कीर्तिपाल: जालौर की चौहान शाखा का प्रवर्तक
मुख्य तथ्य
- कीर्तिपाल ने ११८१ ई. में जालौर पर चौहान सत्ता स्थापित कर नई राज्य परम्परा की नींव रखी, इसलिए उन्हें जालौर की चौहान शाखा का प्रवर्तक माना जाता है।
- प्राचीन अभिलेखों, विशेषतः बिजोलिया प्रशस्ति, में जालौर का उल्लेख जाबालिपुर के रूप में मिलता है।
- जालौर के समीप स्थित दुर्ग के सुवर्णगिरि, सोनगढ़ और कांचन गिरि नाम मिलते हैं, जो उसे मजबूत पहाड़ी दुर्ग-केन्द्र के रूप में दर्शाते हैं।
- स्वर्णिम पर्वत-शिखर से जुड़ी पहचान के कारण जालौर की इस चौहान वंशशाखा को आगे चलकर सोनगरा चौहान कहा गया।
- कीर्तिपाल के उत्तराधिकारी समरसिंह ने जालौर में प्राचीर, कोषागार और शस्त्रागार बनवाकर शाखा की दुर्ग-सुरक्षा और सैन्य तैयारी को मजबूत किया।
मुख्य बिंदु
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कीर्तिपाल ने ११८१ ई. में जालौर पर चौहान सत्ता स्थापित कर नई राज्य परम्परा की नींव रखी, इसलिए उन्हें जालौर की चौहान शाखा का प्रवर्तक माना जाता है।
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प्राचीन अभिलेखों, विशेषतः बिजोलिया प्रशस्ति, में जालौर का उल्लेख जाबालिपुर के रूप में मिलता है।
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जालौर के समीप स्थित दुर्ग के सुवर्णगिरि, सोनगढ़ और कांचन गिरि नाम मिलते हैं, जो उसे मजबूत पहाड़ी दुर्ग-केन्द्र के रूप में दर्शाते हैं।
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स्वर्णिम पर्वत-शिखर से जुड़ी पहचान के कारण जालौर की इस चौहान वंशशाखा को आगे चलकर सोनगरा चौहान कहा गया।
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कीर्तिपाल के उत्तराधिकारी समरसिंह ने जालौर में प्राचीर, कोषागार और शस्त्रागार बनवाकर शाखा की दुर्ग-सुरक्षा और सैन्य तैयारी को मजबूत किया।
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कान्हड़देव इस वंश के परवर्ती शासकों में सर्वाधिक यशस्वी माने गए और १३११ ई. में अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
कीर्तिपाल जालौर की चौहान शाखा के प्रवर्तक क्यों माने जाते हैं?
कीर्तिपाल जालौर की चौहान शाखा के प्रवर्तक इसलिए माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने ११८१ ई. में जालौर पर चौहान सत्ता स्थापित कर एक नई राज्य परम्परा की नींव रखी, जो आगे चलकर सल्तनत के विस्तार के सामने सशक्त प्रतिरोध बनी। कीर्तिपाल का महत्व केवल एक स्थानीय विजय तक सीमित नहीं था; उनके कदम से जालौर चौहान राजनीति का ऐसा केन्द्र बना जहाँ दुर्ग, वंश-परम्परा, वैवाहिक सम्बन्ध और सैन्य प्रतिरोध एक साथ दिखाई देते हैं। जनगणना २०११ की जालौर जिला जनगणना पुस्तिका के अनुसार आधुनिक जालौर जिले की कुल जनसंख्या १८ लाख २८ हजार ७३० थी, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि जिस ऐतिहासिक क्षेत्र में यह राजवंश विकसित हुआ, वह आज भी राजस्थान के प्रमुख जिला-क्षेत्रों में गिना जाता है।
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+#### जालौर और सोनगरा चौहान
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+- अभिलेखीय उल्लेख: प्राचीन अभिलेखों में, विशेषतः बिजोलिया प्रशस्ति में, जालौर का उल्लेख जाबालिपुर के रूप में हुआ है। यह नाम जालौर के प्राचीन महत्व को समझने में मदद करता है, क्योंकि वही क्षेत्र बाद में कीर्तिपाल के राजनीतिक उदय और चौहान सत्ता की स्थापना से जुड़ता है।
+- दुर्ग के नाम: नगर के समीप स्थित दुर्ग के तीन नाम मिलते हैं — सुवर्णगिरि, सोनगढ़, और कांचन गिरि। इन नामों में स्वर्णिम पर्वत और दुर्गीय सामरिक स्थिति दोनों का संकेत मिलता है, इसलिए जालौर केवल नगर नहीं, बल्कि एक मजबूत पहाड़ी दुर्ग-केन्द्र के रूप में समझना चाहिए।
+- वंशशाखा की संज्ञा: इसी स्वर्णिम पर्वत-शिखर के कारण इस वंशशाखा को आगे चलकर सोनगरा चौहान की संज्ञा प्राप्त हुई। यानी सोनगरा नाम किसी अलग भू-समूह से अधिक जालौर के दुर्ग और उसके स्वर्णगिरि-सोनगढ़ रूपक से जुड़ी वंशीय पहचान को दिखाता है।
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+#### उत्तराधिकारी और परवर्ती शासक
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+- समरसिंह: कीर्तिपाल के उत्तराधिकारी समरसिंह ने जालौर में दृढ़ प्राचीर खड़ी करवाई तथा कोषागार एवं शस्त्रागार का निर्माण भी करवाया; उसने अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह गुजरात के भीमदेव द्वितीय के साथ सम्पन्न किया। इससे स्पष्ट है कि कीर्तिपाल के बाद जालौर शाखा ने केवल सत्ता संभाली नहीं, बल्कि दुर्ग-सुरक्षा, राजकोष, शस्त्र-तैयारी और पड़ोसी राजवंशों से वैवाहिक सम्बन्धों के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत की।
+- कान्हड़देव: इस वंश के परवर्ती शासकों में कान्हड़देव (शासन १३०५-१३११ ई.) सर्वाधिक यशस्वी सिद्ध हुआ, जो १३११ ई. में अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। कान्हड़देव का संघर्ष जालौर की उसी चौहान परम्परा का चरम रूप था जिसकी शुरुआत कीर्तिपाल ने ११८१ ई. में की थी; इसलिए कीर्तिपाल को जालौर शाखा का प्रवर्तक और कान्हड़देव को उसके प्रतिरोधी गौरव का प्रमुख प्रतीक माना जाता है।
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