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समसामयिकी में राजस्थान की भू-विरासत क्यों महत्त्वपूर्ण है?
समसामयिकी में राजस्थान की भू-विरासत इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यूनेस्को भू-उद्यान, क्रिटिकल खनिज सर्वेक्षण, डेजर्ट नेशनल पार्क, सौर ऊर्जा कॉरिडोर और मरुस्थल अनुसंधान अब एक ही नीति-क्षेत्र में टकरा रहे हैं। भारत सरकार की २९ जनवरी २०२५ की पीआईबी विज्ञप्ति के अनुसार राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन को ७ वर्षों के लिए ३४,३०० करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ स्वीकृत किया गया।
हालिया घटनाएँ
भारत का लमहेटा घाट भू-उद्यान मूल्यांकन: यूनेस्को/अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक विशेषज्ञों का लमहेटा घाट, जबलपुर, मध्यप्रदेश, से जुड़ा मूल्यांकन भारत के लिए पहला बड़ा भू-उद्यान परीक्षण है। परिणाम राजस्थान सहित अन्य संभावित स्थलों के लिए भारत के दृष्टिकोण को सीधे प्रभावित करेगा। यदि लमहेटा घाट को नामांकन मिलता है, तो भारतीय राज्यों के लिए भू-उद्यान नामांकन की संरचना का टेम्पलेट बनेगा।
राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन: केंद्रीय बजट २०२४-२५ में लिथियम, कोबाल्ट और रणनीतिक खनिजों की खोज पर ध्यान देते हुए राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन की घोषणा की गई, और जनवरी २०२५ में मंत्रिमंडल ने इसे स्वीकृत किया। मिशन में भू-सर्वेक्षण घटक शामिल हैं जो साथ-साथ सर्वेक्षण कॉरिडोर में भू-धरोहर स्थलों का दस्तावेज़ीकरण भी सुधार सकते हैं। राजस्थान के अरावली और मरुस्थल क्षेत्र में इसका असर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
डेजर्ट नेशनल पार्क सीमा और ऊर्जा कॉरिडोर बहस: जैसलमेर में डेजर्ट नेशनल पार्क, गोडावण संरक्षण, सौर ऊर्जा कॉरिडोर और जीवाश्मीय भू-विरासत एक ही भू-दृश्य में मौजूद हैं। किसी भी सीमा या बफर परिवर्तन का प्रभाव पार्क के भीतर और आसपास के जीवाश्म-युक्त क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसलिए यह संरक्षण और विकास के बीच वर्तमान नीति तनाव है।
आईआईटी जोधपुर और मरुस्थल भूविज्ञान अनुसंधान: आईआईटी जोधपुर के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग ने टिब्बा अवसादों की प्रकाश-उत्तेजित ल्यूमिनेसेंस डेटिंग और थार पुरापर्यावरण विज्ञान पर शोध किया है। ऐसे अध्ययन राजस्थान में चतुर्थांश जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक डेटा उत्पन्न करते हैं और संभावित जैसलमेर भू-उद्यान नामांकन के लिए वैज्ञानिक आधार मजबूत कर सकते हैं।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भू-विरासत पोर्टल: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने डिजिटल भू-विरासत पोर्टल विकसित किया है, जिसमें निर्देशांक, फोटोग्राफ और भूवैज्ञानिक विवरण के साथ राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारकों की जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। इससे राजस्थान के स्थलों सहित भू-धरोहर जानकारी तक सार्वजनिक पहुँच सुधरती है।
वर्तमान मामलों से संभावित परीक्षा प्रश्न
१. संभावित प्रश्न: भारत ने अपना पहला यूनेस्को भू-उद्यान नामांकन किस स्थल से आगे बढ़ाया और भारत देर से क्यों रहा?
उत्तर संकेत: लमहेटा घाट, जबलपुर; कारण — समर्पित भू-धरोहर कानून का अभाव, प्रबंधन ढाँचा कमजोर, राज्य सरकारों में कम जागरूकता, भूवैज्ञानिक स्मारकों पर मंत्रालयों का क्षेत्राधिकार बिखरा हुआ।
२. संभावित प्रश्न: भू-धरोहर संरक्षण में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की भूमिका पर चर्चा करें। राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक ढाँचा कितना प्रभावी है?
उत्तर संकेत: १९७६ से भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण दायित्व; राष्ट्रीय स्मारक घोषित; सीमाएँ — प्रशासनिक सूचना, वैधानिक समर्थन नहीं, अतिक्रमण के विरुद्ध प्रवर्तन कमजोर; १९५८ के पुरातत्व कानून के अंतर्गत संरक्षित पुरातात्विक स्मारकों से तुलना।
३. संभावित प्रश्न: राजस्थान के थार मरुस्थल क्षेत्र में सतत विकास में भू-पर्यटन किस प्रकार योगदान कर सकता है?
उत्तर संकेत: साम टिब्बे का मौजूदा आधार; अकाल फॉसिल पार्क संवर्धन; स्थानीय गाइड रोजगार; मरुस्थलीय समुदाय आय विविधीकरण; राजस्थान पर्यटन नीति २०२० के भू-पर्यटन उल्लेख से जोड़ें; आगंतुक केंद्र, पथ और भूवैज्ञानिक व्याख्या की आवश्यकता।
