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लोक प्रशासन

मुख्य बिंदु

लोक प्रशासन के सिद्धांत: वैज्ञानिक प्रबंधन, मानवीय संबंध, व्यावहारिक, संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक, पारिस्थितिकीय

पेपर III · इकाई 2 अनुभाग 1 / 11 PYQ-शैली 24 मिनट

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मुख्य बिंदु

लोक प्रशासन के इन सिद्धांतों को क्रम से पढ़ने पर साफ दिखता है कि अनुशासन कुशलता-केंद्रित कारखाना-प्रबंधन से मनुष्य, निर्णय, सामाजिक संरचना और प्रशासनिक परिवेश तक फैलता गया।

  1. वैज्ञानिक प्रबंधन (फ्रेडरिक विन्सलो टेलर, १९११): कार्य में वैज्ञानिक विधियाँ लागू करना — समय-गति अध्ययन, मानकीकरण, अवकल टुकड़ा-दर भुगतान। टेलर की वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धांत (१९११) ने प्रत्येक कार्य के लिए एकमात्र सर्वोत्तम तरीका खोजने और कार्य-उपयुक्तता के आधार पर कर्मचारी चयन पर बल दिया। इसका मूल आग्रह था कि काम अनुमान से नहीं, माप, निरीक्षण और प्रशिक्षण से सुधरे।

  2. शास्त्रीय संगठन सिद्धांत ने वैज्ञानिक प्रबंधन को सम्पूर्ण संगठनों तक विस्तारित किया: हेनरी फेयोल के प्रबंधन के १४ सिद्धांत (१९१६) — कार्य-विभाजन, प्राधिकार, अनुशासन, आदेश की एकता, दिशा की एकता, श्रृंखला अनुक्रम, दल-भावना आदि। लिंडॉल अर्विक ने संगठन के सिद्धांत जोड़े (विशेषीकरण, प्राधिकार, नियंत्रण-विस्तार, परिभाषा, समन्वय)।

  3. मानवीय संबंध सिद्धांत (एल्टन मेयो, १९२७–३२): वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कंपनी के हॉथोर्न प्रयोगों ने दर्शाया कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारक — केवल भौतिक परिस्थितियाँ नहीं — श्रमिक उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। हॉथोर्न प्रभाव का अर्थ है कि जब कर्मचारी महसूस करते हैं कि उन्हें देखा और सराहा जा रहा है, तब वे बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

  4. व्यवहारवादी सिद्धांत / निर्णय-निर्माण सिद्धांत (हर्बर्ट साइमन, १९४७): प्रशासनिक व्यवहार — निर्णय-निर्माण प्रशासन का केंद्र है; प्रशासकों की सीमित तार्किकता (परिबद्ध तर्कसंगतता) होती है (अपूर्ण सूचना, समय, संज्ञानात्मक क्षमता की सीमा); वे पूर्ण अनुकूलन की बजाय पर्याप्त-संतोषजनक समाधान खोजते हैं। साइमन ने नोबेल पुरस्कार (अर्थशास्त्र, १९७८) जीता।

  5. संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक सिद्धांत (टालकॉट पार्सन्स, रॉबर्ट के. मर्टन): संगठन सामाजिक तंत्र हैं जिन्हें चार कार्य पूरे करने होते हैं — एजिल: अनुकूलन, लक्ष्य-प्राप्ति, एकीकरण, प्रतिरूप-संरक्षण। रॉबर्ट मर्टन ने नौकरशाही की अकार्यात्मकताएँ रेखांकित कीं — लक्ष्य-विस्थापन, प्रशिक्षित अक्षमता, अति-अनुपालन।

  6. पारिस्थितिकीय उपागम (फ्रेड डब्ल्यू. रिग्स, १९६१): लोक प्रशासन को उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवेश (पारिस्थितिकी) से अलग नहीं पढ़ा जा सकता। रिग्स ने तीन मॉडल विकसित किए: एग्रेरिया (परंपरागत), इंडस्ट्रिया (आधुनिक पश्चिमी), और प्रिज़मैटिक मॉडल (मध्यवर्ती — भारत जैसे विकासशील देशों के लिए विशिष्ट)।

  7. प्रिज़मैटिक (साला) मॉडल (रिग्स, विकासशील देशों में प्रशासन, १९६४): प्रिज़मैटिक समाजों में आधुनिक संस्थाएँ परंपरागत व्यवहारों के साथ सह-अस्तित्व में रहती हैं — औपचारिकता (औपचारिक नियमों और वास्तविक व्यवहार में अंतराल), विविधता (विभिन्न तंत्रों का सहअस्तित्व), बहु-आदर्शवाद (अनेक मूल्य-प्रणालियाँ)। प्रशासनिक इकाई को साला (स्पेनिश शब्द, कार्यालय) कहते हैं।

  8. डगलस मैकग्रेगर का सिद्धांत एक्स और सिद्धांत वाई (१९६०): सिद्धांत एक्स — कर्मचारी आलसी हैं, कार्य से बचते हैं, नियंत्रण और दबाव की आवश्यकता है; सिद्धांत वाई — कर्मचारी स्वयं-प्रेरित, रचनात्मक हैं और जिम्मेदारी चाहते हैं। सिद्धांत वाई सहभागी और लोकतांत्रिक प्रबंधन का आधार है। कार्मिक प्रशासन के लिए यह विशेष रूप से प्रासंगिक है।

  9. अब्राहम मैस्लो का आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धांत (१९४३): पाँच-स्तरीय पिरामिड — शारीरिक → सुरक्षा → सामाजिक (अपनापन) → सम्मान → आत्म-साक्षात्कार। प्रशासक/कर्मचारी उस आवश्यकता से प्रेरित होते हैं जो वर्तमान में अपूर्ण है। मैस्लो का सिद्धांत मानवीय-संबंध और व्यवहारवादी चरणों को जोड़ता है।

  10. लोक प्रशासन में तंत्र सिद्धांत (लुडविग वॉन बर्टलैनफी, कैट्ज और कान द्वारा संगठनों पर लागू, १९६६): संगठन खुले तंत्र हैं — निविष्टि → रूपांतरण प्रक्रिया → निर्गत → प्रतिपुष्टि। प्रत्येक उप-तंत्र परस्पर निर्भर है; पर्यावरणीय परिवर्तन पूरे तंत्र को प्रभावित करता है। इसने पोस्डकॉर्ब की सीमाओं से परे एक समग्र ढाँचा दिया।