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मुख्य बिंदु
मतदान व्यवहार, चुनावी सुधार और निर्वाचन को साथ पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले मतदाता के निर्णय, फिर निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका, और फिर ईवीएम, वीवीपैट, नोटा, चुनावी वित्त, खर्च-निगरानी और एक साथ चुनाव जैसे सुधारों को अलग-अलग पकड़ लिया जाए। भारत निर्वाचन आयोग की राजस्थान विधानसभा चुनाव २०२३ सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार अंतिम मतदान ७५.३३ प्रतिशत था, इसलिए मूल रूप से चलने वाला ७४.२ प्रतिशत आँकड़ा अंतिम आधिकारिक मतदान नहीं माना जाएगा।
१. मतदान व्यवहार — प्रमुख निर्धारक
- व्यक्तियों/समूहों के मतदान निर्णय का प्रतिरूप — मतदान करना है या नहीं, और किसे मत देना है
- जाति भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारक है
- अन्य कारक: धर्म, क्षेत्रीय/भाषायी पहचान, सत्ता-विरोध
- उम्मीदवार की छवि, दलीय नेतृत्व, कल्याण वितरण, आर्थिक मुद्दे भी विकल्प को प्रभावित करते हैं
२. भारत निर्वाचन आयोग — संवैधानिक आधार
- संविधान के अनुच्छेद ३२४ के तहत स्थापित
- संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण
- २०२५ तक और वर्तमान संरचना में: मुख्य निर्वाचन आयुक्त + २ निर्वाचन आयुक्त
- एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय
३. ईवीएम और वीवीपैट — प्रमुख तथ्य
- ईवीएम का उपयोग २००४ से सभी आम चुनावों में
- बीईएल (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड) और ईसीआईएल (इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) द्वारा निर्मित
- स्वतंत्र — इंटरनेट से नहीं जुड़े; तकनीकी विशेषज्ञ समितियों द्वारा प्रमाणित
- वीवीपैट मशीनें २०१९ लोकसभा चुनावों से राष्ट्रव्यापी तैनात
४. नोटा — परिचय और प्रभाव
- पीयूसीएल बनाम भारत संघ (२०१३) के सर्वोच्च न्यायालय आदेश के बाद प्रारंभ
- ईवीएम पर मतपत्र के अंतिम विकल्प के रूप में उपलब्ध
- नोटा मत अलग से गिने और प्रकाशित किए जाते हैं
- परिणाम प्रभावित नहीं होते — यदि नोटा को सर्वाधिक मत मिलें तो भी पुनर्चुनाव नहीं; उम्मीदवारों में अगला सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजयी होता है
५. आदर्श आचार संहिता — प्रकृति एवं दायरा
- चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद लागू
- प्रतिबंध: नई योजनाओं की घोषणा, प्रचार के लिए सरकारी तंत्र का उपयोग, निर्वाचन आयोग की अनुमति के बिना वरिष्ठ अधिकारियों का स्थानांतरण
- कोई वैधानिक आधार नहीं — निर्वाचन आयोग की नैतिक प्रभुत्ता और अनुच्छेद ३२४ की शक्तियों द्वारा लागू
६. जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम — अंतर
- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम १९५०: निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और मतदाता सूची तैयार करना
- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१: चुनाव का संचालन, उम्मीदवारों की योग्यता, चुनावी अपराध, भ्रष्ट आचरण, चुनाव विवाद
- ये दोनों अधिनियम मिलकर प्राथमिक चुनावी विधान बनाते हैं
७. चुनावी बॉण्ड — योजना और रद्दीकरण
- चुनावी बॉण्ड योजना (२०१८): गुमनाम वित्तपोषण — एसबीआई से बॉण्ड खरीदकर राजनीतिक दलों को दान
- एडीआर बनाम भारत संघ (२०२४): पाँच न्यायाधीशों की सर्वोच्च न्यायालय पीठ ने सर्वसम्मति से असंवैधानिक घोषित किया
- मतदाताओं के अनुच्छेद १९(१)(क) के तहत सूचना के अधिकार का उल्लंघन
- एसबीआई को सभी डेटा निर्वाचन आयोग को सौंपने का निर्देश; दाता-प्राप्तकर्ता डेटा सार्वजनिक प्रकाशित
८. मतदाता मतदान प्रवृत्तियाँ
- २०२४ लोकसभा: मतदान केंद्रों पर ६५.७९ प्रतिशत मतदान; लगभग ९७ करोड़ पात्र मतदाता; ५४३ लोकसभा सीटों की चुनावी प्रक्रिया, मतदान ५४२ संसदीय क्षेत्रों पर; ७ चरण
- १९५२ (४५.७ प्रतिशत) से मतदान में सामान्यतः वृद्धि हुई
- २०१४ के बाद कुछ चुनावों में महिला मतदान पुरुषों से अधिक
- राजस्थान २०२३ विधानसभा चुनाव: अंतिम आधिकारिक मतदान ७५.३३ प्रतिशत
९. सत्ता-विरोध — भारतीय प्रतिरूप
- भारतीय चुनावों में सर्वाधिक प्रभावी शक्तियों में से एक
- राज्य स्तर पर सत्तारूढ़ दल लगभग ६०–७० प्रतिशत चुनाव हारते हैं
- शासन की विफलता, अधूरे वादों और नेतृत्व की थकान की मतदाता द्वारा सज़ा
- राजस्थान: १९९३ से भाजपा-कांग्रेस का एकांतर — सत्ता-विरोध का उत्कृष्ट उदाहरण
१०. चुनाव सुधार समितियाँ
- विधि आयोग रिपोर्ट २५५ (२०१५): चुनाव में राज्य वित्तपोषण, व्यय सीमा, मत खरीद का अपराधीकरण, विवाद का शीघ्र निपटारा
- दिनेश गोस्वामी समिति (१९९०): चुनाव में आंशिक राज्य वित्तपोषण की सिफारिश
- इंद्रजीत गुप्त समिति (१९९८): आंशिक राज्य वित्तपोषण की सिफारिश
११. मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्ति अधिनियम २०२३ — परिवर्तित प्रक्रिया
- नियुक्ति अब ३ सदस्यीय चयन समिति द्वारा: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)
- ५ वरिष्ठ नौकरशाहों की खोज समिति नामों का पैनल तैयार करती है
- पूर्व प्रक्रिया: राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति — कोई औपचारिक समिति नहीं
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (२०२३): सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के प्रधान न्यायाधीश सहित स्वतंत्र समिति का निर्देश दिया था; नए कानून ने प्रधान न्यायाधीश को बाहर रखा
१२. एक राष्ट्र एक चुनाव — कोविंद समिति (२०२४)
- राम नाथ कोविंद समिति (२०२४) ने लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव की सिफारिश की
- लाभ: चुनावी खर्च में कमी, निरंतर आदर्श आचार संहिता प्रतिबंधों का अंत, बेहतर शासन निरंतरता
- चुनौतियाँ: राज्यों की संघीय स्वायत्तता, समय से पूर्व विघटन के परिदृश्य
- आवश्यक संवैधानिक संशोधन: अनुच्छेद ८३, ८५, १७२, १७४
