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व्यवहार एवं विधि

मुख्य बिंदु

महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005 (धाराएँ 1–29, 31)

पेपर III · इकाई 3 अनुभाग 1 / 14 PYQ-शैली 25 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग प्रीव्यू

मुख्य बिंदु

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, २००५ परीक्षा में इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह घरेलू हिंसा को केवल अपराध नहीं मानता, बल्कि महिला को तुरंत संरक्षण, निवास, मौद्रिक राहत, अभिरक्षा और प्रतिकर दिलाने वाला दीवानी ढाँचा भी देता है।

१. घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, २००५ को १३ सितंबर २००५ को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई और यह २६ अक्टूबर २००६ से लागू हुआ। यह मुख्य रूप से दीवानी राहतों वाला कानून है जो तत्काल संरक्षण देता है, जबकि भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता के आपराधिक उपाय समानांतर चल सकते हैं। भारत संहिता पर प्रकाशित अधिनियम के आधिकारिक पाठ में कुल ३७ धाराएँ हैं।

२. "घरेलू संबंध" (धारा २(च)) में रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण से संबंधित महिलाएँ शामिल हैं, साथ ही लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाएँ भी, क्योंकि परिभाषा में "विवाह की प्रकृति का संबंध" आता है। इससे यह अधिनियम संरक्षण के उद्देश्य से लिव-इन संबंधों को कानूनी रूप से पहचानने वाला प्रारम्भिक भारतीय कानून बना।

३. "घरेलू हिंसा" (धारा ३) में चार रूप शामिल हैं: (क) शारीरिक दुर्व्यवहार — शारीरिक क्षति पहुँचाने वाला कोई भी कृत्य; (ख) यौन दुर्व्यवहार — जबरन यौन संबंध या अपमानजनक यौन प्रकृति का आचरण; (ग) मौखिक एवं भावनात्मक दुर्व्यवहार — अपमान, उपहास, धमकी और मानसिक यातना; (घ) आर्थिक दुर्व्यवहार — वित्तीय संसाधनों या संपत्ति से वंचित करना, स्त्रीधन रोकना, या महिला को घर से बाहर करना।

४. "पीड़ित व्यक्ति" (धारा २(क)) का तात्पर्य किसी भी ऐसी महिला से है जो प्रत्यर्थी के साथ घरेलू संबंध में है या रही है और घरेलू हिंसा का आरोप लगाती है। प्रत्यर्थी (धारा २(थ)) को पुराने पाठ में वयस्क पुरुष तक सीमित किया गया था, लेकिन हीरल पी. हरसोरा बनाम कुसुम नरोत्तमदास हरसोरा (२०१६) के बाद "वयस्क पुरुष" की सीमा हट गई; इसलिए आज शिकायत घरेलू संबंध में रहे किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध हो सकती है, यदि अधिनियम की शर्तें पूरी हों।

५. अधिनियम तीन मुख्य संस्थागत कड़ियाँ बनाता है: संरक्षण अधिकारी (धारा ८), जिन्हें राज्य सरकार द्वारा पीड़ित व्यक्ति की सहायता के लिए नियुक्त किया जाता है; सेवा प्रदाता (धारा १०), पंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाएँ जो सहायता प्रदान करती हैं; और मजिस्ट्रेट (धारा १२), जो आवेदन पर कार्यवाही करता है और प्रथम सुनवाई से सामान्यतः ६० दिनों के भीतर निस्तारण का प्रयास करता है।

६. संरक्षण आदेश (धारा १८) प्रत्यर्थी को किसी भी आगे की घरेलू हिंसा करने, दूसरों को इसमें सहायता करने, पीड़ित व्यक्ति से संपर्क करने, या उसके कार्यस्थल या विद्यालय में प्रवेश करने से प्रतिबंधित करता है। संरक्षण आदेश या अंतरिम संरक्षण आदेश का उल्लंघन धारा ३१ के तहत संज्ञेय और अजमानती अपराध है।

७. आवास आदेश (धारा १९) पीड़ित व्यक्ति के साझा घर में रहने के अधिकार को सुरक्षित करता है। उसे तब भी नहीं निकाला जा सकता जब उसका उस संपत्ति पर कोई कानूनी स्वामित्व न हो, और न्यायालय प्रत्यर्थी को वैकल्पिक आवास प्रदान करने का निर्देश भी दे सकता है।

८. मौद्रिक राहत (धारा २०) में चिकित्सा व्यय, आय की हानि, स्वयं और बच्चों का भरण-पोषण, और नष्ट की गई संपत्ति की क्षतिपूर्ति शामिल है। राशि उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए, और न्यायालय इसे अन्य कानूनों के तहत भरण-पोषण के साथ या उसके अतिरिक्त दे सकता है।

९. अभिरक्षा आदेश (धारा २१) मजिस्ट्रेट को पीड़ित व्यक्ति के किसी भी बच्चे की अंतरिम अभिरक्षा देने का अधिकार देता है — प्रत्यर्थी को दर्शन अधिकार के साथ या बिना — सक्षम दीवानी न्यायालय में कार्यवाही लंबित रहने तक। इससे बच्चों का उत्पीड़न के हथियार के रूप में उपयोग रोकने में सहायता मिलती है।

१०. प्रतिकर आदेश (धारा २२) मजिस्ट्रेट को प्रत्यर्थी को मानसिक यातना और भावनात्मक पीड़ा सहित चोटों के लिए प्रतिकर और क्षतिपूर्ति का भुगतान करने का निर्देश देने का अधिकार देता है — जो साधारण भरण-पोषण से परे मनोवैज्ञानिक नुकसान की पहचान करता है।

११. अधिनियम में एक समर्पित अपील तंत्र (धारा २९) है। मजिस्ट्रेट के आदेश की तामील से ३० दिनों के भीतर सत्र न्यायालय में अपील की जा सकती है, जिससे कार्यवाही सामान्य दीवानी मुकदमेबाजी की तुलना में तेज होती है।

१२. ऐतिहासिक उच्चतम न्यायालय निर्णय — इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी. सरमा (२०१३): उच्चतम न्यायालय ने माना कि लिव-इन संबंध अपने आप संरक्षण नहीं देते, पर यदि संबंध "विवाह की प्रकृति" का हो तो अधिनियम लागू हो सकता है। न्यायालय ने अवधि, साझा घर, संसाधनों का मिलाप, घरेलू व्यवस्था, बच्चे और युगल के रूप में सामाजिक पहचान जैसे कारक बताए; स्वयं इंद्रा सरमा को राहत इसलिए नहीं मिली क्योंकि प्रत्यर्थी पहले से विवाहित था और संबंध विधिक विवाह जैसा नहीं माना गया।