मुख्य तथ्य

  • अल्लट दसवीं सदी के मध्य का मेवाड़ का गुहिलवंशी शासक था, जिसे भाटों की ख्यातों में आलरावल नाम से याद किया गया है।
  • आटपुर शिलालेख की वंशसूची में अल्लट का स्थान शील, अपराजित और भर्तृभट्ट के बाद तथा नरवाहन, शक्तिकुमार और विजयसिंह से पहले आता है।
  • अल्लट ने गुहिलों की राजनीतिक गतिविधि का केन्द्र नागदा से हटाकर आहड़ में स्थापित किया।
  • अल्लट का हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह गुहिल शासक-वर्ग और योद्धा-कुलों के राजनीतिक-सामाजिक समावेशन का संकेत माना गया है।
  • अल्लट ने आहड़ में वराह मन्दिर बनवाया, जिससे उसकी धार्मिक संरक्षक-छवि और वैष्णव संरक्षण से जुड़ी राजसत्ता की वैधता सामने आती है।

मुख्य बिंदु

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    अल्लट दसवीं सदी के मध्य का मेवाड़ का गुहिलवंशी शासक था, जिसे भाटों की ख्यातों में आलरावल नाम से याद किया गया है।

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    आटपुर शिलालेख की वंशसूची में अल्लट का स्थान शील, अपराजित और भर्तृभट्ट के बाद तथा नरवाहन, शक्तिकुमार और विजयसिंह से पहले आता है।

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    अल्लट ने गुहिलों की राजनीतिक गतिविधि का केन्द्र नागदा से हटाकर आहड़ में स्थापित किया।

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    अल्लट का हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह गुहिल शासक-वर्ग और योद्धा-कुलों के राजनीतिक-सामाजिक समावेशन का संकेत माना गया है।

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    अल्लट ने आहड़ में वराह मन्दिर बनवाया, जिससे उसकी धार्मिक संरक्षक-छवि और वैष्णव संरक्षण से जुड़ी राजसत्ता की वैधता सामने आती है।

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    विक्रम संवत् १०१० के लेख में अल्लट के दरबारी विद्वानों के नाम मिलते हैं, जिससे आहड़ की विद्वत्ता-परम्परा की पुष्टि होती है।

अल्लट कौन था और मेवाड़ के इतिहास में उसका महत्व क्या है?

अल्लट दसवीं सदी के मध्य का मेवाड़ का गुहिलवंशी शासक था, जिसका महत्व आहड़ को राजनीतिक केन्द्र बनाने, वराह मन्दिर बनवाने, हूण राजकुमारी हरियादेवी से वैवाहिक सम्बन्ध जोड़ने और गुहिल वंश की वंशसूची में साफ पहचाने जाने के कारण है।

  • अल्लट: भाटों की ख्यातों में आलरावल नाम से याद किया गया है।
  • वंश और काल: मेवाड़ का यह गुहिलवंशी शासक बप्पा परम्परा का था और दसवीं सदी के मध्यवर्ती चरण में सत्ता पर रहा। उसके समय को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह भर्तृभट्ट के बाद और नरवाहन से पहले आता है; इसलिए मेवाड़ के प्रारम्भिक मध्यकालीन राजनीतिक क्रम में वह बीच की, पर बहुत उपयोगी, कड़ी है।
  • ऐतिहासिक पहचान: अल्लट को केवल लोक-स्मृति से नहीं, बल्कि शिलालेखीय परम्परा से भी पहचाना जाता है। उसके नाम के साथ आहड़, वराह मन्दिर, हरियादेवी और दरबारी विद्वानों की सूची जुड़ती है, इसलिए परीक्षा में यह नाम वंश, राजधानी, विवाह और सांस्कृतिक संरक्षण चारों कोणों से पूछा जा सकता है।

आज जिस उदयपुर जिले में आहड़ आता है, वहाँ भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त की जनगणना २०११ के अनुसार कुल जनसंख्या ३०,६८,४२० थी; इससे आहड़-उदयपुर क्षेत्र की ऐतिहासिक निरंतरता को आधुनिक प्रशासनिक भूगोल से जोड़कर याद रखना आसान होता है।

वंशसूची में स्थान

शक्तिकुमार के विक्रम संवत् १०३४ अर्थात् ९७७ ई. वाले आटपुर शिलालेख की वंशसूची में शील, अपराजित और भर्तृभट्ट के बाद अल्लट का स्थान रखा गया है तथा उसके आगे नरवाहन, फिर शक्तिकुमार और अन्त में विजयसिंह का उल्लेख आता है:

१. शील
२. अपराजित
३. भर्तृभट्ट
४. अल्लट
५. नरवाहन
६. शक्तिकुमार
७. विजयसिंह

इस क्रम से अल्लट को अलग-थलग शासक मानने के बजाय गुहिल सत्ता की लगातार चलती वंश-परम्परा में रखना चाहिए। शील, अपराजित और भर्तृभट्ट के बाद उसका आना बताता है कि वह पूर्ववर्ती गुहिल आधार पर खड़ा था, और नरवाहन तथा शक्तिकुमार से पहले उसका स्थान आगे की मेवाड़ी राजनीति को जोड़ता है।

वैवाहिक सम्बन्ध

  • उसका हूण राजकुमारी हरियादेवी के साथ विवाह हुआ।
  • इसे इतिहासकार आदिवासी कुलों के राजपूतीकरण की प्रक्रिया का ठोस साक्ष्य मानते हैं।
  • हरियादेवी से विवाह को केवल पारिवारिक घटना नहीं समझना चाहिए; यह गुहिल शासक-वर्ग और स्थानीय अथवा बाहरी योद्धा-कुलों के बीच राजनीतिक-सामाजिक समावेशन का संकेत देता है।
  • इसी कारण अल्लट का नाम राजपूतीकरण, वंश-निर्माण और प्रारम्भिक मध्यकालीन मेवाड़ में सत्ता-संबंधों की चर्चा में उपयोगी हो जाता है।

आहड़ केन्द्र और वराह मन्दिर

  • अल्लट ने गुहिलों की राजनीतिक गतिविधि का केन्द्र नागदा से हटाकर आहड़ में स्थापित किया।
  • वहीं वराह मन्दिर बनवाया।
  • नागदा से आहड़ की ओर केन्द्र बदलना मेवाड़ की सत्ता के भूगोल में बड़ा संकेत है, क्योंकि इससे आहड़ केवल बस्ती या धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गुहिलों की राजनीतिक सक्रियता का केन्द्र बनता है।
  • वराह मन्दिर बनवाने से अल्लट की धार्मिक संरक्षक-छवि भी सामने आती है; वराह, विष्णु का अवतार माना जाता है, इसलिए यह निर्माण वैष्णव धार्मिक संरक्षण और राजसत्ता की वैधता दोनों से जुड़ता है।

आहड़ की विद्वत्ता-परम्परा

उसके अपने विक्रम संवत् १०१० अर्थात् ९५३ ई. वाले लेख में दरबारी विद्वानों के रूप में इनका नामोल्लेख आता है:

  • ऋषि और प्रभाता
  • फिर गुहिला तथा गर्ग
  • उसके बाद रुद्रादित्य व वामदेव
  • और अन्त में वैलुक एवं पालु

यह आहड़ की विद्वत्ता-परम्परा की पुष्टि करता है। इन नामों से पता चलता है कि अल्लट का दरबार केवल सैनिक या प्रशासनिक केन्द्र नहीं था; वहाँ विद्वानों की उपस्थिति भी दर्ज थी। इसलिए अल्लट के अध्ययन में राजनीतिक केन्द्र-परिवर्तन, वैवाहिक सम्बन्ध और धार्मिक निर्माण के साथ-साथ आहड़ की बौद्धिक परम्परा को भी जोड़कर पढ़ना चाहिए।