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मुख्य बिंदु
कार्य में उत्कर्ष का अर्थ केवल खुश रहना नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, गुण-आधारित और अपनी शक्तियों के अनुरूप काम करते हुए टिकाऊ प्रदर्शन करना है।
१. उत्कर्ष मानव की इष्टतम कार्यशीलता की अवस्था है — मार्टिन सेलिगमैन (२०११, फ्लरिश) इसे "मानव कार्यशीलता की उस इष्टतम सीमा में जीना" के रूप में परिभाषित करते हैं जो अच्छाई, विकास और लचीलेपन को व्यक्त करती है। यह केवल अच्छा महसूस करने यानी सुखवादी कल्याण से अलग है — उत्कर्ष यूडेमोनिक है, जिसमें अर्थ और गुण दोनों शामिल हैं।
२. सेलिगमैन का पर्मा मॉडल (२०११) उत्कर्ष के पाँच आधारभूत तत्व बताता है: पी — सकारात्मक भावनाएँ, ई — संलग्नता, आर — संबंध, एम — अर्थ, और ए — उपलब्धि। पर्मा-वी विस्तारित मॉडल जीवन्तता यानी शारीरिक कल्याण जोड़ता है। प्रत्येक तत्व अपने आप में मूल्यवान है, किसी अन्य साधन के रूप में नहीं।
३. सकारात्मक मनोविज्ञान, मार्टिन सेलिगमैन और मिहाई चिक्सेंटमिहाई (२०००, अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट) द्वारा स्थापित, ने मानसिक बीमारी के बजाय मानसिक स्वास्थ्य, शक्तियों और इष्टतम कार्यशीलता पर ध्यान केंद्रित किया। तीन स्तंभ हैं: सकारात्मक व्यक्तिपरक अनुभव, सकारात्मक व्यक्तिगत गुण, और सकारात्मक संस्थाएँ।
४. प्रवाह — मिहाई चिक्सेंटमिहाई (१९९०, प्रवाह: सर्वोत्तम अनुभव का मनोविज्ञान) — किसी चुनौतीपूर्ण कार्य में पूर्ण तल्लीनता की अवस्था है जहाँ कौशल और माँग समान स्तर पर हों; समय का विकृत बोध, सहजता, और आंतरिक पुरस्कार की अनुभूति होती है। प्रवाह एक शीर्ष उत्कर्ष अनुभव है और पर्मा के 'ई' यानी संलग्नता का आधार है।
५. चारित्रिक शक्तियाँ और सद्गुण यानी वीआईए वर्गीकरण — मार्टिन सेलिगमैन और क्रिस्टोफर पीटरसन (२००४, चारित्रिक शक्तियाँ और सद्गुण) — ने ६ मूल गुणों के अंतर्गत २४ चारित्रिक शक्तियाँ पहचानी हैं: ज्ञान, साहस, मानवता, न्याय, संयम, अतीन्द्रियता। वीआईए सर्वेक्षण सर्वाधिक प्रयुक्त शक्ति-मूल्यांकन साधन है।
६. विशिष्ट शक्तियाँ वीआईए सर्वेक्षण की शीर्ष ३–७ शक्तियाँ हैं जो सर्वाधिक स्वाभाविक, ऊर्जादायक और प्रामाणिक लगती हैं। एलेक्स लिनली और स्टीफन जोसेफ (२००४) ने दर्शाया कि कार्यस्थल पर विशिष्ट शक्तियों का उपयोग अधिक संलग्नता, संतुष्टि और कम बर्नआउट का पूर्वानुमान करता है — सरकारी सेवा सहित सभी व्यावसायिक संदर्भों में।
७. हॉलैंड का रिआसेक / रैसेक सिद्धांत (१९५९, १९९७) — जॉन एल. हॉलैंड ने प्रस्तावित किया कि लोगों और कार्य-वातावरण को ६ प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: यथार्थवादी, अन्वेषी, कलात्मक, सामाजिक, उद्यमी, पारंपरिक। व्यक्ति के प्रकार और कार्य-वातावरण के प्रकार के बीच सामंजस्य पर करियर संतुष्टि और उत्कर्ष निर्भर करती है।
८. व्यक्ति-पर्यावरण अनुकूलता सिद्धांत — बेंजामिन श्नाइडर (१९८७, एएसए मॉडल: आकर्षण-चयन-क्षरण) का तर्क है कि संगठन एकरूप हो जाते हैं क्योंकि समान लोग आकर्षित, चयनित और बनाए रखे जाते हैं। व्यक्ति-कार्य, व्यक्ति-संगठन, व्यक्ति-समूह और व्यक्ति-व्यवसाय अनुकूलता प्रत्येक अलग उत्कर्ष परिणामों का पूर्वानुमान करते हैं।
९. स्व-निर्धारण सिद्धांत — एडवर्ड डेसी और रिचर्ड रयान (१९८५, २०००) — तीन सार्वभौमिक मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पहचान करता है जिनकी संतुष्टि उत्कर्ष का पूर्वानुमान करती है: स्वायत्तता, क्षमता और संबद्धता। स्व-निर्धारण सिद्धांत आंतरिक प्रेरणा को बाह्य प्रेरणा से अलग करता है — आंतरिक प्रेरणा उत्कर्ष को बनाए रखती है; पूर्णतः बाह्य प्रेरणा उसे क्षीण करती है।
१०. जॉब क्राफ्टिंग — एमी रेज़ेस्निविस्की और जेन डटन (२००१, जॉब क्राफ्टिंग मॉडल) — वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कर्मचारी सक्रिय रूप से अपने कार्यों, संबंधों और संज्ञानात्मक धारणाओं को अपनी शक्तियों और अर्थ के अनुरूप बनाते हैं। तीन प्रकार: कार्य क्राफ्टिंग यानी कार्य-निर्माण, संबंध क्राफ्टिंग यानी संबंध-निर्माण, और संज्ञानात्मक क्राफ्टिंग यानी संज्ञान-निर्माण।
११. कार्यस्थल में सद्गुण नैतिकता अरस्तू के निकोमैखीय नीतिशास्त्र पर आधारित है — गुण स्थिर चारित्रिक लक्षण हैं जो उत्कर्ष यानी यूडेमोनिया को सक्षम बनाते हैं। आधुनिक संगठनात्मक अनुप्रयोग: सकारात्मक संगठनात्मक विद्वत्ता — मिशिगन विश्वविद्यालय (किम कैमरन, जेन डटन, २००३) द्वारा विकसित — सद्गुण, लचीलेपन और अर्थ से असाधारण प्रदर्शन प्राप्त करने वाले सदाचारी संगठनों का अध्ययन करता है।
१२. भारतीय प्रशासनिक संदर्भ में उत्कर्ष: धर्म यानी सही आचरण, कर्म यानी उद्देश्यपूर्ण क्रिया, और सेवा की प्राचीन भारतीय परंपराएँ कार्यस्थल पर उत्कर्ष के लिए एक स्वदेशी ढाँचा बनाती हैं। जो आईएएस/आरएएस अधिकारी अपने कार्य को एक आह्वान — केवल नौकरी या कैरियर नहीं — के रूप में देखते हैं, वे रेज़ेस्निविस्की (१९९७) के अनुसार अधिक लचीलेपन, कम बर्नआउट और बेहतर शासन परिणाम दिखाते हैं।
