिकार या हस्तांतरण से कब्जा पाने वाले व्यक्ति को तीन माह के भीतर पटवारी या तहसीलदार को सूचना देने की जिम्मेदारी देती है।
९. भूमि अधिग्रहण नोटिस, सीमांकन और सीमा-विवाद राजस्व अधिकारी कार्यों से जुड़े हैं: सीमा विवादों का निर्णय तहसीलदार/कलेक्टर द्वारा क्षेत्र सर्वेक्षण से होता है; सीमांकन क्षेत्र मानचित्रों से खसरा सीमाएँ स्थापित करता है। सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनिवार्य अधिग्रहण अलग केंद्रीय कानून के अंतर्गत चलता है, पर पहचान और अभिलेख के लिए राजस्व रिकॉर्ड जरूरी आधार देते हैं।
१०. सरकारी भूमि, नाज़ूल, खालसा, शामलात या चरागाह पर अतिक्रमण राजस्व अपराध की तरह देखा जाता है। धारा ९१ के तहत तहसीलदार अनधिकृत कब्जेदार को संक्षिप्त कार्यवाही से बेदखल कर सकता है और दंड/हर्जाने की कार्यवाही कर सकता है; इसे निजी स्वामित्व विवाद से अलग समझना चाहिए।
११. सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए भूमि का अनिवार्य अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम २०१३ द्वारा शासित है; १९५६ का अधिनियम भूमि की पहचान, अभिलेख, वर्गीकरण और राजस्व स्थिति का प्रशासनिक ढाँचा प्रदान करता है।
१२. राजस्थान भूमि अभिलेख डिजिटलीकरण: डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत राजस्थान ने जमाबंदी, खसरा, नामांतरण और नक्शों को ऑनलाइन उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा काम किया है; अपना खाता पोर्टल पर जमाबंदी नकल, नामांतरण के लिए आवेदन, सहमति विभाजन आवेदन, सीमाज्ञान आवेदन, आवेदन की वर्तमान स्थिति, सीमाज्ञान प्रतिक्रिया और गिरदावरी विवरण जैसे विकल्प दिखते हैं। इससे धोखाधड़ी कम करने, पारदर्शिता बढ़ाने और नामांतरण-निगरानी को तेज करने में मदद मिलती है।
