धारावर्ष: आबू के परमार वंश का अग्रणी शासक (1163-1219 ई.)
मुख्य तथ्य
- धारावर्ष आबू के परमार वंश के प्रभावशाली शासक थे, जिन्होंने ११६३ से १२१९ ई. तक शासन किया और सोलंकी अधीनता से स्वतंत्रता ली।
- धारावर्ष ने मोहम्मद गौरी के विरुद्ध गुजरात की सेना का नेतृत्व किया, इसलिए उन्हें स्थानीय शासक के साथ गुजरात-राजस्थान क्षेत्र की रक्षा में सक्रिय सेनान…
- धारावर्ष का आबू-केन्द्रित शासन अरावली के कठिन पर्वतीय दुर्ग-क्षेत्र पर नियंत्रण से जुड़ा था, क्योंकि माउंट आबू समुद्र तल से लगभग १,२१९ मीटर की ऊँचाई प…
- धारावर्ष ने नाडौल के चौहानों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे और कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज तथा भीमदेव द्वितीय जैसे चार सोलंकी राजाओं के समकालीन रहे।
- धारावर्ष की रणकीर्ति का मुख्य प्रमाण पटनारायण मन्दिर का शिलालेख है, जिसमें एक ही बाण से सीधी पंक्ति में तीन भैंसों को बींधने का वर्णन मिलता है।
मुख्य बिंदु
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धारावर्ष आबू के परमार वंश के प्रभावशाली शासक थे, जिन्होंने ११६३ से १२१९ ई. तक शासन किया और सोलंकी अधीनता से स्वतंत्रता ली।
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धारावर्ष ने मोहम्मद गौरी के विरुद्ध गुजरात की सेना का नेतृत्व किया, इसलिए उन्हें स्थानीय शासक के साथ गुजरात-राजस्थान क्षेत्र की रक्षा में सक्रिय सेनानायक के रूप में भी पढ़ा जाता है।
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धारावर्ष का आबू-केन्द्रित शासन अरावली के कठिन पर्वतीय दुर्ग-क्षेत्र पर नियंत्रण से जुड़ा था, क्योंकि माउंट आबू समुद्र तल से लगभग १,२१९ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
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धारावर्ष ने नाडौल के चौहानों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे और कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज तथा भीमदेव द्वितीय जैसे चार सोलंकी राजाओं के समकालीन रहे।
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धारावर्ष की रणकीर्ति का मुख्य प्रमाण पटनारायण मन्दिर का शिलालेख है, जिसमें एक ही बाण से सीधी पंक्ति में तीन भैंसों को बींधने का वर्णन मिलता है।
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धारावर्ष के काल और उत्तराधिकार-परिवेश में प्रह्लादन देव, सोमेश्वर, सोमसिंह और मन्त्री तेजपाल जैसे व्यक्तियों से विद्या, नगर-स्थापना, चरित-ग्रन्थ और मंदिर-निर्माण की सांस्कृतिक परम्परा जुड़ी थी।
धारावर्ष कौन थे और आबू के परमार वंश में उनका महत्व क्या था?
धारावर्ष आबू के परमार वंश के सबसे प्रभावशाली शासकों में गिने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने ११६३ से १२१९ ई. तक शासन किया, सोलंकी अधीनता से स्वतंत्रता ली और मोहम्मद गौरी के विरुद्ध गुजरात की सेना का नेतृत्व किया। उनका शासन बारहवीं शताब्दी के अंत और तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में आबू-चन्द्रावती क्षेत्र की राजनीतिक ताकत, रणकौशल और सांस्कृतिक संरक्षण को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जनगणना २०११ की सिरोही जिला पुस्तिका के अनुसार माउंट आबू समुद्र तल से लगभग १,२१९ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, इसलिए धारावर्ष का आबू-केन्द्रित शासन केवल राजवंशीय सत्ता नहीं, बल्कि अरावली के कठिन पर्वतीय दुर्ग-क्षेत्र पर नियंत्रण का भी मामला था।
राजनीतिक स्थिति
- वंश-सम्बन्ध: वे महामण्डलेश्वर की उपाधि धारण करने वाले विक्रमदेव के प्रपौत्र थे। यह वंश-सम्बन्ध उन्हें आबू के परमारों की स्थापित शासकीय परम्परा से जोड़ता है।
- राज्य-प्राप्ति का समय: जब उन्हें राज्य मिला, उस समय गुजरात के सोलंकी अधिपति घोरी आक्रमणों में उलझे हुए थे। इसी कारण क्षेत्रीय सामन्तों और परमारों जैसे शक्तिशाली स्थानीय शासकों के लिए स्वतंत्र नीति अपनाने की गुंजाइश बनी।
- स्वतंत्र शासन: इसी अनुकूल अवसर पर उन्होंने सोलंकी अधीनता का जुआ उतार फेंका और स्वतंत्र शासक की भाँति राज किया। धारावर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि यही थी कि उन्होंने आबू के परमार राज्य को केवल आश्रित सामन्ती इकाई बनाकर नहीं रखा।
- नाडौल के चौहानों से सम्बन्ध: उन्होंने नाडौल के चौहानों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे। यह सम्बन्ध पश्चिमी राजस्थान और दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान की शक्ति-संतुलन राजनीति में उपयोगी था।
- सैन्य भूमिका: मोहम्मद गौरी के विरुद्ध गुजरात द्वारा लड़े गए संघर्ष में गुजराती सेना का सेनापतित्व इन्होंने ही किया। इसलिए धारावर्ष को केवल स्थानीय शासक नहीं, बल्कि घोरी दबाव के समय गुजरात-राजस्थान क्षेत्र की सामूहिक रक्षा में सक्रिय सेनानायक के रूप में भी पढ़ना चाहिए।
गुजरात के सोलंकी समकालीन
गुजरात की राजगद्दी पर इस अवधि में लगातार चार सोलंकी राजा बैठे और इन सभी के समकालीन धारावर्ष ही रहे। यह लंबा समकालीन काल बताता है कि धारावर्ष का शासन एक छोटे अंतराल की घटना नहीं था, बल्कि कई सोलंकी उत्तराधिकारों के बीच टिके रहने वाली स्थिर राजनीतिक उपस्थिति थी।
| क्रम | सोलंकी राजा |
|---|---|
| पहले | कुमारपाल |
| फिर | अजयपाल |
| उसके बाद | मूलराज |
| अंत में | भीमदेव द्वितीय |
रणकीर्ति और प्रमाण
- शिलालेख: उनकी रणकीर्ति का सबसे चर्चित प्रमाण पटनारायण मन्दिर के शिलालेख (वि.सं. १३४४ / १२८७ ई.) में सुरक्षित है। परीक्षा में धारावर्ष से जुड़ा प्रमाण पूछे जाने पर पटनारायण मन्दिर का शिलालेख मुख्य संकेतक माना जाता है।
- पराक्रम: इसके अनुसार धारावर्ष एक ही बाण से सीधी पंक्ति में तीन भैंसों को बींध डालते थे। यह वर्णन उनकी व्यक्तिगत वीरता और धनुर्विद्या की अतिशयोक्तिपूर्ण, परन्तु स्मरणीय, लोक-ऐतिहासिक छवि बनाता है।
- मूर्त साक्ष्य: अचलेश्वर तीर्थ के मन्दाकिनी कुण्ड पर स्थापित उनकी प्रतिमा तथा आर-पार छिद्रित तीन भैंसे आज भी इस पराक्रम के मूर्त साक्ष्य के रूप में खड़े हैं। इसलिए धारावर्ष की रणकीर्ति केवल ग्रन्थ या शिलालेख में नहीं, बल्कि अचलगढ़-आबू क्षेत्र की दृश्य परम्परा में भी याद रखी जाती है।
विद्या, जनोपयोगी निर्माण और उत्तराधिकार
उनका राज्यकाल विद्या के प्रसार तथा अनेक जनोपयोगी निर्माणों के लिए भी जाना जाता है। धारावर्ष के आसपास का दरबारी संसार केवल युद्ध और सामन्ती राजनीति तक सीमित नहीं था; इसमें नाटक, चरित-ग्रन्थ, नगर-स्थापना और मंदिर-निर्माण जैसी सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी जुड़ी थीं।
| व्यक्ति | सम्बन्ध / भूमिका | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| प्रह्लादन देव | धारावर्ष के छोटे भाई | वीर भी थे और विद्वान भी; उन्होंने ‘पार्थ-पराक्रम-व्यायोग’ नामक नाटक की रचना की तथा अपने नाम पर प्रह्लादनपुर (आधुनिक पालनपुर) नगर बसाया। |
| सोमेश्वर | दरबारी कवि | उनकी रचना ‘कीर्ति-कौमुदी’ आगे चलकर एक मानक चरित-ग्रन्थ बनी; वे इसी राजसभा की शोभा थे। |
| सोमसिंह | धारावर्ष के पुत्र | धारावर्ष के बाद सोलंकी भीमदेव द्वितीय के सामन्त के रूप में आबू पर शासक हुए। इससे स्पष्ट होता है कि धारावर्ष के बाद परमार सत्ता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, बल्कि बदली हुई सामन्ती स्थिति में आगे चली। |
| तेजपाल | मन्त्री | धारावर्ष की उत्तराधिकार-रेखा से जुड़े सांस्कृतिक वातावरण में मन्त्री तेजपाल ने आबू पर्वत पर देलवाड़ा गाँव में लूणवसही (नेमिनाथ) मन्दिर का निर्माण करवाया; इसे धारावर्ष के ११६३-१२१९ ई. राज्यकाल के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाद की तेरहवीं शताब्दी की परमार-सोलंकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में रखना चाहिए। |
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