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मुख्य बिंदु
भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, २००० इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों, इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, साइबर अपराधों और मध्यस्थ दायित्व का मूल कानूनी ढाँचा देता है। भारत कोड पर उपलब्ध आधिकारिक पाठ के अनुसार यह अधिनियम संख्या २१, वर्ष २००० का अधिनियम है और इसे ९ जून २००० को अधिनियमित किया गया।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, २००० ९ जून २००० को अधिनियमित और १७ अक्तूबर २००० को लागू हुआ; यह इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, डिजिटल हस्ताक्षर, साइबर अपराध और डेटा संरक्षण पर भारत का प्राथमिक कानून है; सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, २००८ द्वारा महत्त्वपूर्ण रूप से संशोधित।
धारा २ — मुख्य परिभाषाएँ: "कंप्यूटर" अर्थात इलेक्ट्रॉनिक, चुंबकीय, प्रकाशीय या अन्य उच्च-गति डेटा-प्रसंस्करण युक्ति जो तार्किक, अंकगणितीय और स्मृति कार्य करे; "डेटा" अर्थात औपचारिक तरीके से तैयार सूचना, ज्ञान, तथ्य, अवधारणाओं या निर्देशों का निरूपण; "इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख" अर्थात इलेक्ट्रॉनिक रूप या माइक्रोफिल्म/कंप्यूटर-जनित माइक्रोफिच में जनित, प्राप्त, संगृहीत या प्रेषित डेटा, अभिलेख, चित्र या ध्वनि।
"निजी क्षेत्र" धारा २ में नहीं, बल्कि धारा ६६ई के स्पष्टीकरण (ग) में परिभाषित है: नग्न या अंतर्वस्त्र-आच्छादित जननांग, जघन क्षेत्र, नितंब या महिला स्तन। यही परिभाषा धारा ६६ई में गोपनीयता उल्लंघन के लिए प्रयोग होती है; ताकझाँक और बिना सहमति अंतरंग छवि वितरण जैसे अपराधों में इसका कानूनी आधार बनता है।
धारा ६५ — कंप्यूटर स्रोत दस्तावेज़ों से छेड़छाड़: जानबूझकर कंप्यूटर स्रोत कोड छुपाना, नष्ट करना या बदलना, जब कानून द्वारा उसे रखना आवश्यक हो, ३ वर्ष तक कारावास या २ लाख रुपये तक जुर्माने से दंडनीय है।
धारा ६६ — कंप्यूटर संबंधी अपराध: यदि कोई व्यक्ति धारा ४३ में उल्लिखित कार्य बेईमानी या कपटपूर्वक करे, तो ३ वर्ष तक कारावास या ५ लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। धारा ४३ में अनधिकृत पहुँच, डेटा डाउनलोड, कंप्यूटर दूषक या वायरस डालना, सेवा अवरोध और पहुँच से वंचित करना शामिल हैं।
धाराएँ ६६ए–६६एफ (२००८ संशोधन): ६६ए आपत्तिजनक संदेश से जुड़ी थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ, २०१५ में असंवैधानिक घोषित किया; ६६बी चोरी के कंप्यूटर संसाधन प्राप्त करना; ६६सी पहचान की चोरी — ३ वर्ष और १ लाख रुपये; ६६डी कंप्यूटर संसाधन से प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी — ३ वर्ष और १ लाख रुपये।
धारा ६६ई — गोपनीयता का उल्लंघन: बिना सहमति के किसी व्यक्ति के निजी क्षेत्र की छवि जानबूझकर कैप्चर, प्रकाशित या प्रसारित करना ३ वर्ष तक कारावास या २ लाख रुपये तक जुर्माने से दंडनीय है। यह ताकझाँक और बदला लेने के लिए अंतरंग सामग्री फैलाने जैसे व्यवहार को संबोधित करती है।
धारा ६६एफ — साइबर आतंकवाद: भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को खतरा पहुँचाने या लोगों में आतंक फैलाने के इरादे से किसी अधिकृत व्यक्ति को कंप्यूटर पहुँच से वंचित करना, अनधिकृत पहुँच लेना या कंप्यूटर दूषक डालना — आजीवन कारावास तक दंडनीय है।
धारा ६७ — अश्लील सामग्री प्रकाशन: इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करना — पहली दोषसिद्धि में ३ वर्ष और ५ लाख रुपये; दोहराने पर ५ वर्ष और १० लाख रुपये। धारा ६७ए यौन रूप से स्पष्ट सामग्री से जुड़ी है — ५/७ वर्ष; धारा ६७बी बाल यौन सामग्री से जुड़ी है — ५/७ वर्ष, संज्ञेय और गैर-जमानती।
धारा ६९ — अवरोधन/निगरानी/डिक्रिप्शन के निर्देश: केंद्र या राज्य सरकार संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, मित्र देशों के साथ संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था या संज्ञेय अपराध के लिए उकसावे को रोकने के लिए किसी सरकारी एजेंसी को किसी कंप्यूटर संसाधन से सूचना अवरोधित, निगरानी या डिक्रिप्ट करने का निर्देश दे सकती है।
धारा ७० — संरक्षित प्रणालियाँ: उपयुक्त सरकार अधिसूचना द्वारा किसी कंप्यूटर संसाधन को "संरक्षित प्रणाली" घोषित कर सकती है; संरक्षित प्रणाली तक अनधिकृत पहुँच १० वर्ष तक कारावास और जुर्माने से दंडनीय है। परमाणु, ऊर्जा, बैंकिंग और रक्षा जैसे क्षेत्र आम तौर पर महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना से जुड़े माने जाते हैं।
धाराएँ ७२–७८: गोपनीयता और निजता का उल्लंघन (धारा ७२), वैध अनुबंध के उल्लंघन में सूचना प्रकटन (धारा ७२ए), इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र से जुड़े अपराध, जब्ती, अन्य दंडों से स्वतंत्र दायित्व, अपराधों का शमन, जमानत/संज्ञेयता और कंपनियों द्वारा अपराध (धारा ८५) से जुड़ा संदर्भ परीक्षा में आता है। २००८ संशोधन के बाद धारा ७८ निरीक्षक से नीचे के नहीं पुलिस अधिकारी को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अपराधों की जाँच का अधिकार देती है; मूल धारा ७८ में पुलिस उपअधीक्षक या उससे ऊपर का स्तर था, जिसे संशोधन ने निरीक्षक स्तर तक घटाया।
