राजस्थानी भाषा एवं साहित्यिक कृतियाँ
मुख्य तथ्य
- - राजस्थानी भाषा पश्चिमी हिंदी की शाखा है — इसकी 4 प्रमुख बोलियाँ हैं: मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी और हाड़ौती
- - चंद बरदाई द्वारा रचित; पृथ्वीराज III चाहमान के दरबारी कवि थे — मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है
- - रठौड़ पृथ्वीराज द्वारा लगभग 1610 ई. में रचित - समकालीन कवियों ने इसे "पाँचवाँ वेद" और "19वाँ पुराण" कहा - डिंगल काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण है
- - सूर्यमल्ल मिश्रण (1815–1868) द्वारा रचित — वंश भास्कर: राजस्थानी साहित्य का सबसे दीर्घ काव्य-ग्रंथ (~20,000 पद), बूँदी राजवंश का इतिहास
- - पद्मनाभ द्वारा 1455 ई. में रचित — प्राचीन राजस्थानी की सबसे प्रारंभिक उपलब्ध कथात्मक कविता है
मुख्य बिंदु
- 1
- राजस्थानी भाषा पश्चिमी हिंदी की शाखा है
- इसकी 4 प्रमुख बोलियाँ हैं: मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी और हाड़ौती
- 8+ उप-बोलियाँ भी हैं जिनमें शेखावाटी, वागड़ी, मेवाती, अहीरवाटी शामिल हैं
- 2
- डिंगल मारवाड़ी का साहित्यिक रूप है जिसे चारण कवि राजपूत दरबारों में प्रयोग करते थे
- पिंगल पूर्वी साहित्यिक रूप है जो ब्रजभाषा से प्रभावित है और मेवाड़ व पूर्वी राजपूताने में प्रचलित था
- दोनों रूप शब्द-भंडार, छंद और विषयवस्तु में भिन्न हैं
- 3
- चंद बरदाई द्वारा रचित; पृथ्वीराज III चाहमान के दरबारी कवि थे
- मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है
- 12वीं शताब्दी के पृथ्वीराज तृतीय के जीवन — युद्ध, प्रणय और वंशावली — का वर्णन करता है
- 4
- रठौड़ पृथ्वीराज द्वारा लगभग 1610 ई. में रचित
- समकालीन कवियों ने इसे "पाँचवाँ वेद" और "19वाँ पुराण" कहा
- डिंगल काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण है
- 5
- सूर्यमल्ल मिश्रण (1815–1868) द्वारा रचित
- वंश भास्कर: राजस्थानी साहित्य का सबसे दीर्घ काव्य-ग्रंथ (~20,000 पद), बूँदी राजवंश का इतिहास
- वीर सतसई: 707 दोहों की ब्रज-राजस्थानी रचना, वीर भावना से ओतप्रोत
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- पद्मनाभ द्वारा 1455 ई. में रचित
- प्राचीन राजस्थानी की सबसे प्रारंभिक उपलब्ध कथात्मक कविता है
- 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और जालोर के कान्हड़दे सोनिगरा के प्रतिरोध का वर्णन
- 7
- चारण राजपूत राजदरबारों में वंशानुगत कवि-इतिहासकार होते थे
- वे अपने संरक्षक राज्यों की वंशावली और मौखिक इतिहास के संरक्षक थे
- उनके डिंगल काव्य में युद्ध-विवरण, प्रशस्तियाँ और नीतिवचन संरक्षित हैं
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- वात: गद्य आख्यान; वचनिका: अर्ध-गद्य ऐतिहासिक आख्यान
- रासो: वीर महाकाव्य; डिंगल काव्य: डिंगल पद्य रचना
- वेलि: गीतिकाव्य — ये पाँचों विधाएँ राजस्थानी साहित्य की मौलिक विशेषता हैं
- 9
- जैन साहित्य ने प्राकृत, संस्कृत और पुरानी राजस्थानी रचनाओं से भाषा को समृद्ध किया
- हेमचंद्र (1089–1173 ई.) ने अपभ्रंश व्याकरण में पुरानी गुजराती-राजस्थानी व्याकरण का मानकीकरण किया
- यद्यपि वे गुजरात के विद्वान थे, उनका कार्य प्रारंभिक राजस्थानी के लिए आधारभूत है
- 10
- विजयदान देथा 'बिज्जी' (1926–2013) आधुनिक राजस्थानी साहित्य के सर्वोच्च कवि-कथाकार हैं
- बातां री फुलवारी: 14 खंडों में 800+ लोककथाओं का अनुपम संग्रह
- नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित; साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974) और पद्मश्री (2007) प्राप्त
- 11
- कोमल कोठारी (1929–2004) राजस्थान के सर्वप्रमुख लोक-संगीतशास्त्री थे
- विजयदान देथा के साथ 1960 में रूपायन संस्थान (बोरुंदा) की सह-स्थापना की
- संस्थान में 15,000+ लोकगीत और 500+ वाद्ययंत्र रिकॉर्डिंग संरक्षित हैं
- 12
- जनगणना 2011 के अनुसार लगभग 8 करोड़ मातृभाषी
- मातृभाषियों की दृष्टि से भारत की छठी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा
- संविधान की 8वीं अनुसूची में अभी तक शामिल नहीं; माँग 1950 के दशक से जारी, 2026 तक अनसुलझी
- 13
- राजस्थान विधानसभा ने 2003 में एकमत से प्रस्ताव पारित किया
- पटासकर समिति सहित अनेक समितियों ने शामिल करने की सिफारिश की
- 2026 तक संसद ने इन सिफारिशों पर कोई कदम नहीं उठाया
- 14
- राजस्थान सरकार द्वारा 1958 में उदयपुर में स्थापित
- मीरा पुरस्कार और सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार प्रदान करती है
- साहित्यिक पत्रिका मधुमती का प्रकाशन करती है
परिचय एवं पाठ्यक्रम
इस विषय का दायरा
राजस्थानी भाषा एवं साहित्यिक कृतियों का यह विषय भाषा-वर्गीकरण, बोलियों, डिंगल-पिंगल परम्परा, प्रमुख ग्रंथों, चारण-जैन योगदान और ८वीं अनुसूची की समकालीन माँग को एक साथ पढ़ने का विषय है। यह विषय राजस्थानी भाषा के भाषाई वर्गीकरण और बोली-संरचना, १२वीं शताब्दी से राजस्थानी दरबारों में विकसित प्रमुख साहित्यिक परम्पराओं और विधाओं, प्रमुख साहित्यिक कृतियों और उनके ऐतिहासिक महत्त्व, तथा भाषा की समकालीन स्थिति — जिसमें ८वीं अनुसूची मान्यता आंदोलन शामिल है — को समेटता है।
आरपीएससी के आधिकारिक मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम में कुल ४ प्रश्नपत्र हैं और हर प्रश्नपत्र २०० अंकों का है; इसी ढाँचे में यह विषय प्रश्नपत्र १, इकाई १ के राजस्थान इतिहास-संस्कृति भाग में आता है। आरपीएससी २०२६ पाठ्यक्रम इसे प्रश्नपत्र १, इकाई १ (इतिहास), भाग अ के अंतर्गत रखता है — यह मानते हुए कि राजस्थानी साहित्यिक परम्परा राजस्थान के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास से अविभाज्य है। दायरा पूर्णतः राजस्थान-केन्द्रित है: सामान्य पुरानी हिंदी या संस्कृत साहित्य इतिहास तब तक परिधि से बाहर है जब तक वह राजस्थानी साहित्यिक विकास से सीधे संबद्ध न हो।
पिछले प्रश्नों की प्रवृत्ति एवं परीक्षा महत्त्व
पिछले प्रश्नों की प्रवृत्ति के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यह विषय तेजी से महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है: २०१३ और २०१६ में शून्य अंक, २०१८ में ५ अंक (२-अंक का विश्व वल्लभ प्रश्न), २०२१ में १० अंक (चारण साहित्य निबंध), और २०२३ में ७ अंक (बोली पहचान + वात/वचनिका व्याख्या)। तीन परीक्षाओं में कुल २२ अंक और बढ़ती प्रश्न जटिलता यह संकेत देती है कि २०२६ में प्रमुख कृतियों, डिंगल-पिंगल भेद या ८वीं अनुसूची माँग पर विश्लेषणात्मक १०-अंक प्रश्न पूछे जाने की प्रबल संभावना है।
दायरे की सीमाएँ
यहाँ जो विषय शामिल हैं:
- भाषा-संरचना और औपचारिक साहित्यिक उत्पादन
जो विषय अन्य टॉपिक में हैं:
- लोक मौखिक साहित्य (दोहे, भजन, लोकगीत) → टॉपिक #६
- मीराबाई और कबीर जैसे धार्मिक संत-कवि → टॉपिक #११
- स्थापत्य और दृश्य कला संरक्षण → टॉपिक #५
- शासकों की राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ → टॉपिक #२
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M राजस्थानी साहित्य के संदर्भ में 'वात' और 'वचनिका' शब्दों की व्याख्या कीजिए।
आदर्श उत्तर
वात राजस्थानी का लघु गद्य आख्यान है जो ऐतिहासिक या किंवदंती घटनाओं पर आधारित होता है; इसमें मौखिक वाचन शैली और अंतर्निहित पद होते हैं जो वंशावली और नैतिक सूक्तियाँ संप्रेषित करते हैं। वचनिका अर्ध-गद्य, अर्ध-पद्य ऐतिहासिक आख्यान है — गद्य घटनाओं का वर्णन करता है, पद्य भावपूर्ण क्षणों को व्यक्त करता है। मुनहता नैनसी की रचनाएँ वचनिका परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
~50 शब्द • 5 अंक
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