ढोलामारू: प्रेमाख्यान से मेवाड़ और मारवाड़ चित्रकला तक
मुख्य तथ्य
- ढोलामारू राजस्थान की लोक प्रेमगाथा है, जो मौखिक प्रेमाख्यान से साहित्य और चित्रकला दोनों की आधार-वस्तु बनी।
- ढोला और मारू के प्रेम, विरह और पुनर्मिलन की लोक लोकप्रियता के कारण कवियों ने इसे काव्य में और चित्रकारों ने पोथी तथा लघुचित्र-समूहों में रूप दिया।
- सत्रहवीं सदी के राजस्थानी कवि कुशललाभ ने इसी कथा को 'ढोला मारवण री चौपाई' के रूप में पुनः रचा।
- १५९२ ई. में महाराणा प्रताप की पहाड़ी राजधानी चावण्ड के मेवाड़ कारखाने में 'ढोलामारू' चित्रित पोथी बनी, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षि…
- मारवाड़ शैली में लगभग विक्रम संवत् १८६० के आसपास बने ढोलामारू चित्र-समूह की गणना उसी शैली के रामायण और सूर्य-प्रकाश चित्र-समूहों के साथ की जाती है।
मुख्य बिंदु
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ढोलामारू राजस्थान की लोक प्रेमगाथा है, जो मौखिक प्रेमाख्यान से साहित्य और चित्रकला दोनों की आधार-वस्तु बनी।
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ढोला और मारू के प्रेम, विरह और पुनर्मिलन की लोक लोकप्रियता के कारण कवियों ने इसे काव्य में और चित्रकारों ने पोथी तथा लघुचित्र-समूहों में रूप दिया।
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सत्रहवीं सदी के राजस्थानी कवि कुशललाभ ने इसी कथा को 'ढोला मारवण री चौपाई' के रूप में पुनः रचा।
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१५९२ ई. में महाराणा प्रताप की पहाड़ी राजधानी चावण्ड के मेवाड़ कारखाने में 'ढोलामारू' चित्रित पोथी बनी, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित है।
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मारवाड़ शैली में लगभग विक्रम संवत् १८६० के आसपास बने ढोलामारू चित्र-समूह की गणना उसी शैली के रामायण और सूर्य-प्रकाश चित्र-समूहों के साथ की जाती है।
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परीक्षा की दृष्टि से ढोलामारू को लोक प्रेमाख्यान, सत्रहवीं सदी की साहित्यिक पुनर्रचना और मेवाड़-मारवाड़ चित्रकला की साझा विषयवस्तु के रूप में पढ़ना चाहिए।
ढोलामारू प्रेमाख्यान मेवाड़ और मारवाड़ चित्रकला से कैसे जुड़ा है?
ढोलामारू प्रेमाख्यान मेवाड़ और मारवाड़ चित्रकला से कैसे जुड़ा है?
ढोलामारू प्रेमाख्यान मेवाड़ और मारवाड़ चित्रकला से इसलिए जुड़ा है क्योंकि राजस्थान की यह लोक प्रेमगाथा मौखिक कथा से साहित्यिक कृति बनी और फिर मेवाड़ तथा मारवाड़, दोनों चित्रशैलियों की प्रमुख विषयवस्तु के रूप में चित्रित हुई। इसलिए ढोलामारू को केवल प्रेमकथा की तरह नहीं, बल्कि राजस्थानी साहित्य और राजस्थानी चित्रकला के बीच पुल बनाने वाली कथा की तरह पढ़ना चाहिए।
ढोलामारू राजस्थान की प्रसिद्ध लोक प्रेमगाथा है, जो मौखिक प्रेमाख्यान से निकलकर साहित्य और चित्रकला दोनों में आधार बनी। लोक स्मृति में ढोला और मारू का प्रेम, विरह और पुनर्मिलन इतना लोकप्रिय रहा कि कवियों ने इसे काव्य में और चित्रकारों ने पोथी तथा लघुचित्र-समूहों में रूप दिया।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के संग्रह-रिकॉर्ड में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली की मेवाड़ शैली की ढोलामारू चित्रकृति का माप १२.५ गुणा २७.५ सेंटीमीटर दर्ज है। यह छोटा-सा माप भी बताता है कि राजस्थानी चित्रकला में प्रेमाख्यानों को पोथी और लघुचित्र परंपरा के भीतर बहुत सघन ढंग से रचा गया।
साहित्यिक पुनर्रचना
- कवि और कृति: सत्रहवीं सदी के राजस्थानी कवि कुशललाभ ने इसी कथा को 'ढोला मारवण री चौपाई' के रूप में पुनः रचा।
- सांस्कृतिक इतिहासकारों की सराहना: सांस्कृतिक इतिहासकार इसे माधवानल चौपाई के साथ नाटकीय रस और सरस लयकारी के लिए सराहते हैं, क्योंकि कथानक सीधे लोकपरंपरा से उठाया गया है।
चित्रकला परंपरा
| समय | चित्रशैली या कारखाना | कृति या चित्र-समूह | मुख्य विवरण |
|---|---|---|---|
| १५९२ ई. | महाराणा प्रताप की पहाड़ी राजधानी चावण्ड का मेवाड़ कारखाना | 'ढोलामारू' चित्रित पोथी | चित्रकला में इस गाथा की चरम अभिव्यक्ति हुई; यह अब नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित है। |
| लगभग विक्रम संवत् १८६० के आसपास | मारवाड़ शैली | ढोलामारू चित्र-समूह | बाद में बना; इसकी गणना उसी शैली के रामायण तथा सूर्य-प्रकाश चित्र-समूहों के साथ की जाती है। |
ऐतिहासिक पहचान
- एक ही प्रेमकथा दो अलग राजस्थानी चित्रशैलियों की प्रमुख विषयवस्तु बनी।
- यह राजस्थानी साहित्य की भी पहचान बन गई।
- परीक्षा की दृष्टि से ढोलामारू को लोक प्रेमाख्यान, सत्रहवीं सदी की साहित्यिक पुनर्रचना और मेवाड़-मारवाड़ चित्रकला की साझा विषयवस्तु के रूप में साथ पढ़ना चाहिए।
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