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व्यवहार एवं विधि

मुख्य बिंदु

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 (धाराएँ 1–25)

पेपर III · इकाई 3 अनुभाग 1 / 15 PYQ-शैली 27 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग प्रीव्यू

मुख्य बिंदु

१. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम २००७ वृद्ध माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों को अपने वयस्क बच्चों या संपत्ति पाने वाले संबंधियों से भरण-पोषण दिलाने के लिए सरल, त्वरित और कम-खर्च वाली कानूनी प्रक्रिया देता है। इंडिया कोड के अनुसार यह २००७ का अधिनियम संख्या ५६ है और इसे २९ दिसंबर २००७ को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली। यह राज्य-दर-राज्य अधिसूचित होकर प्रभावी हुआ और इसका उद्देश्य वृद्ध व्यक्ति को सामान्य जीवन, सुरक्षा और सम्मान के लिए प्रशासनिक स्तर पर राहत देना है।

२. "वरिष्ठ नागरिक" (धारा २(ह)) का अर्थ भारत का कोई भी नागरिक है जिसने ६० वर्ष या उससे अधिक आयु प्राप्त कर ली हो। "माता-पिता" (धारा २(घ)) का अर्थ पिता या माता है, चाहे वे जैविक, दत्तक या सौतेले हों और चाहे वे स्वयं वरिष्ठ नागरिक हों या नहीं। इस कारण अधिनियम केवल वृद्ध माता-पिता तक सीमित नहीं है; वह ऐसे माता-पिता को भी राहत देता है जो अपनी आय या संपत्ति से अपना भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हों।

३. "बच्चे" (धारा २(क)) का अर्थ पुत्र, पुत्री, पोता और पोती है — इसमें अवयस्क शामिल नहीं हैं। इसलिए भरण-पोषण का मुख्य दायित्व बालिग पुत्र और पुत्री पर है; जब माता-पिता के पुत्र-पुत्री जीवित न हों या सक्षम न हों, तब पोते-पोती भी दायित्व में आ सकते हैं। अधिनियम पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं करता।

४. "संबंधी" (धारा २(छ)) का अर्थ निःसंतान वरिष्ठ नागरिक का ऐसा विधिक उत्तराधिकारी है जो अवयस्क नहीं है और जो वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति के कब्जे में है या उसकी मृत्यु के बाद संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करेगा। यानी बच्चों के अतिरिक्त ऐसे संबंधी भी दायित्व में आते हैं जो वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से लाभ पाने वाले हों। यदि एक से अधिक संबंधी संपत्ति पाने वाले हों, तो दायित्व उनके संभावित उत्तराधिकार के अनुपात में बाँटा जा सकता है।

५. भरण-पोषण अधिकरण (धारा ७) — राज्य सरकार प्रत्येक उप-खंड के लिए एक या अधिक अधिकरण गठित करती है, जिसकी अध्यक्षता उप-मंडल अधिकारी से नीचे के अधिकारी द्वारा नहीं की जा सकती। वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता धारा ५ के तहत आवेदन दे सकते हैं। आवेदन की सूचना तामील होने के बाद कार्यवाही सामान्यतः ९० दिनों में पूरी होनी चाहिए; असाधारण परिस्थितियों में लिखित कारण दर्ज कर ३० दिन और बढ़ाए जा सकते हैं।

६. अधिकरण द्वारा दिया जाने वाला अधिकतम भरण-पोषण केंद्रीय अधिनियम के ढाँचे में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित होता है, पर वह १०,००० रुपये प्रतिमाह से अधिक नहीं हो सकता। राज्य अपने नियमों में सीमा तय करते हैं; कई राज्यों ने व्यवहार में सीमा बढ़ाने या हटाने की दिशा में अलग-अलग कदम उठाए हैं, और २०१९ के संशोधन प्रस्ताव में केंद्रीय सीमा हटाने का विचार रखा गया था।

७. अपीलीय अधिकरण (धारा १५ और १६) — राज्य सरकार प्रत्येक जिले में अपीलीय अधिकरण गठित करती है, जिसकी अध्यक्षता जिलाधीश से नीचे के अधिकारी द्वारा नहीं की जा सकती। भरण-पोषण अधिकरण के आदेश से पीड़ित वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता आदेश की तारीख से ६० दिनों के भीतर अपील कर सकते हैं। अपीलीय अधिकरण का आदेश अंतिम है, और धारा २७ सिविल न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को रोकती है।

८. संपत्ति अंतरण और भरण-पोषण दायित्व (धारा २३): यदि वरिष्ठ नागरिक ने अपनी संपत्ति दान या अन्य अंतरण से इस शर्त पर दी हो कि अंतरिती मूलभूत सुविधाएँ और शारीरिक आवश्यकताएँ देगा, और अंतरिती ऐसा करने से इनकार करे या असफल हो, तो वरिष्ठ नागरिक के विकल्प पर वह अंतरण अधिकरण द्वारा शून्य घोषित किया जा सकता है। यह नियम वृद्धों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण सुरक्षा है, क्योंकि संपत्ति लेने के बाद देखभाल न करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध तेज प्रशासनिक राहत मिलती है।

९. वरिष्ठ नागरिक का परित्याग (धारा २४): जो कोई भी वरिष्ठ नागरिक की देखभाल या संरक्षण का उत्तरदायी होते हुए उसे पूर्णतः त्यागने के इरादे से किसी स्थान पर छोड़ दे, वह ३ माह तक कारावास या ५,००० रुपये तक अर्थदंड या दोनों से दंडनीय है। धारा २५ के अनुसार अधिनियम के अपराध संज्ञेय और जमानती हैं तथा उनका संक्षिप्त विचारण हो सकता है।

१०. वृद्धाश्रम (धारा १९): राज्य सरकारें निराश्रित वरिष्ठ नागरिकों के लिए चरणबद्ध ढंग से सुगम स्थानों पर वृद्धाश्रम स्थापित और संचालित कर सकती हैं; शुरुआत कम-से-कम प्रत्येक जिले में एक वृद्धाश्रम से होनी है, जिसमें न्यूनतम १५० निराश्रित वरिष्ठ नागरिकों के रहने की व्यवस्था हो। राज्य सरकार वृद्धाश्रमों के प्रबंधन, चिकित्सा देखभाल, मनोरंजन और जरूरी सेवाओं के मानक तय कर सकती है।

११. चिकित्सा सुविधाएँ (धारा २०): राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त अस्पताल वरिष्ठ नागरिकों के लिए यथासंभव बिस्तर उपलब्ध कराएँ, अलग कतारें रखें, दीर्घकालीन, अंतिम अवस्था और अपक्षयी रोगों के इलाज की सुविधा बढ़ाएँ, वृद्ध रोगों पर शोध को बढ़ावा दें और हर जिला अस्पताल में वृद्ध-चिकित्सा सुविधा अनुभवी चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में हो।

१२. २०१९ संशोधन प्रस्ताव: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट २०२०-२१ के अनुसार माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण (संशोधन) विधेयक, २०१९ लोकसभा में ११ दिसंबर २०१९ को पेश किया गया था। इसमें १०,००० रुपये की ऊपरी सीमा हटाने, बच्चों और माता-पिता की परिभाषाएँ बढ़ाने, आवेदन के तरीके आसान करने, वरिष्ठ नागरिक देखभाल गृहों के पंजीकरण और न्यूनतम मानकों, तथा पुलिस स्तर पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए नोडल अधिकारी जैसी व्यवस्थाओं का प्रस्ताव था।