सार्वजनिक अनुभाग प्रीव्यू
मुख्य बिंदु
१. राजस्थान में ७ प्रमुख मृदा प्रकार हैं: मरुस्थलीय/शुष्क, जलोढ़, लाल, लैटेराइट, काली (रेगुर), भूरी/वनीय और लवणीय-क्षारीय मिट्टियाँ।
२. मरुस्थलीय/शुष्क मिट्टी वायु-निक्षेपित है और राजस्थान के कुल क्षेत्रफल के लगभग ६१% भाग में फैली है। इसका मुख्य विस्तार बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर सहित पश्चिमी जिलों में है।
३. पूर्वी राजस्थान की जलोढ़ मिट्टियाँ चंबल, बनास, गंभीर और बाणगंगा नदी तंत्रों के साथ मिलती हैं। गेहूँ, सरसों और सोयाबीन जैसी सिंचित खेती के लिए ये राज्य की अधिक उत्पादक मिट्टियों में गिनी जाती हैं।
४. लाल मिट्टी लौहमय प्रकृति की है। यह दक्षिण-पूर्वी आदिवासी पट्टी के डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों में मिलती है और प्री-कैम्ब्रियन नाइसिक चट्टानों से बनी मानी जाती है।
५. काली मिट्टी या रेगुर दक्कन बेसाल्ट से निकली है। कोटा, बूंदी, झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ जिलों में इसका विस्तार है; गीली होने पर यह फूलती और सूखने पर दरारें डालती है।
६. लैटेराइट मिट्टी उदयपुर, सिरोही और प्रतापगढ़ की पहाड़ी पट्टी तक सीमित है। अधिक वर्षा और निक्षालन की दशाओं में इसका निर्माण होता है।
७. लवणीय-क्षारीय मिट्टी को उसर/बंजर प्रकृति की मिट्टी भी कहा जाता है। सांभर, डीडवाना, डेगाना और उत्तरी राजस्थान के इंदिरा गांधी नहर परियोजना कमांड क्षेत्र में यह विशेष रूप से दिखाई देती है।
८. आईसीएआर वर्गीकरण अर्थात भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का वर्गीकरण राजस्थान की मिट्टियों को ८ क्रमों में रखता है: एरिडीसॉल, एंटीसॉल, इनसेप्टीसॉल, अल्फीसॉल, वर्टीसॉल, मॉलिसॉल, ऑक्सीसॉल और अल्टीसॉल।
९. प्रमुख मृदा समस्याएँ पवन अपरदन, जलभराव, लवणता/क्षारता और जस्ता, बोरॉन तथा गंधक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हैं। थार मरुस्थल में अपरदित भूमि का बड़ा भाग पवन अपरदन से जुड़ा माना गया है।
१०. मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना १९ फरवरी २०१५ को सूरतगढ़, राजस्थान से राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुई। पहले दो चक्रों में देश में १०.७४ करोड़ और ११.६९ करोड़ कार्ड बाँटे गए; राजस्थान के संदर्भ में पुराने अध्ययनों में ७२.६६ लाख कार्ड का चक्र-१ और चक्र-२ योग प्रचलित है।
११. राजस्थान कृषि विभाग के आधिकारिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड दस्तावेज़ में राज्य में ११३ कुल मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएँ और ११.० लाख नमूने प्रति वर्ष की कुल परीक्षण क्षमता दी गई है। इसलिए पुराने २७ प्रयोगशाला/४ लाख नमूना आँकड़े को उत्तर में सावधानी से जाँचना चाहिए।
१२. सक्रिय थार मरुस्थल क्षेत्रों में पवन अपरदन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष लगभग ६०–१०० टन ऊपरी मिट्टी हटा सकता है। काजरी के अंतर्गत रक्षात्मक वृक्ष-पट्टी जैसे पंक्ति-वृक्षारोपण उपाय मृदा-हानि को ४०–६०% तक घटाती हैं।
१३. इंदिरा गांधी नहर परियोजना के कमांड क्षेत्र में सिंचाई ने बीकानेर, जैसलमेर, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में लगभग ७.९ लाख हेक्टेयर मरुस्थल को कृषि योग्य बनाया। परन्तु द्वितीयक लवणीकरण और जलभराव से लगभग १.५४ लाख हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित बताया जाता है।
१४. दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की अरावली और विंध्य पहाड़ी पट्टियों में समोच्च बंधन, सीढ़ीदार खेती और चेक डैम प्रमुख यांत्रिक मृदा-संरक्षण उपाय हैं।
१५. राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, खेत-स्तरीय जल प्रबंधन और वर्षा-आधारित क्षेत्र विकास को शुष्क और अर्ध-शुष्क राजस्थान के लिए पढ़ना चाहिए।
