मुख्य तथ्य

  • मूल ढाँचे का सिद्धांत — केशवानंद भारती (1973) — केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में स्थापित — 13 न्यायाधीशों की पीठ, 7:6 बहुमत
  • अनुच्छेद 368 — संशोधन प्रक्रिया — संशोधन विधेयक संसद के प्रत्येक सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत से पास होना चाहिए
  • 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976 — "लघु-संविधान" — आपातकाल में पारित; अब तक का सबसे व्यापक संशोधन — प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' जोड़े
  • 44वाँ संशोधन, 1978 — आपातकालीन विरासत को पलटना — 42वें संशोधन के कई बदलाव पलटे — सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाया
  • 73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992) — स्थानीय स्वशासन — 73वाँ संशोधन ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया; 11वीं अनुसूची (29 कार्य) जोड़ी

मुख्य बिंदु

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    मूल ढाँचे का सिद्धांत — केशवानंद भारती (1973)

    • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में स्थापित
    • 13 न्यायाधीशों की पीठ, 7:6 बहुमत
    • संसद अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है
    • संविधान के "मूल ढाँचे" को नष्ट नहीं कर सकती
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    मूल ढाँचे के तत्त्व

    • संविधान की सर्वोच्चता; गणतंत्र एवं लोकतांत्रिक स्वरूप
    • पंथनिरपेक्षता; शक्तियों का पृथक्करण; संघीय चरित्र
    • न्यायिक समीक्षा; विधि का शासन; स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव
    • न्यायपालिका की स्वतंत्रता; राष्ट्र की एकता एवं अखंडता
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    अनुच्छेद 368 — संशोधन प्रक्रिया

    • संशोधन विधेयक संसद के प्रत्येक सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत से पास होना चाहिए
    • विशेष बहुमत = कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित तथा मतदान करने वालों का दो-तिहाई
    • कुछ संशोधनों के लिए कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी आवश्यक
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    संशोधन की तीन प्रक्रियाएं

    • (i) साधारण बहुमत — सामान्य विधायी प्रक्रिया, जैसे नए राज्यों का गठन
    • (ii) विशेष बहुमत — दो-तिहाई + पूर्ण बहुमत; अधिकांश संवैधानिक संशोधन
    • (iii) विशेष बहुमत + राज्यों का अनुसमर्थन — संघीय प्रावधान: न्यायपालिका, राष्ट्रपति का चुनाव, शक्तियों का वितरण
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    42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976 — "लघु-संविधान"

    • आपातकाल में पारित; अब तक का सबसे व्यापक संशोधन
    • प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' जोड़े
    • अनुच्छेद 51ए के तहत मूल कर्तव्य जोड़े
    • कई विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित; न्यायिक समीक्षा सीमित की
    • सभी राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व को अनुच्छेद 14 और 19 पर वरीयता दी
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    44वाँ संशोधन, 1978 — आपातकालीन विरासत को पलटना

    • 42वें संशोधन के कई बदलाव पलटे
    • सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाया — अनुच्छेद 300A के तहत कानूनी अधिकार बनाया
    • निवारक निरोध के लिए न्यायिक समीक्षा बहाल की
    • आपातकाल-पूर्व न्यायिक शक्तियाँ बहाल कीं
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    73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992) — स्थानीय स्वशासन

    • 73वाँ संशोधन ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया; 11वीं अनुसूची (29 कार्य) जोड़ी
    • 74वाँ संशोधन ने नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया; 12वीं अनुसूची (18 कार्य) जोड़ी
    • दोनों ने राज्य वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की
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    86वाँ संशोधन (2002) — शिक्षा का अधिकार

    • अनुच्छेद 21A जोड़ा — 6–14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया
    • RTE अधिनियम 2009 से लागू किया गया
    • 11वाँ मूल कर्तव्य भी जोड़ा: बच्चों को शिक्षा दिलाना माता-पिता का कर्तव्य
  9. 9

    101वाँ संशोधन (2016) — GST

    • वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया — अनेक अप्रत्यक्ष करों को प्रतिस्थापित किया
    • अनुच्छेद 279A के तहत GST परिषद गठित
    • अनुच्छेद 246A ने संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को GST पर कानून बनाने का अधिकार दिया
    • 1950 के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण राजकोषीय संघवाद संशोधन
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    103वाँ संशोधन (2019) — EWS आरक्षण

    • अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण
    • शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी रोजगार में लागू
    • सुप्रीम कोर्ट ने जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2022) में 3:2 से इसे बरकरार रखा
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    अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी (2019)

    • राष्ट्रपति आदेश और अनुच्छेद 356 के तहत संसदीय प्रस्ताव से लागू
    • जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति हटाई; संसद ने जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के रूप में कार्य किया
    • सुप्रीम कोर्ट ने दिसम्बर 2023 में (अनुच्छेद 370 प्रकरण) इसे वैध माना
    • न्यायालय ने सितम्बर 2024 तक जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने का निर्देश दिया
  12. 12

    भावी प्रभाव से निर्णय पलटने का सिद्धांत

    • गोलक नाथ (1967) में प्रस्तुत: पूर्व निर्णयों को पलटने वाले निर्णय केवल भविष्य के मामलों पर लागू
    • पुराने कानून के तहत अर्जित अधिकारों की रक्षा की गई
    • यह सिद्धांत स्वयं केशवानंद भारती (1973) में पलट दिया गया

परिचय एवं संदर्भ

संशोधन शक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही तय करती है कि संविधान समय के साथ बदलेगा कैसे और उसकी मूल पहचान कितनी सुरक्षित रहेगी। राजस्थान लोक सेवा आयोग के राज्य एवं अधीनस्थ सेवा पाठ्यक्रम में प्रश्नपत्र ३ की इकाई १ के भीतर "भारतीय संविधान: निर्माण, विशेषताएँ, संशोधन, मूल ढाँचा" को अलग पाठ्य-विषय के रूप में रखा गया है।

संशोधन शक्ति क्यों महत्वपूर्ण है

संविधान में संशोधन की शक्ति और उस पर सीमाएं भारतीय संवैधानिक कानून के सर्वाधिक विवादित क्षेत्रों में से एक हैं। मूल ढांचा सिद्धांत, जो सर्वोच्च न्यायालय और संसद के बीच नौ वर्षीय न्यायिक संघर्ष से उत्पन्न हुआ, तुलनात्मक संवैधानिक सिद्धांत में भारत का अनूठा योगदान है। किसी अन्य लोकतंत्र ने न्यायाधीशों द्वारा निर्मित कानून से संशोधन शक्ति पर ऐसा सैद्धांतिक नियंत्रण विकसित नहीं किया है।

एक कठोर संविधान जिसमें संशोधन नहीं हो सकता, पुराना पड़ जाता है। एक लचीला संविधान जिसे आसानी से बदला जा सके, दलगत उद्देश्यों के लिए विकृत किया जा सकता है। अनुच्छेद ३६८ इन चिंताओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है — विशेष बहुमत की अनिवार्यता द्वारा जल्दबाज़ी या पक्षपातपूर्ण संशोधनों को रोकते हुए आवश्यक परिवर्तन की अनुमति देता है।

राजस्थान लोक सेवा आयोग २०२६ के लिए परीक्षा की दृष्टि

राजस्थान लोक सेवा आयोग २०२६ परीक्षा के लिए इस विषय में दो अलग कोण हैं:

  • सैद्धांतिक: मूल ढांचा, संशोधन प्रक्रिया, प्रमुख मामले
  • तथ्यात्मक: विशिष्ट संशोधन — उनकी संख्या, वर्ष, सामग्री

दोनों से ५ अंक के प्रश्न बन सकते हैं। १० अंक के प्रश्न आमतौर पर आलोचनात्मक विश्लेषण मांगते हैं।


संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M मूल संरचना सिद्धांत क्या है? इसके कोई चार तत्व लिखिए। 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

Basic Structure Doctrine, Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) में 7:6 बहुमत से स्थापित, यह मानती है कि Parliament अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किसी भी संवैधानिक प्रावधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की अनिवार्य विशेषताओं को नष्ट नहीं कर सकती। Basic Structure के चार तत्व: (1) judicial review, (2) न्यायपालिका की स्वतंत्रता, (3) पंथनिरपेक्ष चरित्र, (4) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव। यह सिद्धांत असीमित संसदीय संप्रभुता पर अंकुश लगाता है।

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