धार्मिक आस्थाएँ, संत, लोक देवता
मुख्य तथ्य
- रामदेव पीर (बाबा रामदेव) का जन्म लगभग 1405 ई. में रुणिचा, रामदेवरा, जैसलमेर जिले में हुआ।
- दादू दयाल (1544–1603 ई.) दादू पंथ के संस्थापक थे; अहमदाबाद में जन्म, राजस्थान के नाराणा (नागौर) में स्थापना; 'दादू वाणी' में ~5,000 पद हैं।
- मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.), मेड़ता (नागौर) की राजकुमारी, कृष्ण-भक्त
- ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1141–1236 ई.) ने लगभग 1193 ई. में अजमेर में चिश्ती सिलसिले की स्थापना की;
- राजस्थान में जैन धर्म: दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू, 11वीं–13वीं शताब्दी) और रणकपुर मंदिर (पाली, 15वीं शताब्दी) प्रमुख तीर्थ स्थल;
मुख्य बिंदु
- 1
राजस्थान के पाँच प्रमुख लोक देवता (पंचपीर): पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी और हरभूजी — इनकी पूजा फड़ चित्रकला के ज़रिए भोपा-भोपी द्वारा की जाती है।
- 2
रामदेव पीर (बाबा रामदेव) का जन्म लगभग 1405 ई. में रुणिचा, रामदेवरा, जैसलमेर जिले में हुआ। वे ऐसे लोकदेवता हैं जिन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनों पूजते हैं; मुस्लिम परम्परा में वे रामसा पीर कहलाते हैं। रामदेवरा का वार्षिक मेला भाद्रपद शुक्ल 2–11 तक लगता है और लगभग 5 लाख तीर्थयात्री आकर्षित करता है।
- 3
दादू दयाल (1544–1603 ई.) दादू पंथ के संस्थापक थे; अहमदाबाद में जन्म, राजस्थान के नाराणा (नागौर) में स्थापना; 'दादू वाणी' में ~5,000 पद हैं।
- 4
राजस्थान में निर्गुण भक्ति: दादू पंथ, रज्जब शाखा, सुंदरदास परंपरा — तीनों मूर्तिपूजा, जातिवाद और कर्मकांड को अस्वीकार करते थे।
- 5
मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.), मेड़ता (नागौर) की राजकुमारी, कृष्ण-भक्त — राजस्थान की प्रमुख सगुण भक्त संत; ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती में ~1,300 भजनों की रचना।
- 6
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1141–1236 ई.) ने लगभग 1193 ई. में अजमेर में चिश्ती सिलसिले की स्थापना की; ख्वाजा का उर्स (रजब 1–6) में ~1.5 लाख श्रद्धालु आते हैं।
- 7
षड्दर्शन: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत — सभी वेद-प्रामाण्य स्वीकार करते हैं; प्रस्थानत्रयी = उपनिषद् + भगवद्गीता + ब्रह्मसूत्र।
- 8
राजस्थान में जैन धर्म: दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू, 11वीं–13वीं शताब्दी) और रणकपुर मंदिर (पाली, 15वीं शताब्दी) प्रमुख तीर्थ स्थल; राजस्थान में जैनों की सर्वाधिक जनसंख्या (~1.2%)।
- 9
चरणदासी पंथ के संस्थापक चरण दास (1703–1782 ई., देहरा, अलवर); दो प्रमुख महिला संत — सहजो बाई और दया बाई — ने हिंदी में भक्ति साहित्य रचा।
- 10
करणी माता, देशनोक (बीकानेर) — चारण जाति की देवी; मंदिर में पवित्र चूहे (काबा) प्रसिद्ध; राव बीका (1488 ई.) और बीकानेर राजपरिवार से संबद्ध।
- 11
गोगाजी (लगभग 900 ई., दाद्रेवा, चुरू) — नागदेवता; हिंदू और मुसलमान दोनों "ज़ाहिर पीर" के रूप में पूजते हैं; गोगामेड़ी मेला (भाद्रपद शुक्ल 9), हनुमानगढ़।
- 12
सुहरावर्दी सिलसिले की स्थापना शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1145–1234 ई.) ने की; राजस्थान में हामिदुद्दीन नागोरी (1192–1274 ई.) प्रमुख सुहरावर्दी संत थे।
- 13
तेजाजी (लगभग 928–960 ई., नागौर) — पशुधन एवं नागदेवता; जाट समाज के आराध्य; परबतसर मेला (नागौर) और बाँसड़ा (अजमेर) में पूजित।
- 14
पाबूजी (लगभग 1239–1276 ई., कोलू, फलौदी) — ऊँट देवता; रेबारी और नायक समाज के आराध्य; 'पाबूजी री फड़' (15 मीटर लंबी) भोपा द्वारा रात्रि जागरण में प्रस्तुत।
- 15
राम नवमी 2026 के राष्ट्रीय उत्सवों में राजस्थान के गोविंद देव जी (जयपुर), श्रीनाथजी (नाथद्वारा) और पुष्कर जैसे मंदिरों की भागीदारी ने समकालीन राजस्थान में सगुण वैष्णव भक्ति और शासन-संस्कृति के संबंध को दर्शाया।
परिचय एवं पाठ्यक्रम
यह विषय राजस्थान की लोक-आस्था, संत परंपरा और बड़े धार्मिक-दार्शनिक ढाँचों को साथ पढ़ाता है, इसलिए इसे केवल नामों की सूची मानकर नहीं पढ़ना चाहिए। RPSC के आधिकारिक सिलेबस में धार्मिक जीवन के अंतर्गत धार्मिक समुदाय, संत-संप्रदाय और राजस्थान के लोक देवता — ये ३ हिस्से दिए गए हैं।
विषय ११ में राजस्थान के जीवंत धार्मिक परिदृश्य को तीन विशिष्ट स्तरों पर समाहित किया गया है: (a) लोक देवताओं और लोक देवियों के ज़रिए जमीनी स्तर की लोक-धर्म परंपरा, जो औपचारिक हिंदू संप्रदायवाद से पहले की है या उससे बाहर संचालित होती है; (b) मध्यकालीन सुधारकों की भक्ति-संत परंपरा, जिन्होंने जाति-रूढ़िवाद को चुनौती दी; और (c) अखिल-भारतीय दार्शनिक एवं धर्मशास्त्रीय ढाँचे — वैदिक विचारधाराएँ, भक्ति आंदोलन, सूफी सिलसिले, जैन धर्म — जैसे वे राजस्थान में प्रकट हुए।
पाठ्यक्रम की सीमाएँ: यह विषय जानबूझकर व्यापक रखा गया है। RPSC २०२६ प्रश्नपत्र I, इकाई १ के पाठ्यक्रम में “धार्मिक विश्वास, संत, लोक देवता“ का सूत्रीकरण बिना किसी उपविभाजन के है, जिसका अर्थ है कि RPSC इस समूह के किसी भी तत्त्व पर प्रश्न पूछ सकता है। पिछले प्रश्न के आँकड़े दर्शाते हैं कि परीक्षक अमूर्त दर्शन (प्रस्थान त्रयी, ६ आस्तिक दर्शन) से लेकर ठोस राजस्थानी व्यक्तित्वों (मीरा बाई, दादू दयाल, चरणदासी संप्रदाय) तक और तुलनात्मक विश्लेषणात्मक प्रश्नों (निर्गुण भक्ति बनाम ६वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलन) तक सहजता से विचरण करते हैं। यह समीपवर्ती विषय १० (संत साहित्य) से भिन्न है, जो साहित्यिक उत्पादन पर केंद्रित है; विषय ११ संत आंदोलनों की धार्मिक-सामाजिक विषयवस्तु पर केंद्रित है।
समीपवर्ती विषयों की सीमाएँ:
- कबीर का साहित्यिक उत्पादन → विषय १०; दादू दयाल को प्रभावित करने वाला कबीर का निर्गुण दर्शन → विषय ११
- नयनार-अलवार संत (२०२३ पिछले प्रश्न) → विषय १३ (भारतीय धार्मिक आंदोलन) में भी आते हैं, फिर भी RPSC ने इन्हें इसी इकाई में पूछा
- जैन स्थापत्य (दिलवाड़ा, रणकपुर) → विषय ६ में कला का पक्ष; विषय ११ में दार्शनिक-धार्मिक पक्ष
पिछले प्रश्न का महत्त्व: ६ परीक्षाओं में १० प्रश्न — असामान्य रूप से उच्च घनत्व। RPSC इस विषय को तीन कोणों से परखता है: (१) दर्शन-शब्दावली का तथ्यात्मक स्मरण (प्रस्थान त्रयी, सूफी सिलसिले, आस्तिक दर्शन), (२) राजस्थान-विशिष्ट संत एवं संप्रदाय (दादू पंथ, चरणदासी, मीरा), और (३) तुलनात्मक-विश्लेषणात्मक प्रश्न (निर्गुण भक्ति की ६वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलनों से समानताएँ — २०२४ का १०-अंकीय प्रश्न)। तीनों कोणों पर गहराई अनिवार्य है।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M भारतीय परम्परा में 'ऋण' की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
आदर्श उत्तर
भारतीय परम्परा में ऋण का तात्पर्य उन सहज दायित्वों से है जो प्रत्येक मनुष्य देवताओं, ऋषियों और पितरों के प्रति लेकर जन्म लेता है। तीन प्रमुख ऋण हैं: देव ऋण (यज्ञ से), ऋषि ऋण (स्वाध्याय और अध्यापन से) और पितृ ऋण (श्राद्ध/पिंडदान से)। कुछ ग्रंथ चौथा — मनुष्य ऋण — भी मानते हैं जो अतिथि-सत्कार से चुकाया जाता है।
~50 शब्द • 5 अंक
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