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व्यवहार एवं विधि

मुख्य बिंदु

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 — परिभाषाएँ एवं प्रमुख धाराएँ

पेपर III · इकाई 3 अनुभाग 1 / 16 PYQ-शैली 23 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

मुख्य बिंदु

  1. राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 को 15 अक्टूबर 1955 को लागू किया गया, जो राजस्थान में काश्तकारी कानून को समेकित एवं संशोधित करता है; इसने पूर्ववर्ती जागीर युग के काश्तकारी नियमों का स्थान लिया।

  2. खातेदार काश्तकार सर्वाधिक विशेषाधिकार-प्राप्त श्रेणी है — वह व्यक्ति जो किसी खाते में स्थायी, वंशानुगत एवं हस्तांतरणीय अधिभोग अधिकार के साथ भूमि धारण करता है; धारा 5(18) में परिभाषित।

  3. गैर-खातेदार काश्तकार स्थायी या वंशानुगत अधिकार के बिना भूमि धारण करता है; यह अधिकार न तो उत्तराधिकार में मिलता है और न ही हस्तांतरणीय होता है; धारा 5(10) में परिभाषित।

  4. उप-काश्तकार वे हैं जो खातेदार के अधीन भूमि जोतते हैं; एक खातेदार केवल अधिनियम में निर्धारित सीमाओं के अंतर्गत — मुख्यतः विकलांग, नाबालिग, या विधवा के लिए — उप-पट्टे दे सकता है।

  5. सायर का अर्थ है भूमि अधिकारों से आनुषंगिक — वृक्षों, वन उपज, मत्स्य पालन, और जल स्रोतों से होने वाली आय; यह भूमि राजस्व का एक पद है जो भूमि से गैर-फसल राजस्व को परिभाषित करता है; 2023 PYQ में पूछा गया।

  6. सागरी प्रथा एक प्रकार की बंधुआ मजदूरी थी जिसमें ऋणी या उसके वंशज पूर्वजों के ऋण के बदले जमींदार की भूमि पर काम करते थे; अधिनियम ने सागरी को समाप्त किया; धारा 177 सागरी दायित्वों के प्रवर्तन को दंडनीय बनाती है।

  7. खातेदार काश्तकार की बेदखली केवल धारा 183 में निर्दिष्ट आधारों पर हो सकती है: दो लगातार वर्षों का किराया न देना, भूमि का गैर-कृषि उपयोग, या काश्तकारी शर्तों का उल्लंघन।

  8. धारा 82–110 के अंतर्गत काश्तकारी अधिकारों का उत्तराधिकार: खातेदारी अधिकार वैध उत्तराधिकारियों को प्राप्त होते हैं; 1956 के बाद पुत्रियों को समान उत्तराधिकार; विधवाओं के काश्तकारी अधिकार संरक्षित हैं।

  9. धारा 148 के तहत लगान निर्धारण: लगान वार्षिक उपज के छठे भाग से अधिक नहीं होगा; राजस्व न्यायालय लगान कम करने या निर्धारित करने का अधिकार रखता है; पाँच वर्ष में एक से अधिक बार लगान संशोधन नहीं।

  10. धारा 56 के तहत स्वैच्छिक समर्पण: खातेदार तीन महीने का नोटिस देकर राज्य को काश्तकारी समर्पित कर सकता है; समर्पण तिथि के बाद बकाए का दायित्व नहीं रहता।

  11. राजस्व न्यायालय का क्षेत्राधिकार: अधिनियम के अंतर्गत विवादों का निर्णय राजस्व न्यायालयों (पटवारी → तहसीलदार → कलेक्टर → बोर्ड ऑफ रेवेन्यू) द्वारा होता है; धारा 241 राजस्व न्यायालयों के संज्ञेय मामलों में सिविल न्यायालयों के क्षेत्राधिकार पर प्रतिबंध लगाती है।

  12. अन्यसंक्रामण से संरक्षण: खातेदारी भूमि गैर-कृषक को हस्तांतरित नहीं की जा सकती (अनुसूचित जाति/जनजाति की भूमि विशेष रूप से संरक्षित); धारा 42 कलेक्टर की पूर्व अनुमति के बिना गैर-कृषि वर्ग को हस्तांतरण प्रतिबंधित करती है।