मुख्य तथ्य

  • 1992 में यूएनएफसीसी, 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल और 2015 में पेरिस समझौते ने वैश्विक जलवायु शासन की क्रमिक संरचना बनाई।
  • आईपीसीसी छठी आकलन रिपोर्ट 2021, 2022 और 2023 में आई तथा 20 मार्च 2023 की संश्लेषण रिपोर्ट ने वैश्विक स्टॉकटेक को आधार दिया।
  • भारत के 2022 के संशोधित राष्ट्रीय निर्धारित योगदान में 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी और विद्युत स्थापित क्षमता में लगभग 50% गैर-जीवाश्म हिस्सा…
  • आईएसएफआर 2023 ने वन और वृक्षावरण में 30.43 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य कार्बन-सिंक बताया, जो भारत के 2030 लक्ष्य से जुड़ता है।

मुख्य बिंदु

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    जलवायु परिवर्तन तापमान, वर्षा, चरम घटनाओं और जलवायु-तंत्र में दीर्घकालिक बदलाव है, जिसका मुख्य कारण ऊष्मा रोकने वाली हरितगृह गैसें हैं।

  2. 2

    1992 में यूएनएफसीसी, 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल और 2015 में पेरिस समझौते ने वैश्विक जलवायु शासन की क्रमिक संरचना बनाई।

  3. 3

    किगाली संशोधन ओजोन और जलवायु नीति को जोड़ता है, क्योंकि वह शीतलन क्षेत्र में प्रयुक्त हाइड्रोफ्लोरोकार्बन को घटाने का मार्ग देता है।

  4. 4

    आईपीसीसी छठी आकलन रिपोर्ट 2021, 2022 और 2023 में आई तथा 20 मार्च 2023 की संश्लेषण रिपोर्ट ने वैश्विक स्टॉकटेक को आधार दिया।

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    भारत के 2022 के संशोधित राष्ट्रीय निर्धारित योगदान में 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी और विद्युत स्थापित क्षमता में लगभग 50% गैर-जीवाश्म हिस्सा शामिल है।

  6. 6

    भारत में जलवायु कार्रवाई पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, ऊर्जा संरक्षण संशोधन, वन, वन्यजीव और जैव विविधता कानूनों के सहारे लागू होती है।

  7. 7

    आईएसएफआर 2023 ने वन और वृक्षावरण में 30.43 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य कार्बन-सिंक बताया, जो भारत के 2030 लक्ष्य से जुड़ता है।

  8. 8

    राजस्थान में जलवायु परिवर्तन लू, थार मरुस्थल के जल-दबाव, शुष्क कृषि, अरावली पुनर्स्थापन और सौर ऊर्जा के रूप में सीधे दिखता है।

जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रक्रिया कैसे काम करती है?

जलवायु परिवर्तन औसत तापमान, वर्षा, आर्द्रता, समुद्र-स्तर, हिमावरण, पवन-परिसंचरण और चरम घटनाओं में लंबे समय तक होने वाला बदलाव है, और इसका मुख्य वैज्ञानिक कारण मानव गतिविधियों से मजबूत हुआ हरितगृह प्रभाव है। आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार २०११-२०२० में वैश्विक सतही तापमान १८५०-१९०० के स्तर से लगभग १.१ डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुँच चुका था।

हरितगृह प्रक्रिया

  • इसका वैज्ञानिक केंद्र बढ़ा हुआ हरितगृह प्रभाव है।
  • सौर विकिरण पृथ्वी तंत्र में अधिकतर छोटी तरंग ऊर्जा के रूप में प्रवेश करता है।
  • पृथ्वी की सतह लंबी तरंगों वाली अवरक्त ऊर्जा उत्सर्जित करती है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन और फ्लोरीनयुक्त गैसें बाहर जाती ऊष्मा का कुछ भाग अवशोषित करके फिर विकिरित करती हैं।
  • प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव न हो तो पृथ्वी बहुत ठंडी होती।

मानवजनित उत्सर्जन

मानवजनित उत्सर्जनों ने इस ऊष्मा-जाल को मजबूत किया है। इनके स्रोत हैं:

  • जीवाश्म ईंधन दहन
  • सीमेंट निर्माण
  • वनों की कटाई
  • धान के खेत
  • पशुधन
  • उर्वरक
  • कचरा-स्थल
  • औद्योगिक गैसें

जलवायु तंत्र पर प्रभाव

  • यूएनएफसीसी हरितगृह गैसों और जलवायु तंत्र की भाषा इसलिए प्रयोग करता है कि तापवृद्धि केवल थर्मामीटर की संख्या नहीं बदलती।
  • वह महासागर, हिममंडल, मानसून परिसंचरण, पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि, मानव स्वास्थ्य और आपदा-जोखिम को भी बदलती है।

राजस्थान संदर्भ

  • राजस्थान में यह अंतर तुरंत दिखता है।
  • लू की घटनाएँ मजदूरों, स्कूली बच्चों, पशुधन और शहरी गरीबों को ऊष्मा-तनाव के सामने लाती हैं।
  • थार मरुस्थल उच्च तापमान, वाष्पीकरण और जल-अभाव के संबंध को साफ दिखाता है।
  • कोयला संयंत्र, वाहन या भट्ठे से निकला वही कार्बन डाइऑक्साइड अणु वैश्विक वायुमंडल में मिल जाता है, पर संवेदनशीलता स्थानीय रहती है।
  • घटते भूजल, विरल वनस्पति और अनौपचारिक बाहरी श्रम वाला मरुस्थलीय जिला जलवायु जोखिम को तटीय जिले से अलग ढंग से अनुभव करता है।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 MCQ इन जलवायु समझौतों को अपनाए जाने के सही कालक्रम में रखें: क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता, किगाली संशोधन और यूएनएफसीसी।
  1. A क्योटो प्रोटोकॉल - यूएनएफसीसी - पेरिस समझौता - किगाली संशोधन
  2. B यूएनएफसीसी - क्योटो प्रोटोकॉल - पेरिस समझौता - किगाली संशोधन सही उत्तर
  3. C यूएनएफसीसी - पेरिस समझौता - क्योटो प्रोटोकॉल - किगाली संशोधन
  4. D पेरिस समझौता - यूएनएफसीसी - क्योटो प्रोटोकॉल - किगाली संशोधन

व्याख्या

सही क्रम 1992 का यूएनएफसीसी, 1997 का क्योटो प्रोटोकॉल, 2015 का पेरिस समझौता और 2016 का किगाली संशोधन है। यह क्रम रूपरेखा अभिसमय से विकसित देशों के लक्ष्य, फिर सार्वभौमिक योगदान और बाद में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन कमी तक जाता है। विकल्प क रूपरेखा से पहले क्योटो रखता है। विकल्प ग पेरिस और क्योटो को उलटता है। विकल्प घ सबसे बाद की पेरिस व्यवस्था से शुरू करता है।