शीत युद्ध के बाद का विश्व: अमेरिकी वर्चस्व, बहुध्रुवीयता एवं वैश्विक आतंकवाद
मुख्य तथ्य
- - शीत युद्ध सोवियत संघ के विघटन (25 दिसम्बर 1991) के साथ समाप्त हुआ — इसने एकध्रुवीय विश्व बनाया जिसमें अमेरिका का वर्चस्व था
- - फुकुयामा की "इतिहास का अंत" (1992) उदार लोकतंत्र को अंतिम शासन रूप मानती है
- - 9/11 आतंकी हमलों (11 सितंबर 2001) में अल-कायदा ने 2,977 लोगों को मारा — इसने आतंक के विरुद्ध वैश्विक युद्ध (GWOT) की शुरुआत की
- - नाटो की स्थापना 1949 में 12 सदस्यों के साथ हुई — 2024 तक 32 सदस्यों तक विस्तारित हुआ (स्वीडन फरवरी 2024 में शामिल)
- - चीन का उदय — GDP 2000 में $1.2 लाख करोड़ से बढ़कर 2023 में $17.8 लाख करोड़ — विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी
मुख्य बिंदु
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- शीत युद्ध सोवियत संघ के विघटन (25 दिसम्बर 1991) के साथ समाप्त हुआ
- इसने एकध्रुवीय विश्व बनाया जिसमें अमेरिका का वर्चस्व था
- राजनीतिशास्त्री चार्ल्स क्राथमर ने इसे "एकध्रुवीय क्षण" कहा
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- फुकुयामा की "इतिहास का अंत" (1992) उदार लोकतंत्र को अंतिम शासन रूप मानती है
- हंटिंगटन की "सभ्यताओं के संघर्ष" (1993) सभ्यतागत रेखाओं पर भविष्य के संघर्षों की भविष्यवाणी करती है
- दोनों सिद्धांत आंशिक रूप से सही सिद्ध हुए
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- 9/11 आतंकी हमलों (11 सितंबर 2001) में अल-कायदा ने 2,977 लोगों को मारा
- इसने आतंक के विरुद्ध वैश्विक युद्ध (GWOT) की शुरुआत की
- अफगानिस्तान (अक्टूबर 2001) और इराक (मार्च 2003) में अमेरिकी आक्रमण हुए
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- नाटो की स्थापना 1949 में 12 सदस्यों के साथ हुई
- 2024 तक 32 सदस्यों तक विस्तारित हुआ (स्वीडन फरवरी 2024 में शामिल)
- 9/11 के बाद पहली बार अनुच्छेद 5 (सामूहिक रक्षा) लागू किया गया
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- चीन का उदय — GDP 2000 में $1.2 लाख करोड़ से बढ़कर 2023 में $17.8 लाख करोड़
- विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी
- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI, 2013) 140+ देशों में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती
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- रूस-यूक्रेन युद्ध (24 फरवरी 2022 से) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा सशस्त्र संघर्ष
- नाटो की एकता की परीक्षा हुई और यूरोपीय पुनः शस्त्रीकरण शुरू हुआ
- वैश्विक ऊर्जा बाजारों का पुनर्गठन हुआ
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- अल-कायदा: 1988, ओसामा बिन लादेन, 9/11 के लिए जिम्मेदार
- ISIS/ISIL: जून 2014 में खिलाफत घोषित, 2019 में प्रादेशिक पराजय
- तालिबान: अगस्त 2021 में अफगानिस्तान पर पुनः नियंत्रण
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- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में कई शक्ति केंद्र: अमेरिका, चीन, EU, रूस, भारत
- BRICS का 2024 में 10 सदस्यों तक विस्तार
- SCO का विस्तार पश्चिमी वर्चस्व के क्षय के संकेत देता है
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- वाशिंगटन सर्वसम्मति (निजीकरण, विनियमन-मुक्ति, मुक्त व्यापार) शीत युद्धोत्तर विकास की सोच पर हावी रही
- 2008 वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इसे चुनौतियां मिलीं
- राज्य-नेतृत्व वाले विकास मॉडलों की स्वीकृति बढ़ी
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- UNSC सुधार अनसुलझा: P5 (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन) के पास वीटो शक्ति
- भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान (G4) स्थायी सीटों के लिए अभियान चला रहे हैं
- भारत 8 बार अस्थायी सदस्य रहा (सबसे हाल में 2021–22)
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- साइबर युद्ध और हाइब्रिड खतरे 21वीं सदी के संघर्षों की पहचान बन गए हैं
- 2016 में अमेरिकी चुनाव में रूसी हस्तक्षेप, चीनी हैकिंग अभियान
- ईरानी परमाणु सुविधाओं पर स्टक्सनेट (2010) — महत्वपूर्ण उदाहरण
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- भारत ने गठबंधन से बचते हुए रणनीतिक स्वायत्तता अपनाई
- QUAD में भागीदारी के साथ-साथ रूस, चीन और पश्चिम सभी से संबंध बनाए रखे
- SCO की सुरक्षा बैठकों में पर्यवेक्षक दर्जा बनाए रखा
शीत युद्ध क्या था और उसका अंत कैसे हुआ?
शीत युद्ध १९४७ से १९९१ तक संयुक्त राज्य अमेरिका-नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट और सोवियत संघ-नेतृत्व वाले पूर्वी गुट के बीच वैचारिक, सैन्य और सामरिक प्रतिस्पर्धा था, जिसका अंत सोवियत संघ के विघटन और एकध्रुवीय विश्व के उभार से हुआ। शीत युद्ध (१९४७–१९९१) ने लगभग आधी सदी तक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को परिभाषित किया। यह संयुक्त राज्य अमेरिका-नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट और सोवियत संघ-नेतृत्व वाले पूर्वी गुट के बीच द्विध्रुवीय टकराव था। इस संघर्ष की विशेषताएं थीं — वैचारिक प्रतिद्वंद्विता (उदार लोकतंत्र बनाम मार्क्सवाद-लेनिनवाद), परमाणु निरोध (पारस्परिक सुनिश्चित विनाश), एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में प्रॉक्सी युद्ध, तथा अत्यधिक संसाधन खपत करने वाली हथियारों की होड़। नाटो के आधिकारिक स्थापना-पृष्ठ के अनुसार ४ अप्रैल १९४९ को वाशिंगटन में १२ देशों ने उत्तर अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर किए, इसलिए नाटो को शीत युद्ध की पश्चिमी सुरक्षा-संरचना का संस्थागत आधार माना जाता है।
शीत युद्ध के प्रमुख मील-पत्थर
- १९४७: ट्रूमैन सिद्धांत और मार्शल योजना — अमेरिकी रोकथाम नीति शुरू
- १९४९: नाटो की स्थापना; चीन की साम्यवादी क्रांति (चीन जनवादी गणराज्य की स्थापना)
- १९५०–५३: कोरियाई युद्ध — पहला प्रमुख प्रॉक्सी संघर्ष
- १९६२: क्यूबाई मिसाइल संकट — परमाणु युद्ध के सबसे निकट का क्षण
- १९७९: अफ़गानिस्तान में सोवियत आक्रमण — सोवियत पतन की शुरुआत
- १९८५: मिखाइल गोर्बाचेव ने ग्लासनोस्त (खुलापन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्संरचना) लागू किए
- १९८९: बर्लिन दीवार का पतन (९ नवम्बर १९८९) — शीत युद्ध का प्रतीकात्मक अंत
- १९९१: सोवियत संघ का विघटन — १५ उत्तराधिकारी राज्य; रूस को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सोवियत सीट विरासत में मिली
शीत युद्ध में भारत की स्थिति
भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सह-संस्थापक था — मिस्र के नासिर और यूगोस्लाविया के टीटो के साथ (बांडुंग सम्मेलन, १९५५; बेलग्रेड, १९६१)। भारत ने दोनों गुटों से सहायता और हथियार प्राप्त करते हुए रणनीतिक लचीलापन बनाए रखा। हालांकि, १९७१ के भारत-सोवियत मैत्री, शांति एवं सहयोग संधि के बाद यह सोवियत संघ की ओर झुक गया।
परीक्षा में इस परिचय का उपयोग करते समय मुख्य बात यह है कि शीत युद्ध केवल अमेरिका-सोवियत सैन्य प्रतिस्पर्धा नहीं था; यह विश्व राजनीति की पूरी व्यवस्था, विकास सहायता, हथियार नियंत्रण, गुटनिरपेक्षता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की शक्ति-संरचना को आकार देने वाला दौर था। १९९१ के बाद वही ढांचा टूट गया और अमेरिका के नेतृत्व वाला एकध्रुवीय क्षण शुरू हुआ।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M "एकध्रुवीय विश्व" से क्या आशय है? यह कब और क्यों उभरा?
आदर्श उत्तर
एकध्रुवीय विश्व में एक प्रभुत्वशाली शक्ति अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को नियंत्रित करती है। 25 दिसम्बर 1991 को USSR के विघटन के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बनने पर यह उभरा। चार्ल्स क्राथमर ने इसे "एकध्रुवीय क्षण" कहा। अमेरिकी प्रभुत्व अतुलनीय सैन्य शक्ति, डॉलर-आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था, नाटो विस्तार और IMF जैसी संस्थाओं पर नियंत्रण पर आधारित था।
~50 शब्द • 5 अंक
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