बारहमासा: राजस्थानी लघुचित्र परम्परा का बारह महीनों वाला विषय
मुख्य तथ्य
- बारहमासा राजस्थानी लघुचित्र परम्परा का प्रचलित विषय है, जिसमें वर्ष के बारह महीनों की ऋतु-अनुभूति और नायिका की विरह-वेदना साथ-साथ चित्रित होती है।
- राजस्थानी लघुचित्रों में बारहमासा लोक-जीवन, पर्व-उत्सव और अलग-अलग चित्रशैलियों की कलात्मक दृष्टि को भी एक साथ दिखाता है।
- हुकुम चन्द्र जैन के अनुसार बारहमासा विषय मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, कोटा, बीकानेर, किशनगढ़, जयपुर और अलवर जैसी उपशैलियों तक फैला रहा।
- हर उपशैली में राग-रागिनी, भागवत, रामायण और रासलीला के साथ बारहमासा भी रचा गया।
- जयपुर और अलवर की चित्रशैलियों पर मुगल छाप सर्वाधिक रही।
मुख्य बिंदु
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बारहमासा राजस्थानी लघुचित्र परम्परा का प्रचलित विषय है, जिसमें वर्ष के बारह महीनों की ऋतु-अनुभूति और नायिका की विरह-वेदना साथ-साथ चित्रित होती है।
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राजस्थानी लघुचित्रों में बारहमासा लोक-जीवन, पर्व-उत्सव और अलग-अलग चित्रशैलियों की कलात्मक दृष्टि को भी एक साथ दिखाता है।
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हुकुम चन्द्र जैन के अनुसार बारहमासा विषय मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, कोटा, बीकानेर, किशनगढ़, जयपुर और अलवर जैसी उपशैलियों तक फैला रहा।
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हर उपशैली में राग-रागिनी, भागवत, रामायण और रासलीला के साथ बारहमासा भी रचा गया।
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जयपुर और अलवर की चित्रशैलियों पर मुगल छाप सर्वाधिक रही।
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प्रेमचंद्र गोस्वामी के अनुसार जोधपुर के उम्मेद बाग स्थित राजकीय संग्रहालय में लघु शैली की बारहमासा शृंखला उस संग्रहालय की अनूठी निधि मानी गई है।
राजस्थानी लघुचित्रों में बारहमासा विषय क्या दिखाता है?
राजस्थानी लघुचित्रों में बारहमासा विषय वर्ष के बारह महीनों की बदलती ऋतु-अनुभूति, नायिका की विरह-वेदना, लोक-जीवन, पर्व-उत्सव और अलग-अलग चित्रशैलियों की कलात्मक दृष्टि को एक साथ दिखाता है। बारहमासा राजस्थानी लघुचित्र परम्परा का एक प्रचलित विषय है, जिसमें वर्ष के बारह महीनों की ऋतु-अनुभूति और नायिका की विरह-वेदना एक साथ चित्रित होती है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के आधिकारिक पर्यटन पोर्टल के अनुसार जोधपुर के सरदार राजकीय संग्रहालय की ऐतिहासिक शुरुआत १९०९ से जुड़ती है।
शैली-प्रसार
- हुकुम चन्द्र जैन के अनुसार: यह विषय किसी एक शैली तक सीमित नहीं रहा।
| उपशैली | संदर्भ |
|---|---|
| मेवाड़ | उदयपुर-केन्द्रित मेवाड़ |
| मारवाड़ | जोधपुर की मारवाड़ धारा |
| बूंदी | हाड़ौती की बूंदी शाखा |
| कोटा | हाड़ौती की कोटा शाखा |
| बीकानेर | उत्तरी रेगिस्तान की बीकानेर |
| किशनगढ़ | भक्ति-प्रधान किशनगढ़ |
| जयपुर | मुगल-स्पर्श वाले जयपुर |
| अलवर | मुगल-स्पर्श वाले अलवर |
- सह-विषय: हर उपशैली में राग-रागिनी, भागवत, रामायण और रासलीला के साथ बारहमासा भी रचा गया।
- मुगल छाप: मुगल छाप जयपुर तथा अलवर पर सर्वाधिक रही।
लोक-जीवन और पर्व-उत्सव
- यह शैली लोक-जीवन और पर्व-उत्सवों का अमूल्य अभिलेख भी मानी जाती है।
- कलाकार ऋतुओं तथा त्योहारों से राजपूत नायक को घर के मोह में बाँध देता है।
राजकीय संग्रहालय
- प्रेमचंद्र गोस्वामी के अनुसार: जोधपुर के उम्मेद बाग स्थित राजकीय संग्रहालय में लघु शैली की बारहमासा शृंखला उस संग्रहालय की अनूठी निधि मानी गई है।
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