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राजव्यवस्था, शासन एवं समसामयिकी

मुख्य बिंदु

राजस्थान: पंचायती राज, शहरी स्थानीय स्वशासन

पेपर III · इकाई 1 अनुभाग 1 / 11 PYQ-शैली 28 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग प्रीव्यू

मुख्य बिंदु

राजस्थान में स्थानीय स्वशासन को समझने के लिए पंचायती राज संस्थाओं, ग्राम सभा, सुनवाई का अधिकार, पेसा और शहरी स्थानीय निकायों की संरचना को एक साथ पढ़ना जरूरी है।

१. राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, १९९४ — त्रि-स्तरीय संरचना

  • राजस्थान ने ७३वां संविधान संशोधन लागू करने के लिए यह अधिनियम बनाया।
  • तीन स्तर: ग्राम पंचायत → पंचायत समिति → जिला परिषद
  • राजस्थान ७३वें संविधान संशोधन के अनुरूप कानून बनाने वाले शुरुआती राज्यों में था।
  • परीक्षा में इसे केवल संविधान के सामान्य प्रावधान की तरह नहीं, बल्कि राजस्थान के लागू कानून की तरह लिखना चाहिए।

२. राजस्थान के पंचायती राज नेटवर्क का विस्तार

  • नियंत्रक-महालेखा परीक्षक की २०२०-२१ रिपोर्ट के अनुसार मार्च २०२१ में राजस्थान में ११,३४१ ग्राम पंचायतें और ३५२ पंचायत समितियां कार्यरत थीं।
  • जिला परिषदों की परंपरागत संख्या ३३ रही है; २०२३ में बने नए जिलों से कुल प्रशासनिक जिले ५० हो गए।
  • सीमांकन जारी रहने से जिला परिषद की संख्या बदल सकती है, इसलिए परीक्षा उत्तर में “नवीन सीमांकन के अधीन” लिखना सुरक्षित रहता है।

३. पंचायती राज में ५०% महिला आरक्षण

  • राजस्थान तीनों पंचायती राज स्तरों पर महिलाओं को ५०% आरक्षण देता है।
  • यह संवैधानिक न्यूनतम ३३% से अधिक है।
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में है।
  • २०२० चुनावों में महिलाओं ने ५२.८% कुल पंचायत सीटें जीतीं।
  • उत्तर में “संख्या बढ़ी, लेकिन प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता अभी चुनौती है” लिखना जरूरी है, क्योंकि “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्ति अब भी दिखती है।

४. ग्राम सभा — जमीनी लोकतंत्र की आधारशिला

  • ग्राम पंचायत क्षेत्र के सभी वयस्क मतदाता ग्राम सभा का गठन करते हैं।
  • राजस्थान में वर्ष में कम से कम ४ बार बैठक का प्रावधान पढ़ाया जाता है; अनिवार्य राष्ट्रीय/राज्य दिवसों पर बैठकें परीक्षा में खास उपयोगी तथ्य हैं।
  • वार्ड-स्तरीय विकास योजनाओं और स्थानीय कार्यों पर ग्राम सभा की स्वीकृति लोकतांत्रिक जवाबदेही का आधार है।
  • व्यवहार में कम उपस्थिति, जातीय दबाव, महिला भागीदारी की कमी और सचिव-प्रधान निर्भरता इसकी बड़ी चुनौतियां हैं।

५. सुनवाई का अधिकार अधिनियम, २०१२ — राजस्थान का शासन नवाचार

  • राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, २०१२ नागरिक को सरकारी कार्यालय में शिकायत पर सुनवाई और निर्णय की सूचना पाने का विधिक अधिकार देता है।
  • यह नागरिक समाज की जनसुनवाई परंपरा और जवाबदेही आंदोलन से जुड़ा कानून है।
  • अधिकारी को निर्धारित समयसीमा में शिकायत सुननी और निर्णय बताना होता है।
  • बाद में इसे पंचायतों से आगे सभी राज्य सरकारी कार्यालयों के संदर्भ में पढ़ा जाता है।

६. शहरी स्थानीय निकाय — ७४वें संशोधन के बाद की संरचना

  • राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय नगरपालिका क्षेत्र, नगर परिषद और नगर निगम जैसी श्रेणियों में काम करते हैं।
  • स्थानीय स्वशासन विभाग के अनुसार राज्य में अब १० नगर निगम, ५१ नगर परिषद और २४८ नगरपालिकाएं हैं; कुल शहरी निकाय ३०९ हैं।
  • इन्हें राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, २००९ के तहत चलाया जाता है।
  • पुराने नोट्स में “७ नगर निगम” मिलता है, लेकिन परीक्षा में अद्यतन विभागीय संख्या लिखनी चाहिए।

७. १५वें वित्त आयोग के स्थानीय निकाय अनुदान

  • १५वें वित्त आयोग ने २०२१-२६ के लिए स्थानीय सरकारों को बड़े पैमाने पर अनुदान सुझाए; सही राष्ट्रीय कुल में ग्रामीण स्थानीय निकाय, शहरी स्थानीय निकाय और स्वास्थ्य अनुदान अलग-अलग पढ़े जाते हैं।
  • ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए अनुदान स्वच्छता, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी शर्तों के साथ आते हैं।
  • सशर्त अनुदान निर्धारित कार्यों पर ही खर्च किए जा सकते हैं।
  • राजस्थान के उत्तर में इसे “राजकोषीय विकेंद्रीकरण बनाम व्यय-शर्त” के कोण से लिखना चाहिए।

८. राजस्थान राज्य वित्त आयोग

  • राज्य वित्त आयोग राज्य और स्थानीय निकायों के बीच राज्य करों, शुल्कों और अनुदानों के बंटवारे पर सिफारिश करता है।
  • राजस्थान का छठा राज्य वित्त आयोग २०२१ में गठित हुआ और २०२०-२५ की अवधि से जुड़ा है; इसे २०२३ में गठित बताना त्रुटिपूर्ण है।
  • पिछले आयोगों ने जनसंख्या और क्षेत्रफल जैसे आधारों पर क्षैतिज हस्तांतरण सूत्र सुझाए।
  • ७३वें और ७४वें संशोधन के तहत राज्य वित्त आयोग संवैधानिक आवश्यकता है।

९. राजस्थान संपर्क और व्यापक शिकायत-निवारण दायरा

  • सुनवाई व्यवस्था पंचायतों से आगे सरकारी विभागों तक नागरिक शिकायतों की समयबद्ध सुनवाई से जुड़ती है।
  • नागरिक आवेदन कर सकते हैं, शिकायत दर्ज कर सकते हैं और निर्णय की सूचना पाने के हकदार हैं।
  • राजस्थान संपर्क पोर्टल और १८१ हेल्पलाइन शिकायतों की निगरानी और ट्रैकिंग का प्रमुख माध्यम हैं।

१०. पेसा — राजस्थान में जनजातीय स्वशासन
- पेसा अधिनियम, १९९६ ने पंचायती राज को बढ़ी हुई शक्तियों के साथ जनजातीय पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में विस्तारित किया।
- राजस्थान ने २०११ में पेसा नियम अधिसूचित किए; बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ तथा उदयपुर, सिरोही, राजसमंद और चित्तौड़गढ़ के अनुसूचित/आंशिक क्षेत्र इससे जुड़े हैं।
- अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण, खनन पट्टा या परियोजना स्वीकृति से पहले ग्राम सभा/उचित पंचायती निकाय से परामर्श या सहमति का मुद्दा मुख्य परीक्षा में केंद्रीय है।

११. जयपुर नगर निगम और स्मार्ट सिटी संदर्भ
- जयपुर राजस्थान का सबसे प्रमुख शहरी निकाय क्षेत्र है और शहरी शासन, विरासत संरक्षण, परिवहन तथा स्वच्छता के प्रश्नों में बार-बार उदाहरण बनता है।
- केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी मिशन के तहत राजस्थान के चार शहर — जयपुर, उदयपुर, कोटा और अजमेर चुने गए; जोधपुर को इस सूची में जोड़ना तथ्यात्मक त्रुटि है।
- यह कार्यक्रम केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी मिशन से जुड़ा था, जिसकी शुरुआत २०१५ में हुई थी।

१२. ७४वें संशोधन के तहत वार्ड समितियां
- ७४वां संविधान संशोधन अधिनियम, १९९२ ने ३ लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में वार्ड समितियां अनिवार्य कीं।
- वार्ड समितियां उप-नगर लोकतंत्र के लिए वार्ड-स्तरीय निर्वाचित निकाय हैं।
- राजस्थान में वार्ड समितियां बनीं, लेकिन संसाधन, कर्मचारी और वास्तविक निर्णय-अधिकार की कमी से प्रभावी कार्यान्वयन सीमित रहा

१३. पंचायत चुनावों के लिए दो-बच्चा मानदंड
- राजस्थान के पंचायती राज कानून में निर्धारित तिथि के बाद दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने का प्रावधान पढ़ाया जाता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य में ऐसे प्रावधान को संवैधानिक माना।
- यह विवादास्पद है, क्योंकि आलोचकों के अनुसार इसका असर गरीब, महिला और कुछ समुदायों पर असमान रूप से पड़ सकता है।