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भूगोल

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

राजस्थान की कृषि: प्रमुख फसलें, उत्पादन, वितरण

पेपर II · इकाई 3 अनुभाग 15 / 16 PYQ-शैली 43 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1 (5 अंक — 50 शब्द)

राजस्थान की प्रमुख खरीफ और रबी फसलों के नाम बताइए। सरसों के प्रमुख उत्पादक जिले कौन-से हैं?

मॉडल उत्तर: प्रमुख खरीफ फसलें: बाजरा, ग्वार, ज्वार, मूंगफली, कपास, मोठ, तिल। प्रमुख रबी फसलें: सरसों, गेहूँ, चना, जौ। राजस्थान भारत की ~46% सरसों उत्पन्न करता है — प्रमुख जिले: भरतपुर, अलवर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, श्रीगंगानगर, सीकर और टोंक। सरसों हल्की जलोढ़ मिट्टी में पश्चिमी विक्षोभ से शीतकालीन नमी के साथ पनपती है।


प्रश्न 2 (5 अंक — 50 शब्द)

ग्वार क्या है? राजस्थान इसके उत्पादन में क्यों अग्रणी है, और इसके औद्योगिक उपयोग क्या हैं?

मॉडल उत्तर: ग्वार (Cyamopsis tetragonoloba) एक सूखा-प्रतिरोधी फलीदार फसल है जो राजस्थान की शुष्क एवं अर्ध-शुष्क जलवायु के लिए अनूठी रूप से उपयुक्त है। राजस्थान भारत के ग्वार का ~90% और वैश्विक आपूर्ति का ~80% उत्पन्न करता है — जोधपुर, बाड़मेर, नागौर, हनुमानगढ़ और गंगानगर में केंद्रित। ग्वार गम (भ्रूणपोष सत्त) का उपयोग तेल एवं गैस ड्रिलिंग (फ्रैकिंग द्रव), खाद्य प्रसंस्करण (गाढ़ा करने वाला), कागज, फार्मास्यूटिकल्स और वस्त्र उद्योग में होता है — जिससे इसे उच्च निर्यात मूल्य मिलता है।


प्रश्न 3 (5 अंक — 50 शब्द)

भारत-VISTAAR मंच क्या है? राजस्थान की कृषि विस्तार चुनौतियों के लिए यह कैसे प्रासंगिक है?

मॉडल उत्तर: भारत-VISTAAR (Vibrant and Innovative Science and Technology for Agriculture and Rural Upliftment) हेल्पलाइन 155261 के माध्यम से उपलब्ध एक आवाज-आधारित AI सलाह मंच है। इसमें स्मार्टफोन की आवश्यकता नहीं होती — किसान आवाज कॉल के माध्यम से बहुभाषी फसल सलाह, मंडी मूल्य, मौसम पूर्वानुमान और योजना मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। यह राजस्थान की कम डिजिटल साक्षरता और खराब ग्रामीण इंटरनेट कनेक्टिविटी की चुनौती को सीधे संबोधित करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि अंतिम-छोर की कृषि विस्तार सेवाएँ छोटे और सीमांत किसानों तक पहुँचें।


प्रश्न 4 (5 अंक — 50 शब्द)

जलवायु परिवर्तनशीलता — सूखा और गर्मी की लहर — राजस्थान में प्रमुख रबी फसलों को कैसे प्रभावित करती है?

मॉडल उत्तर: फरवरी-मार्च की गर्मी की लहरें दाने भरने की अवस्था में रबी फसलों को गंभीर नुकसान पहुँचाती हैं, जब गेहूँ और सरसों को हल्के तापमान (15–20°C) की आवश्यकता होती है। फरवरी 2026 की गर्मी की लहर और सूखे ने पूर्वी राजस्थान में रबी उत्पादन अनुमानों को घटाया। राजस्थान का तापमान ~0.5°C प्रति 50 वर्ष की दर से बढ़ रहा है; बढ़ती गर्मी की लहर की आवृत्ति उपज को खतरे में डालती है। PM फसल बीमा योजना और MSP मूल्य समर्थन प्रभावित किसानों को आंशिक वित्तीय बफर प्रदान करते हैं।


प्रश्न 5 (10 अंक — 150 शब्द)

राजस्थान की कृषि भूगोल की विवेचना कीजिए — प्रमुख फसलें, उनका वितरण और राज्य में कृषि प्रतिरूपों को निर्धारित करने वाले कारक।

मॉडल उत्तर: राजस्थान की कृषि भूगोल तीन प्रमुख कारकों से आकार लेती है: वर्षा वितरण, मिट्टी का प्रकार और सिंचाई अवसंरचना। इससे राज्य में स्पष्ट रूप से भिन्न कृषि क्षेत्र बनते हैं।

पश्चिमी शुष्क क्षेत्र (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर): वार्षिक वर्षा 25 सेमी से कम। कृषि लगभग पूर्णतः वर्षा-आधारित और जोखिमपूर्ण। प्रमुख फसलें: बाजरा (भारत का सबसे बड़ा उत्पादक — राष्ट्रीय उत्पादन का 50%), ग्वार (राष्ट्रीय आपूर्ति का 90%), मोठ, तिल और मूंगफली। ये सूखा-सहिष्णु फसलें हैं जिनका उगने का मौसम छोटा होता है। ऊँट पालन और पशुचारण आजीविका के पूरक रूप में बने रहते हैं। जहाँ IGNP सिंचाई पहुँचती है (बीकानेर, गंगानगर), वहाँ गेहूँ, कपास और मूंगफली की खेती संभव है।

केंद्रीय अर्ध-शुष्क क्षेत्र (नागौर, सीकर, झुंझुनूं, पाली, अजमेर): 25–50 सेमी वर्षा; वर्षा-आधारित और भूजल-निर्भर। फसलें: बाजरा, ज्वार, ग्वार, सरसों, चना। नागौर लहसुन और मेथी के लिए जाना जाता है। सीकर-झुंझुनूं को सरसों और गेहूँ के लिए पश्चिमी विक्षोभ की नमी का लाभ मिलता है।

पूर्वी मैदान (जयपुर, अलवर, भरतपुर, दौसा, सवाई माधोपुर): 50–75 सेमी वर्षा; उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी; भूजल सिंचाई। राजस्थान की सर्वाधिक उत्पादक कृषि पट्टी। प्रमुख फसलें: सरसों (भरतपुर-अलवर — शीर्ष उत्पादन क्षेत्र), गेहूँ, चना, मक्का। अलवर में प्याज और आलू की खेती। चम्बल नहर कमान क्षेत्र गन्ना और कपास को सहारा देता है।

हाड़ौती पठार (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़): उच्च नमी धारण क्षमता वाली काली वर्टीसोल मिट्टी। प्रमुख फसलें: सोयाबीन (कोटा डिवीजन — प्रमुख राष्ट्रीय पट्टी), चना, कपास, गेहूँ, रेपसीड। झालावाड़ राजस्थान का सबसे बड़ा संतरा उत्पादक है (MP सीमा से लगी उपोष्ण जलवायु का लाभ)। कोटा बैराज गहन सिंचाई को सहारा देता है।

दक्षिण-पूर्वी जनजातीय क्षेत्र (उदयपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा): 75–100+ सेमी वर्षा; जनजाति-प्रधान; मक्का मुख्य फसल (राजस्थान का सर्वाधिक मक्का उत्पादन इसी पट्टी से)। बाँसवाड़ा में माही सिंचाई से चावल की खेती। MGNREGA और FRA (वन अधिकार अधिनियम) यहाँ कृषि गतिविधि को महत्वपूर्ण रूप से आकार देते हैं।

निर्धारक कारक: (1) वर्षा प्रवणता — पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ती हुई; (2) सिंचाई अवसंरचना — IGNP, चम्बल नहर, बीसलपुर बाँध; (3) मिट्टी उर्वरता — जलोढ़ (पूर्व) बनाम रेतीली (पश्चिम) बनाम काली (दक्षिण); (4) तापमान — पश्चिम में महाद्वीपीय, दक्षिण-पूर्व में उपोष्ण; (5) स्थलाकृति — अरावली अवरोध प्रभाव; (6) सरकारी योजनाएँ — MSP, PM Fasal Bima, PMKSY।


प्रश्न 6 (10 अंक — 150 शब्द)

राजस्थान की कृषि को बदलने में सिंचाई की भूमिका की समीक्षात्मक जाँच कीजिए। राज्य में सिंचाई स्थायित्व की क्या चुनौतियाँ हैं?

मॉडल उत्तर: सिंचाई राजस्थान के कृषि विकास में सबसे परिवर्तनकारी कारक रही है, जिसने मरुस्थल और अर्ध-शुष्क भूमि के विशाल क्षेत्रों को उत्पादक कृषि भूमि में बदला है। तथापि वही सिंचाई प्रणालियाँ अब गहरी स्थायित्व चुनौतियों का सामना कर रही हैं।

सिंचाई की परिवर्तनकारी भूमिका:

IGNP (इंदिरा गांधी नहर परियोजना): 19.63 लाख हेक्टेयर कमान क्षेत्र के साथ, IGNP ने बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़ और जैसलमेर जिलों में कृषि में क्रांति की। इसने थार मरुस्थल की पूर्व बंजर भूमि में गेहूँ, कपास, मूंगफली और सरसों की खेती संभव की। गंगानगर प्रमुख गेहूँ, सिट्रस और कपास पट्टी बन गया है — "राजस्थान का अन्न भंडार" उपनाम से जाना जाता है।

चम्बल नहर प्रणाली: चम्बल (गांधी सागर और राणा प्रताप सागर बाँध) कोटा, बारां और सवाई माधोपुर जिलों को सिंचित करती है, जिससे हाड़ौती पट्टी में सोयाबीन, गेहूँ और सरसों की गहन खेती संभव हुई है।

बीसलपुर बाँध (बनास नदी, टोंक): यद्यपि यह मुख्यतः जयपुर, अजमेर और टोंक के लिए पेयजल परियोजना है, फिर भी यह पूर्वी राजस्थान को पूरक सिंचाई भी प्रदान करती है।

भूजल सिंचाई: पूर्वी और मध्य राजस्थान (जयपुर, अलवर, सीकर, नागौर) में नलकूप और खुले कुएँ सिंचित क्षेत्र के 60% से अधिक का योगदान करते हैं। इससे गहन सब्जी और सरसों की खेती संभव हुई है।

स्थायित्व चुनौतियाँ:

(1) भूजल क्षरण: राजस्थान के 295 भूजल ब्लॉकों में से 184 "अति-दोहित" हैं (CGWB 2023) — विशेषकर जयपुर, अजमेर, जोधपुर और नागौर में। गंभीर रूप से दबाव वाले ब्लॉकों में जलस्तर 0.3–2 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिर रहा है।

(2) जलभराव और द्वितीयक लवणीकरण: IGNP के रिसाव ने गंगानगर-हनुमानगढ़ में ~1.54 लाख हेक्टेयर को जलभराव से प्रभावित किया है। ₹3,200 करोड़ की HDPE नहर लाइनिंग परियोजना (2024-26) रिसाव को दूर करने का लक्ष्य रखती है, परन्तु मौजूदा लवणता क्षति को उलट नहीं सकती।

(3) नहर जल-बँटवारा विवाद: राजस्थान पंजाब (IGNP — रावी-व्यास जल) और MP/UP (चम्बल-यमुना जल) के साथ सिंचाई जल साझा करता है। अंतर्राज्यीय नदी विवाद (विशेष रूप से ERCP और माही आवंटन) राजनीतिक एवं परिचालन अनिश्चितता पैदा करते हैं।

(4) सिंचाई दक्षता: राजस्थान की बाढ़ सिंचाई दक्षता केवल 35–40% है। PM कृषि सिंचाई योजना सूक्ष्म-सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) को प्रोत्साहित करती है — राजस्थान शुष्क राज्यों में ड्रिप सिंचाई अपनाने में अग्रणी है — परन्तु यह संक्रमण धीमा है।

(5) जलवायु परिवर्तन: अनियमित मानसून नहर प्रवाह को प्रभावित करते हैं; बाँध भंडारण तेजी से अनिश्चित होता जा रहा है। 2023 में बीसलपुर बाँध का जलाशय 12% क्षमता पर आ गया, जिससे जयपुर में जल राशनिंग हुई।

नीति सिफारिशें: कम जल-गहन फसलों (बाजरा, दालें) की ओर फसल विविधीकरण, चेक डैम एवं खड़ीनों के माध्यम से जलभृत पुनर्भरण, सूक्ष्म-सिंचाई का विस्तार और बेहतर अंतर्राज्यीय जल शासन राजस्थान में टिकाऊ सिंचाई के लिए आवश्यक हैं।