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मुख्य बिंदु
दलीय व्यवस्था, क्षेत्रवाद और गठबंधन राजनीति को साथ पढ़ने का सार यह है कि भारत में राष्ट्रीय सत्ता अक्सर बहुदलीय प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय पहचान और सत्ता-साझेदारी के मेल से बनती है।
१. बहुदलीय व्यवस्था — भारत की संरचना
- १९८९ के बाद अधिकांश चुनावों में कोई एक दल संसदीय बहुमत नहीं पा सका
- पीआईबी की ९ अगस्त २०२५ की भारत निर्वाचन आयोग विज्ञप्ति के अनुसार आयोग के साथ ६ राष्ट्रीय दल, ६७ प्रादेशिक दल और २,८५४ पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल पंजीकृत थे
- कुल पंजीकृत दलों का आँकड़ा समय-समय पर बदलता है; इसलिए परीक्षा में स्थिर उत्तर देते समय “भारत निर्वाचन आयोग की अद्यतन सूची” लिखना सुरक्षित है
२. दलीय व्यवस्था का विकास — चार चरण
- एकदल-प्रभुत्व (१९५२–१९६७): कांग्रेस युग — “कांग्रेस प्रणाली” (रजनी कोठारी)
- कांग्रेस का पतन (१९६७–१९८९): राज्य स्तर पर गठबंधन; आपातकाल; जनता प्रयोग
- गठबंधन युग (१९८९–२०१४): नेशनल फ्रंट, संयुक्त मोर्चा, एनडीए-प्रथम, यूपीए-प्रथम व द्वितीय — २५ वर्षों तक किसी एक दल को लोकसभा बहुमत नहीं
- प्रभुत्व की वापसी (२०१४–वर्तमान): भाजपा-नेतृत्व एनडीए को बड़े जनादेश; क्षेत्रीय विविधता बनी हुई है; २०२४ में आंशिक गठबंधन की वापसी
३. क्षेत्रवाद — परिभाषा और प्रकार
- किसी विशेष क्षेत्र के हितों, पहचान और स्वायत्तता का केंद्रीय सत्ता के विरुद्ध प्रकटीकरण
- सकारात्मक क्षेत्रवाद: क्षेत्रीय विकास की माँगें, सांस्कृतिक गौरव
- नकारात्मक क्षेत्रवाद: अलगाववाद, प्रवासी-विरोधी आंदोलन
- भारत इसे संघवाद, अनुच्छेद ३ (नए राज्य) और अनुसूचित क्षेत्र प्रावधानों से प्रबंधित करता है
४. क्षेत्रीय दल — भारतीय राजनीति का पुनर्निर्धारण
- प्रमुख दल: डीएमके (१९४९), टीडीपी (१९८२), टीएमसी (१९९८), आप (२०१२), बीआरएस
- ये उप-राष्ट्रीय राजनीतिक पहचानों के उभार को दर्शाते हैं
- १९८९–२०१४ की गठबंधन सरकारों में क्षेत्रीय दल सत्ता-संतुलन की कुंजी रहे
५. गठबंधन राजनीति — दो मुख्य प्रकार
- चुनाव-पूर्व गठबंधन: चुनाव से पहले दल घोषणा करते हैं — जैसे भाजपा-नेतृत्व एनडीए, कांग्रेस-नेतृत्व इंडिया गठबंधन २०२४
- चुनाव-पश्चात् गठबंधन: परिणामों के बाद दल जुड़ते हैं — जैसे १९९६–२००४ के संयुक्त मोर्चा/अल्पमत अनुभव
- गठबंधन धर्म के लिए आवश्यक है: नीतिगत समझौता, सत्ता-साझेदारी और समन्वय समितियाँ
६. राष्ट्रीय दल मान्यता मापदंड (भारत निर्वाचन आयोग)
- कम से कम ३ अलग-अलग राज्यों से कुल लोकसभा सीटों का २ प्रतिशत जीतना, अथवा
- लोकसभा चुनावों में ४ या अधिक राज्यों में कम से कम ६ प्रतिशत मत-हिस्सा प्राप्त करना तथा ४ सीटें जीतना, अथवा
- ४ या अधिक राज्यों में राज्य दल के रूप में मान्यता प्राप्त होना
- राष्ट्रीय दल का चुनाव-चिह्न देशभर में उसी दल के लिए सुरक्षित रहता है
७. भारत में क्षेत्रवाद के कारण
- भाषाई माँगें: आंध्र प्रदेश १९५३, तेलंगाना २०१४
- आर्थिक असमानताएँ: पिछड़े क्षेत्र अलग राज्यत्व की माँग कर रहे हैं — बोडोलैंड, विदर्भ, पूर्वांचल
- सांस्कृतिक पहचान का दावा: तमिलनाडु का द्रविड़ गौरव, पूर्वोत्तर की जनजातीय पहचान
- केंद्र-राज्य नीतिगत शिकायतें: संसाधन साझेदारी, विशेष श्रेणी का दर्जा, वित्तीय विकेंद्रीकरण
८. प्रमुख गठबंधन सरकारें और उनकी उपलब्धियाँ
- एनडीए-प्रथम (१९९९–२००४): वाजपेयी; २४ गठबंधन साझेदार — भारतीय इतिहास का सबसे व्यापक केंद्र-गठबंधन
- यूपीए-प्रथम (२००४–२००९): कांग्रेस-नेतृत्व; डीएमके, एनसीपी, टीएमसी सहित १० से अधिक साझेदार; वामदलों का २००४–०८ तक बाहरी समर्थन
- यूपीए-द्वितीय (२००९–२०१४): कांग्रेस अकेले २०६ सीटें; टीएमसी २०१२ में अलग हुई
- गठबंधन युग की उपज: आरटीआई (२००५), एनआरईजीएस (२००५), आरटीई (२००९)
९. दल-बदल विरोधी कानून — दसवीं अनुसूची (१९८५)
- दल-बदल की अस्थिरता रोकने के लिए ५२वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ी गई
- ऐसे विधायक को अयोग्य ठहराती है जो स्वेच्छा से दल-सदस्यता त्याग दे या पूर्व अनुमति के बिना दलीय निर्देश के विरुद्ध मत दे
- विलय छूट: यदि दल के दो-तिहाई विधायक विलय का समर्थन करें
- निर्णयकर्ता प्राधिकारी: स्पीकर/सभापति (पक्षपातपूर्ण होने की आलोचना)
१०. राजस्थान में द्विदलीय प्रवृत्ति
- १९९३ से भाजपा और कांग्रेस हर पाँच वर्ष में बारी-बारी सत्ता में आते रहे हैं
- पैटर्न: कांग्रेस १९९८–२००३ → भाजपा २००३–०८ → कांग्रेस २००८–१३ → भाजपा २०१३–१८ → कांग्रेस २०१८–२३ → भाजपा २०२३–वर्तमान
- २०२३ के चुनावों में भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) एक तीसरी शक्ति के रूप में उभरी
११. इंडिया गठबंधन (२०२४)
- भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन — भाजपा-एनडीए के विरुद्ध जून २०२३ में गठित २६-दलीय विपक्षी गठबंधन
- २०२४ लोकसभा चुनावों में २३४ सीटें जीतीं (एनडीए: २९३, अन्य: १६)
- गठबंधन राजनीति भारत के संघीय लोकतंत्र का केंद्रीय तत्त्व बनी हुई है
१२. दलीय व्यवस्था का वर्गीकरण — सारतोरी की प्ररूप-विज्ञान
- १९५२–१९६७: प्रभुत्वशाली दल व्यवस्था (सारतोरी का कांग्रेस-प्रभुत्व के लिए प्रयुक्त शब्द)
- १९६७ के बाद: मजबूत वैचारिक ध्रुवों और खंडित केंद्र के साथ ध्रुवीकृत बहुलवाद की ओर रुझान
- समकालीन भारत: मध्यम बहुलवाद के निकट — राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का प्रभुत्व और मजबूत क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति
