मुख्य तथ्य

  • राजवल्लभ महाराणा कुम्भा के दौर में मण्डन द्वारा रचा गया स्थापत्य-शास्त्र ग्रन्थ है।
  • यह पन्द्रहवीं शताब्दी का संस्कृत भाषा में रचित प्रसिद्ध स्थापत्य-शास्त्र ग्रन्थ है।
  • राजवल्लभ में नगर, ग्राम, दुर्ग, राजप्रासाद, मन्दिर और बाजार जैसे निर्माणों की पद्धति दी गई है।
  • कुल १४ अध्यायों में विभक्त यह ग्रन्थ मध्यकालीन राजस्थान में निर्माण की पद्धति को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है।
  • इसमें भवन-स्थल चयन, अनुपात-नियम और अलंकरण की रूपरेखा विस्तार से दी गई है।

मुख्य बिंदु

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    राजवल्लभ महाराणा कुम्भा के दौर में मण्डन द्वारा रचा गया स्थापत्य-शास्त्र ग्रन्थ है।

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    यह पन्द्रहवीं शताब्दी का संस्कृत भाषा में रचित प्रसिद्ध स्थापत्य-शास्त्र ग्रन्थ है।

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    राजवल्लभ में नगर, ग्राम, दुर्ग, राजप्रासाद, मन्दिर और बाजार जैसे निर्माणों की पद्धति दी गई है।

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    कुल १४ अध्यायों में विभक्त यह ग्रन्थ मध्यकालीन राजस्थान में निर्माण की पद्धति को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है।

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    इसमें भवन-स्थल चयन, अनुपात-नियम और अलंकरण की रूपरेखा विस्तार से दी गई है।

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    राजस्थानी कला-संस्कृति के अध्ययन के लिए राजवल्लभ एक मूल स्रोत है और मेवाड़ दरबार की विद्वत्ता का प्रमाण भी देता है।

राजवल्लभ क्या है और कुम्भा-कालीन स्थापत्य में इसका महत्व क्या है?

राजवल्लभ क्या है और कुम्भा-कालीन स्थापत्य में इसका महत्व क्या है?

राजवल्लभ महाराणा कुम्भा के दौर में मण्डन द्वारा रचा गया स्थापत्य-शास्त्र ग्रन्थ है, जो नगर, ग्राम, दुर्ग, राजप्रासाद, मन्दिर और बाजार जैसे निर्माणों की पद्धति समझाता है। राजवल्लभ पन्द्रहवीं शताब्दी का संस्कृत भाषा में रचित स्थापत्य-शास्त्र का प्रसिद्ध ग्रन्थ है।

रचयिता और संरक्षण

  • इसके रचयिता मेवाड़ नरेश महाराणा कुम्भा के दरबारी विद्वान एवं मुख्य शिल्पी मण्डन थे।
  • मण्डन को राजा का संरक्षण प्राप्त था।

संरचना और विषय-विस्तार

  • कुल १४ अध्यायों में विभक्त यह ग्रन्थ मध्यकालीन राजस्थान में निर्माण की पद्धति को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है।
  • इसमें इन निर्माण-क्षेत्रों की पद्धति दी गई है:
    • नगर
    • ग्राम
    • दुर्ग
    • राजप्रासाद
    • मन्दिर
    • बाजार
  • भवन-स्थल चयन, अनुपात-नियम और अलंकरण की रूपरेखा इसमें विस्तार से दी गई है।
  • राजस्थान पर्यटन विभाग के कुम्भलगढ़ विवरण के अनुसार कुम्भलगढ़ किले की विशाल परकोटा-दीवार लगभग ३६ किलोमीटर तक फैली है; इसलिए राजवल्लभ में दी गई दुर्ग-निर्माण की चर्चा को कुम्भा-कालीन स्थापत्य की वास्तविक पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए।

मण्डन की अन्य रचनाएँ

मण्डन की अन्य रचनाओं में ये शिल्प-ग्रन्थ सम्मिलित हैं, जो कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय देते हैं:

रचना स्वरूप संदर्भ
देवमूर्तिप्रकरण शिल्प-ग्रन्थ कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय
प्रसादमण्डन शिल्प-ग्रन्थ कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय
रूपमण्डन शिल्प-ग्रन्थ कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय
वास्तुमण्डन शिल्प-ग्रन्थ कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय
वास्तुसार शिल्प-ग्रन्थ कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय
रूपावतार शिल्प-ग्रन्थ कुम्भा-कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति का परिचय

राजस्थानी कला-संस्कृति में महत्व

  • राजस्थानी कला-संस्कृति के अध्ययन के लिए राजवल्लभ एक मूल स्रोत है।
  • यह कुम्भा द्वारा रचित संगीतराज जैसी कृतियों के साथ मेवाड़ दरबार की विद्वत्ता का प्रमाण भी प्रस्तुत करता है।
  • परीक्षा-दृष्टि से राजवल्लभ को केवल ग्रन्थ-सूची का नाम मानकर नहीं छोड़ना चाहिए; यह बताता है कि कुम्भा-काल में साहित्य, शिल्प और दरबारी संरक्षण एक साथ आगे बढ़ रहे थे।