मुख्य बिंदु

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    भारत का सर्वोच्च न्यायालय — आधार

    • स्थापना 28 जनवरी 1950, अनुच्छेद 124–147 के तहत गठित
    • मूल, अपीलीय और परामर्शदात्री अधिकारिता
    • अंतिम अपीलीय न्यायालय और संविधान का संरक्षक
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    न्यायिक समीक्षा — संवैधानिक आधार

    • विधायी और कार्यकारी कृत्यों की संवैधानिक वैधता जाँचने की शक्ति
    • अनुच्छेद 13 के तहत निहित (मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून शून्य)
    • अनुच्छेद 32 और 226 (रिट अधिकारिता)
    • केशवानंद भारती (1973) में मूल ढाँचे का अंग घोषित
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    न्यायिक सक्रियता और PIL — उद्भव

    • अधिकार संरक्षण और शासन जवाबदेही में न्यायालयों की सक्रिय भूमिका
    • जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से सर्वाधिक प्रभावी
    • न्यायमूर्ति P.N. भगवती और V.R. कृष्णा अय्यर ने 1970 के दशक के अंत में रखी नींव
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    उच्च न्यायालय — मूल तथ्य

    • अनुच्छेद 214–231 के तहत गठित
    • 2025 तक भारत में 25 उच्च न्यायालय
    • नवीनतम: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय, अमरावती (2019)
    • प्रत्येक HC की मूल, अपीलीय और पर्यवेक्षी अधिकारिता
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    पाँच रिट — अनुच्छेद 32 और 226

    • हेबियस कॉर्पस — बंदी को प्रस्तुत करो (अवैध हिरासत से सुरक्षा)
    • मैंडेमस — कर्तव्य पालन का आदेश
    • सर्शियोरारी — निम्न न्यायाधिकरण का आदेश रद्द करो
    • प्रोहिबिशन — अधिकार-क्षेत्र अतिक्रमण रोको
    • को-वारंटो — किस अधिकार से पद धारण?
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    प्रमुख सर्वोच्च न्यायालय निर्णय

    • शंकरी प्रसाद (1951) — संसद मौलिक अधिकार संशोधित कर सकती है
    • गोलकनाथ (1967) — संसद मौलिक अधिकार संशोधित नहीं कर सकती
    • केशवानंद भारती (1973) — मूल ढाँचा सिद्धांत
    • मनेका गाँधी (1978) — अनुच्छेद 21 का विस्तार (गरिमा सहित)
    • विशाखा (1997) — कार्यस्थल यौन उत्पीड़न दिशानिर्देश
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    ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना — तीन चरण

    • चरण I (2007–2015): जिला और अधीनस्थ न्यायालयों का कम्प्यूटरीकरण
    • चरण II (2015–2023): NJDG, केस मैनेजमेंट सिस्टम, ई-फाइलिंग
    • चरण III (2023–2027): बजट ₹7,210 करोड़ — डिजिटल कोर्ट, वर्चुअल सुनवाई, ICJS, पेपरलेस कोर्ट
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    वर्चुअल कोर्ट — कोविड-19 और आगे

    • मार्च 2020 में कोविड-19 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें शुरू किया
    • 2025 तक 24 लाख से अधिक मामलों की सुनवाई वर्चुअल माध्यम से हुई
    • फास्टर प्रणाली जेलों और पुलिस तक न्यायालयी आदेशों का डिजिटल प्रेषण सक्षम बनाती है
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    राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG)

    • सभी न्यायालयों में लंबित मामलों का वास्तविक समय डेटा
    • 2025 की शुरुआत में 4.4 करोड़ लंबित मामले
    • केस मैनेजमेंट सिस्टम (CMS) — मामलों की प्रगति की निगरानी
    • ई-फाइलिंग — न्यायालय याचिकाओं का डिजिटल दाखिला
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    कॉलेजियम प्रणाली — विकास

    • SC और HC न्यायाधीश नियुक्ति का तंत्र
    • तीन न्यायाधीश मामलों से विकसित: S.P. गुप्ता (1982), SCAORA (1993), राष्ट्रपति संदर्भ (1998)
    • NJAC अधिनियम (2015) न्यायिक स्वतंत्रता (मूल ढाँचे) का उल्लंघन मानकर रद्द
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    न्यायिक अतिक्रमण — अवधारणा

    • जब न्यायालय विधायी या कार्यकारी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं
    • न्यायिक सक्रियता से भिन्न
    • उदाहरण: BCCI शासन प्रबंधन, गड्ढे भरवाने के आदेश, स्पीड गवर्नर
    • प्रमुख परीक्षा विषय: न्यायिक सक्रियता (अधिकार संरक्षण) बनाम न्यायिक अतिक्रमण (शक्ति पृथक्करण)
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    हालिया प्रमुख निर्णय

    • नवतेज सिंह जोहर (2018) — धारा 377 को अपराध-मुक्त किया
    • जोसेफ शाइन (2018) — व्यभिचार कानून रद्द
    • सबरीमाला (2018) — सभी आयु की महिलाओं का प्रवेश
    • चुनावी बॉण्ड मामला (2024) — योजना असंवैधानिक घोषित

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M न्यायिक समीक्षा क्या है? भारत में इसका संवैधानिक आधार बताइए। 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

न्यायिक समीक्षा न्यायालयों की विधायी और कार्यकारी कृत्यों की संवैधानिक वैधता जाँचने की शक्ति है। संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून शून्य), अनुच्छेद 32/226 (रिट अधिकारिता) और अनुच्छेद 131–136 (अपीलीय अधिकारिता)। केशवानंद भारती (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे मूल ढाँचे का अंग घोषित किया।

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