मुख्य तथ्य

  • कौटिल्य (अर्थशास्त्र, ~300 ईसापूर्व) ने राजधर्म का प्रतिपादन किया
  • नेल्सन मंडेला ने क्षमा एवं सुलह को शासन के मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया
  • सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रशासक के रूप में दृढ़ता, राष्ट्रीय एकता एवं भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता का प्रदर्शन किया

मुख्य बिंदु

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    नीतिशास्त्र नैतिक सिद्धांतों का व्यवस्थित अध्ययन है जो मानव आचरण को दिशा देता है। मानवीय मूल्य वे मूल आदर्श हैं (सत्य, करुणा, न्याय, सत्यनिष्ठा) जो जीवन को अर्थ देते हैं।

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    महात्मा गांधी ने सिखाया कि साधन और साध्य दोनों पवित्र होने चाहिए — सत्य और अहिंसा अविभाज्य हैं; अन्यायी साधन न्यायपूर्ण लक्ष्य को भी दूषित करता है।

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    स्वामी विवेकानंद ने जोर दिया कि मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सेवा है; आत्म-अनुशासन, निर्भयता और प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता की पहचान ही सभी मूल्यों का स्रोत है।

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    डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने सामाजिक न्याय, संवैधानिक नैतिकता एवं स्वतंत्रता-समानता-बंधुत्व को लोकतांत्रिक गणराज्य के आधारभूत मूल्यों के रूप में प्रतिपादित किया।

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    कौटिल्य (अर्थशास्त्र, ~300 ईसापूर्व) ने राजधर्म का प्रतिपादन किया — न्याय, सुरक्षा एवं प्रजाकल्याण की नैतिक बाध्यता; आदर्श प्रशासक व्यक्तिगत हित पर लोकहित को प्राथमिकता देता है।

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    रवींद्रनाथ टैगोर ने मानवधर्म (मानवता ही धर्म) का महत्त्व बताया — प्रेम, सौंदर्य, स्वतंत्रता और बुद्धि-हृदय-कर्म का समन्वय; "मनुष्य की अधिशेष चेतना" की अवधारणा मूल्यों के विशिष्ट मानवीय क्षेत्र को परिभाषित करती है।

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    अब्राहम लिंकन ने दर्शाया कि नेतृत्व में नैतिक साहस — दासता समाप्त करना, संघ बचाना — का अर्थ है भारी व्यक्तिगत कीमत पर भी नैतिक सिद्धांतों पर अडिग रहना।

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    नेल्सन मंडेला ने क्षमा एवं सुलह को शासन के मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया — 27 वर्ष के कारावास के बाद भी कटुता नहीं; उनके राष्ट्रपतित्व ने सिद्ध किया कि बिना प्रतिशोध के न्याय संभव है।

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    सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रशासक के रूप में दृढ़ता, राष्ट्रीय एकता एवं भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता का प्रदर्शन किया — स्वतंत्रता के 3 वर्षों में 562 रियासतों का एकीकरण।

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    मानवीय मूल्यों को वर्गीकृत किया जाता है: (i) व्यक्तिगत — आत्म-अनुशासन, ईमानदारी; (ii) सामाजिक — समानता, न्याय; (iii) व्यावसायिक — सत्यनिष्ठा, जवाबदेही; (iv) सार्वभौमिक — मानव गरिमा, शांति।

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    यूपीएससी/आरपीएससी ढाँचा सिविल सेवा नैतिकता के लिए गांधी, कौटिल्य, टैगोर और अंबेडकर से प्रेरणा लेता है — सभी चार प्रशासनिक नीतिशास्त्र प्रश्नों में नियमित रूप से संदर्भित होते हैं।

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    श्री अरविंद ने नीतिशास्त्र को आध्यात्मिक विकास से जोड़ा — मानवीय मूल्य केवल सामाजिक परंपराएँ नहीं बल्कि विकसित होती दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति हैं।

इस विषय में नेताओं, समाज-सुधारकों और प्रशासकों से क्या सीखना है?

इस विषय में नेताओं, समाज-सुधारकों और प्रशासकों से जीवनियाँ रटनी नहीं हैं, बल्कि उनके जीवन और काम से ऐसे नैतिक सिद्धांत निकालने हैं जिन्हें आधुनिक लोक प्रशासन में लागू किया जा सके। आरपीएससी के आधिकारिक पाठ्यक्रम में प्रश्नपत्र-द्वितीय के अंतर्गत "प्रशासनिक नैतिकता" की इकाई में "महान नेताओं, सुधारकों और प्रशासकों के जीवन और शिक्षाओं से नीतिशास्त्र और मानवीय मूल्य" को स्पष्ट रूप से रखा गया है।

विषय ५६, प्रश्नपत्र द्वितीय की प्रशासनिक नैतिकता इकाई का प्रवेश-द्वार विषय है। यह विद्यार्थियों से अपेक्षा करता है कि वे ऐतिहासिक नेताओं, सामाजिक सुधारकों और प्रशासकों से व्यावहारिक सबक ग्रहण करें — केवल उनकी जीवनियाँ सुनाने तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसे नैतिक सिद्धांत निकालें जो आधुनिक शासन में हस्तांतरणीय हों।

यह विषय आरपीएससी में सर्वाधिक अंक क्यों दिलाता है: आरपीएससी पाठ्यक्रम में अनिवार्य किया गया है कि प्रशासकों में बौद्धिक सत्यनिष्ठा, सहानुभूति और नैतिक साहस हो। इस विषय के प्रश्न परीक्षकों को यह परखने का अवसर देते हैं कि उम्मीदवार दार्शनिक नैतिकता को प्रशासनिक व्यवहार से जोड़ सकते हैं या नहीं। जो विद्यार्थी गाँधी के साधन-साध्य सिद्धांत को शासन-संकट के संदर्भ में उद्धृत कर सके, या अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता का प्रयोग यह समझाने में कर सके कि भीड़ की भावना के विपरीत भी विधि-शासन क्यों जरूरी है — वह वह संश्लेषण प्रदर्शित करता है जो पूर्ण अंक दिलाता है।

पूर्ववर्षीय प्रश्न रिकॉर्ड: ५ वर्षों में ४५ अंक (२०१३: १० अंक, २०१८: १५ अंक, २०२१: १५ अंक, २०२३: ५ अंक) — यह विषय ५९ (ईमानदारी/निष्पक्षता) के बाद सर्वाधिक अंक देने वाला नैतिकता विषय है। प्रश्न ५-अंकीय चरित्र-रेखाचित्र ("स्वामी विवेकानंद से हम क्या नैतिक सबक सीखते हैं?") से लेकर १०-अंकीय तुलनात्मक विश्लेषण ("प्रशासन में नैतिकता के प्रति गाँधी और कौटिल्य के दृष्टिकोण की तुलना करें") तक होते हैं।

उत्तर लिखते समय इसलिए नामों की सूची नहीं, बल्कि "विचारक → मूल्य → प्रशासनिक प्रयोग" की श्रृंखला बनानी चाहिए। उदाहरण के लिए, गाँधी को सत्य और साधन-साध्य शुद्धता से, अंबेडकर को संवैधानिक नैतिकता और सामाजिक न्याय से, कौटिल्य को राजधर्म और योगक्षेम से, तथा विवेकानंद को सेवा और निर्भय चरित्र से जोड़ना उत्तर को सीधे परीक्षोपयोगी बनाता है।


संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M एक लोक प्रशासक महात्मा गांधी से कौन-सी नैतिक शिक्षाएँ ग्रहण कर सकता है? 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

गांधी प्रशासकों को सिखाते हैं: (1) साधन-साध्य शुद्धता — भ्रष्ट साधन न्यायपूर्ण लक्ष्य को नष्ट करते हैं; (2) ट्रस्टीशिप — सार्वजनिक शक्ति नागरिकों की अमानत है; (3) सर्वोदय — नीति कमजोर वर्ग को प्राथमिकता दे; (4) अहिंसा — नीतियाँ गरीबों को नुकसान न पहुँचाएँ; (5) सत्याग्रह — संस्थागत दबाव में भी सत्य पर अडिग रहें।

~50 शब्द • 5 अंक