पृथ्वी - लचीले एवं एकीकृत स्थलीय आवासों तथा वन्यजीव संवर्धन पहल परियोजना
**उद्देश्य:** राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करना, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना और इको-पर्यटन को बढ़ावा देना। **बजट:** 1,500 करोड़ रुपये। **प्रमुख विशेषताएं:** - जयपुर, कोटा, बूंदी, उदयपुर, अलवर और सवाई माधोपुर में वन्य प्राणी उपचार केंद्र - भरतपुर, सांभर और कुचामन में पक्षी रोग केंद्र - आवास संरक्षण के लिए 1,000 हेक्टेयर वन्यजीव भूमि बैंक - भीलवाड़ा और टोंक में नए इको एवं प्रकृति पार्क - 291 वन्यजीव एम्बुलेंस और रैपिड मोबिलिटी टीमों के लिए 25 करोड़ रुपये - आवास विकास, संघर्ष शमन और इको-पर्यटन पर ध्यान **लाभार्थी:** वन्यजीव, वन समुदाय, इको-पर्यटन संचालक, और संघर्ष क्षेत्रों की ग्रामीण आबादी। **कार्यान्वयन एजेंसी:** राजस्थान वन विभाग। **घोषणा:** राजस्थान बजट 2026-27 (11 फरवरी, 2026) वित्त मंत्री दीया कुमारी द्वारा।
- पृथ्वी — राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष शमन और पारिस्थितिकी पर्यटन संवर्धन हेतु 1,500 करोड़ रुपये का बजट
- जयपुर, कोटा, बूँदी, उदयपुर, अलवर और सवाई माधोपुर में वन्य पशु उपचार केंद्र स्थापित
- भरतपुर, सांभर और कुचामन में पक्षी रोग केंद्र स्थापित
- आवास संरक्षण के लिए 1,000 हेक्टेयर का वन्यजीव भूमि बैंक और भीलवाड़ा व टोंक में नए इको एवं नेचर पार्क
- 291 वन्यजीव एम्बुलेंस और रैपिड मोबिलिटी टीमों के लिए 25 करोड़ रुपये आवंटित
- राजस्थान बजट 2026-27 (11 फरवरी 2026) में वित्त मंत्री दीया कुमारी द्वारा घोषित, राजस्थान वन विभाग द्वारा कार्यान्वित
पृथ्वी परियोजना का उद्देश्य क्या है?
इस परियोजना का उद्देश्य राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करना, मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करना और इको-पर्यटन को बढ़ावा देना है।
पृथ्वी परियोजना का बजट कितना है?
संदर्भ के अनुसार पृथ्वी परियोजना का बजट 1,500 करोड़ रुपये है, जिसे वन्यजीव संरक्षण और संबंधित सुविधाओं के लिए रखा गया है।
वन्य प्राणी उपचार केंद्र किन शहरों में प्रस्तावित हैं?
वन्य प्राणी उपचार केंद्र जयपुर, कोटा, बूंदी, उदयपुर, अलवर और सवाई माधोपुर में प्रस्तावित हैं।
इस परियोजना में वन्यजीव भूमि बैंक का क्या प्रावधान है?
आवास संरक्षण के लिए 1,000 हेक्टेयर वन्यजीव भूमि बैंक का प्रावधान है, जिससे वन्यजीव आवास विकास को समर्थन मिलेगा।
पृथ्वी परियोजना के लाभार्थी कौन हैं?
लाभार्थियों में वन्यजीव, वन समुदाय, इको-पर्यटन संचालक और मानव-वन्यजीव संघर्ष क्षेत्रों की ग्रामीण आबादी शामिल है।
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