महेन्द्रपाल: प्रतिहार साम्राज्य का उत्कर्ष और राजशेखर का दरबार (893-909 ई.)
मुख्य तथ्य
- महेन्द्रपाल ८९३-९०९ ई. में गुर्जर-प्रतिहार सम्राट थे और वे अपने पिता मिहिरभोज के उत्तराधिकारी बने।
- महेन्द्रपाल ने कन्नौज, ग्वालियर और मालवा में पूर्ववर्ती शासकों द्वारा संगठित सत्ता-तंत्र को बनाए रखा तथा प्रतिहार प्रतिष्ठा को कन्नौज से बाहर भी टिकाए…
- महेन्द्रपाल के नाम से काठियावाड़ तक प्रमाण मिलते हैं, इसलिए इसे प्रतिहार प्रभाव के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी प्रसार के संकेत के रूप में पढ़ना चाहिए।
- नवीं शताब्दी के ताम्रपत्र महेन्द्रपाल की सत्ता की वास्तविक पहुँच दिखाते हैं, जबकि राजवंशीय परम्परा उन्हें भोज के साथ वंश के सर्वाधिक प्रतापी सम्राटों…
- राजशेखर महेन्द्रपाल के दरबार की प्रमुख विभूति थे और उनकी रचनाओं में कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विद्धशालभंजिका, बालरामायण तथा बालभारत सम्मिलित हैं।
मुख्य बिंदु
- 1
महेन्द्रपाल ८९३-९०९ ई. में गुर्जर-प्रतिहार सम्राट थे और वे अपने पिता मिहिरभोज के उत्तराधिकारी बने।
- 2
महेन्द्रपाल ने कन्नौज, ग्वालियर और मालवा में पूर्ववर्ती शासकों द्वारा संगठित सत्ता-तंत्र को बनाए रखा तथा प्रतिहार प्रतिष्ठा को कन्नौज से बाहर भी टिकाए रखा।
- 3
महेन्द्रपाल के नाम से काठियावाड़ तक प्रमाण मिलते हैं, इसलिए इसे प्रतिहार प्रभाव के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी प्रसार के संकेत के रूप में पढ़ना चाहिए।
- 4
नवीं शताब्दी के ताम्रपत्र महेन्द्रपाल की सत्ता की वास्तविक पहुँच दिखाते हैं, जबकि राजवंशीय परम्परा उन्हें भोज के साथ वंश के सर्वाधिक प्रतापी सम्राटों में रखती है।
- 5
राजशेखर महेन्द्रपाल के दरबार की प्रमुख विभूति थे और उनकी रचनाओं में कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विद्धशालभंजिका, बालरामायण तथा बालभारत सम्मिलित हैं।
- 6
महेन्द्रपाल के बाद महीपाल सिंहासन पर आए और पालों, राष्ट्रकूटों तथा स्वतंत्रता-प्रवृत्त सामन्तों के दबाव ने प्रतिहारों के क्रमिक पतन की भूमिका बनाई।
महेन्द्रपाल ने प्रतिहार साम्राज्य को कैसे संभाला और उनके दरबार में राजशेखर का क्या महत्त्व था?
महेन्द्रपाल ने प्रतिहार साम्राज्य को कैसे संभाला और उनके दरबार में राजशेखर का क्या महत्त्व था?
महेन्द्रपाल ने ८९३-९०९ ई. में मिहिरभोज से मिली प्रतिहार सत्ता को कन्नौज, ग्वालियर, मालवा और काठियावाड़ तक प्रभावी बनाए रखा, और उनके दरबार में राजशेखर जैसे साहित्यकार ने इस शासन को सांस्कृतिक चमक दी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अभिलेख-प्रकाशन में ऊना से मिले महेन्द्रपाल-कालीन ताम्रपत्रों को विक्रम संवत ९५६ से जोड़ा गया है, इसलिए काठियावाड़ में उनका नाम केवल परम्परा नहीं, अभिलेखीय प्रमाण से भी जुड़ता है।
साम्राज्य और सत्ता-तंत्र
- महेन्द्रपाल (शासनकाल ८९३-९०९ ई.) गुर्जर-प्रतिहार सम्राट थे।
- वे अपने पिता मिहिरभोज के उत्तराधिकारी बने।
- मूल बात यह है कि महेन्द्रपाल के नाम से काठियावाड़ क्षेत्र तक प्रमाण मिलते हैं; काठियावाड़ पूर्वी सीमा नहीं, पश्चिमी भारत का क्षेत्र है, इसलिए इसे प्रतिहार प्रभाव के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी प्रसार के प्रमाण की तरह पढ़ना चाहिए।
- उन्होंने कन्नौज, ग्वालियर तथा मालवा में पूर्ववर्ती शासकों द्वारा संगठित सत्ता-तंत्र को बनाए रखा।
- परीक्षा में महेन्द्रपाल को केवल मिहिरभोज के बाद आने वाले शासक की तरह याद करना काफी नहीं है; उनका महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने पहले से बने प्रशासनिक ढाँचे को टूटने नहीं दिया और प्रतिहार प्रतिष्ठा को कन्नौज से बाहर भी टिकाए रखा।
प्रमाण और परम्परा
- नवीं शताब्दी के जो ताम्रपत्र उनके नाम से जारी हुए, वे जालौर-कन्नौज प्रतिहार शाखा के विस्तृत भौगोलिक प्रसार के प्रमाण माने जाते हैं।
- मध्यकालीन राजस्थान के राजवंशों के विवरण में परम्परा महेन्द्रपाल को भोज के साथ इस वंश के सर्वाधिक प्रतापी सम्राटों में स्थान देती है।
- यहाँ ताम्रपत्र और परम्परा, दोनों को साथ पढ़ना जरूरी है: ताम्रपत्र सत्ता की वास्तविक पहुँच दिखाते हैं, जबकि राजवंशीय परम्परा यह बताती है कि बाद की स्मृति में महेन्द्रपाल को भोज के बराबर प्रतापी शासक माना गया।
राजशेखर का दरबार
- उनके दरबार की प्रमुख विभूति राजशेखर थे।
- उनकी उपलब्ध रचनाओं में कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विद्धशालभंजिका, बालरामायण तथा बालभारत सम्मिलित हैं।
- राजशेखर की उपस्थिति से महेन्द्रपाल का दरबार केवल राजनीतिक दरबार नहीं रहता; वह काव्य, नाटक और साहित्यिक विचार का केंद्र भी बनता है।
- कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विद्धशालभंजिका, बालरामायण और बालभारत को साथ याद करने से राजशेखर की रचनात्मक व्यापकता और महेन्द्रपाल के सांस्कृतिक संरक्षण, दोनों साफ दिखते हैं।
उत्तराधिकार और क्रमिक पतन
- उनके पश्चात् सिंहासन महीपाल को प्राप्त हुआ।
- तत्पश्चात् पालों, राष्ट्रकूटों और स्वतंत्रता-प्रवृत्त सामन्तों के निरन्तर दबाव ने उस क्रमिक पतन की भूमिका तैयार की जिसकी परिणति महमूद गजनवी के कन्नौज-आक्रमण में हुई।
- इसलिए महेन्द्रपाल का शासन प्रतिहार इतिहास में ऊँचाई और ढलान के बीच खड़ा दिखता है: उनके समय मिहिरभोज से मिली शक्ति और राजशेखर जैसा दरबारी वैभव था, लेकिन उनके बाद महीपाल के दौर से पालों, राष्ट्रकूटों और सामन्तों का दबाव बढ़ता गया और अंततः कन्नौज पर महमूद गजनवी के आक्रमण तक पतन की रेखा पहुँची।
एक शुरुआती टॉपिक पाने के लिए मुफ़्त साइन अप करें
जो पहला बंद टॉपिक आप खोलेंगे, वह आपका रहेगा; बाकी के लिए स्टडी पैक या पूरा कोर्स चाहिए।
