मुख्य तथ्य

  • प्लेटो (427–347 ईसा-पूर्व) ने चार मुख्य सदाचार — विवेक (सोफिया), साहस (आन्द्रेइया), संयम (सोफ्रोसिने) और न्याय (दिकाइओसिने)
  • अरस्तू ने सदाचार नैतिकता (यूडेमोनिज्म) विकसित की
  • इमैनुएल कांट — श्रेणीबद्ध आदेश: "केवल उस सिद्धांत पर कार्य करो जिसे तुम उसी समय सार्वभौमिक नियम बनाना चाहो"; कर्तव्यशास्त्रीय नैतिकता
  • जेरेमी बेंथम ने उपयोगितावाद की स्थापना की
  • जॉन रॉल्स — न्याय सिद्धांत (1971): समाज की संस्थाएँ सबसे बुरी स्थिति वालों को अधिकतम लाभ देने के लिए बनाई जाएँ (विभेद सिद्धांत);

मुख्य बिंदु

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    प्लेटो (427–347 ईसा-पूर्व) ने चार मुख्य सदाचार — विवेक (सोफिया), साहस (आन्द्रेइया), संयम (सोफ्रोसिने) और न्याय (दिकाइओसिने) — रिपब्लिक में प्रतिपादित किए। न्याय सर्वोच्च सदाचार है, जिसका अर्थ है कि आत्मा या राज्य का प्रत्येक अंग अपना उचित कार्य करे।

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    अरस्तू ने सदाचार नैतिकता (यूडेमोनिज्म) विकसित की — सदाचार अभ्यास द्वारा निर्मित आदत है, सुनहरा मध्य मार्ग अतिरेक और न्यूनता के बीच; श्रेष्ठ जीवन है यूडेमोनिया (समृद्ध जीवन)।

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    इमैनुएल कांटश्रेणीबद्ध आदेश: "केवल उस सिद्धांत पर कार्य करो जिसे तुम उसी समय सार्वभौमिक नियम बनाना चाहो"; कर्तव्यशास्त्रीय नैतिकता — कार्य की नैतिकता उसके परिणाम से नहीं, कर्तव्य-अनुपालन से तय होती है।

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    जेरेमी बेंथम ने उपयोगितावाद की स्थापना की — "अधिकतम संख्या का अधिकतम सुख"; J.S. मिल ने उच्च और निम्न सुख (मानसिक > शारीरिक) और हानि सिद्धांत से परिष्कृत किया।

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    जॉन रॉल्सन्याय सिद्धांत (1971): समाज की संस्थाएँ सबसे बुरी स्थिति वालों को अधिकतम लाभ देने के लिए बनाई जाएँ (विभेद सिद्धांत); अज्ञानता के पर्दे के पीछे चुने गए सिद्धांत — अपनी सामाजिक स्थिति जाने बिना।

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    बुद्धअष्टांगिक मार्ग (सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति, समाधि) — दुख से मुक्ति; अहिंसा, करुणा, मैत्री नैतिक आधार; उपाय कौशल्य (श्रोता के अनुसार शिक्षा)।

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    श्री अरविंदपूर्णयोग और जीवन दिव्य: विकास केवल जैविक नहीं बल्कि मानसिक/आध्यात्मिक — मानवता उच्चतर चेतना की ओर विकसित हो रही है; अतिमानस मानव और दिव्य के बीच सेतु है।

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    रवींद्रनाथ टैगोरमानवतावाद एवं सार्वभौमवाद: संकुचित राष्ट्रवाद का विरोध; "जहाँ मन निर्भय हो" — समग्र व्यक्ति का विकास, रटंत या साधनवादी नहीं; मनुष्य में अतिरेक (अस्तित्व से परे अभिव्यक्ति खोजने वाली सृजनात्मक ऊर्जा)।

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    स्वामी विवेकानंदव्यावहारिक वेदांत: "दरिद्र नारायण" — गरीब की सेवा = ईश्वर सेवा; "बल ही जीवन है, दुर्बलता मृत्यु"; शिक्षा = अंदर छिपी पूर्णता का प्रकटीकरण; भारतीय आध्यात्मिकता और पश्चिमी मानवतावादी कार्यक्षमता का संयोजन।

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    कर्तव्यशास्त्र बनाम परिणामवाद: नैतिकता में मूल बहस — कर्तव्यशास्त्र (कांट) मानता है कुछ कार्य अपने आप सही/गलत हैं चाहे परिणाम जो भी हो; परिणामवाद (बेंथम, मिल) — कार्य सही है यदि सर्वोत्तम परिणाम दे।

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    कन्फ्यूशियसरेन (परोपकार), ली (अनुष्ठान शिष्टाचार), यी (धार्मिकता), झी (विवेक); जुनज़ी (अनुकरणीय व्यक्ति) नैतिक आदर्श; बल की जगह नैतिक उदाहरण से शासन।

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    W.D. रॉसप्रथमदृष्टया कर्तव्य: अनेक कर्तव्य हैं (विश्वासनिष्ठा, अहानि, परोपकार, न्याय, कृतज्ञता) जो बाध्यकारी हैं जब तक कोई अधिक प्रबल कर्तव्य उन पर भारी न पड़े; वास्तविक जीवन में कर्तव्य टकराते हैं।

नैतिक विचारक और दार्शनिक आरएएस मुख्य परीक्षा में क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

नैतिक विचारक और दार्शनिक आरएएस मुख्य परीक्षा में इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे प्रश्नपत्र द्वितीय की प्रशासनिक नैतिकता इकाई में बार-बार पूछे जाने वाला उच्च-अंक विषय हैं। आरपीएससी के मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम में लिखित परीक्षा के ४ प्रश्नपत्र हैं और हर प्रश्नपत्र २०० अंक का है; इसी पाठ्यक्रम के सामान्य अध्ययन द्वितीय, इकाई प्रथम में “भारत और विश्व के नैतिक विचारकों और दार्शनिकों का योगदान” अलग से दिया गया है। इसलिए यह विषय केवल दर्शन की सूची नहीं, बल्कि उत्तर-लेखन में सीधे काम आने वाला नैतिक ढाँचा है।

विषय ६३ प्रश्नपत्र द्वितीय इकाई प्रथम में सर्वाधिक अंकदायक विषय है, जिसमें ६ वर्षों में ५९ अंक और प्रतिवर्ष ११.८ अंक का औसत है — यह प्रत्येक परीक्षा वर्ष में आया है। २०२१ में कांट की श्रेणीबद्ध अनिवार्यता (५ अंक) और बुद्ध की शिक्षाएँ (२ अंक) पूछी गईं। २०२३ में प्लेटो के प्रमुख सद्गुण (२ अंक), कांट की सद्इच्छा (२ अंक), बौद्ध धर्म में उपाय कौशल्य (२ अंक), अरविन्द का द लाइफ डिवाइन (५ अंक), टैगोर का मनुष्य में अतिरेक (५ अंक), और कर्तव्य-नैतिकता बनाम परिणामवाद (१० अंक) पूछे गए — यानी २-अंक, ५-अंक और १०-अंक तीनों प्रारूपों में यह विषय सक्रिय रहा।

परीक्षकों का पैटर्न: वे पश्चिमी विचारकों — प्लेटो, कांट, बेंथम, मिल और रॉल्स — तथा भारतीय विचारकों — बुद्ध, अरविन्द, टैगोर और विवेकानन्द — से बदल-बदलकर पूछते हैं। सामान्यतः हर श्रेणी से प्रतिवर्ष १–२ प्रश्न आते हैं। २०२६ के लिए अरस्तू, कन्फ्यूशियस, जॉन स्टुअर्ट मिल और विवेकानन्द हाल में नहीं आए; इसलिए ये सभी उच्च-संभाव्यता वाले हैं।

अध्ययन रणनीति: प्रत्येक विचारक के बारे में चार बातें याद रखें: (१) नाम, तिथि और बौद्धिक परंपरा; (२) १–२ प्रमुख अवधारणाएँ तकनीकी शब्दों सहित; (३) प्रशासनिक नैतिकता में प्रत्यक्ष अनुप्रयोग; (४) दूसरे विचारक से एक साफ अंतर। उदाहरण के लिए कांट को केवल “कर्तव्य” तक सीमित न करें; श्रेणीबद्ध अनिवार्यता, मानव गरिमा और परिणामवाद से अंतर जरूर लिखें। इसी तरह बुद्ध को केवल “अहिंसा” नहीं, बल्कि चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, करुणा और उपाय कौशल्य से जोड़ें।


संभावित RAS प्रश्न

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1 5M अरस्तू की 'स्वर्णिम मध्यम मार्ग' अवधारणा क्या है? यह लोक प्रशासन में कैसे प्रासंगिक है? 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

अरस्तू का स्वर्णिम मध्यम मार्ग: प्रत्येक सदाचार दो दोषों — अतिरेक और न्यूनता — के बीच मध्य है। साहस: कायरता और दुःसाहस के बीच। प्रशासन में: (1) प्रवर्तन — कठोरता और शिथिलता के बीच; (2) प्रकटीकरण — गोपनीयता और अनुचित सूचना-प्रसार के बीच; (3) तटस्थता — जड़ता और चाटुकारिता के बीच।

~50 शब्द • 5 अंक