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मृदा प्रकार: वर्गीकरण एवं वितरण
रेगिस्तानी मिट्टी राजस्थान की सबसे विस्तृत मृदा श्रेणी है, जो राज्य के 3.42 लाख किमी² क्षेत्रफल के लगभग 61% भाग में फैली है। ये मुख्यतः वायु-परिवहित बालू हैं जिन्हें ICAR द्वारा अपनाई गई USDA मृदा वर्गीकरण प्रणाली में Entisols और Aridisols के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
भौगोलिक विस्तार: जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर (पश्चिमी भाग), श्री गंगानगर, हनुमानगढ़, नागौर, पाली (पश्चिमी सीमाएँ), सीकर (पश्चिमी क्षेत्र), चूरू, झुंझुनूं (पश्चिमी हिस्से)।
विशेषताएँ:
- बनावट: मोटी बालू से दोमट बालू तक; मृत्तिका अंश कम (< 5–8%)
- रंग: हल्का पीला से बफ रंग
- कार्बनिक पदार्थ: अत्यंत कम (< 0.5% ह्यूमस)
- pH: 7.5–8.5 (क्षारीय से मध्यम क्षारीय)
- गहराई: अत्यधिक परिवर्तनशील — गहरे रेत के टीले से उथली पथरीली परत तक
- कैलिचे परत: कम शुष्क उप-प्रकारों में 30–60 सेमी गहराई पर कैल्शियम कार्बोनेट संचित होता है, जो जड़ों की पहुँच सीमित करता है
- जल-धारण क्षमता: बहुत कम; गंभीर सूखा-संवेदनशीलता
- सूक्ष्म पोषक तत्त्व: जस्ते (Zn), मैंगनीज (Mn) और कार्बनिक नाइट्रोजन में कमी
कृषि क्षमता: सिंचाई के बिना अनुपजाऊ। IGNP (इंदिरा गांधी नहर परियोजना) ने बीकानेर, जैसलमेर और हनुमानगढ़ में रेगिस्तानी मिट्टी के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को गेहूँ, कपास, सरसों और नींबू वर्गीय फलों की खेती के लिए उपयुक्त बनाया है। CAZRI का रेत टीला स्थिरीकरण कार्यक्रम घासों (Lasiurus sindicus — सेवन घास) और वृक्षों (Prosopis cineraria — खेजड़ी) का उपयोग करके सक्रिय टीलों पर पवन अपरदन को कम करता है।
3.2 जलोढ़ मिट्टी (Inceptisols / Entisols)
जलोढ़ मिट्टी नदी प्रणालियों द्वारा जमा की जाती है और राजस्थान के पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी मैदानों में फैली है — लगभग राज्य के 23% क्षेत्र में। ये राजस्थान की सबसे कृषि-उत्पादक मिट्टियाँ हैं।
भौगोलिक विस्तार: अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, टोंक, अजमेर (पूर्वी), जयपुर (पूर्वी), कोटा, बूंदी (नदी घाटियाँ), दौसा, सीकर (पूर्वी पट्टी)। प्रमुख नदी गलियारे: चंबल, बनास, गंभीर, बाणगंगा, पार्वती।
उप-प्रकार:
- खादर: नई जलोढ़ मिट्टी, वार्षिक बाढ़ द्वारा जमा; बारीक बनावट, उपजाऊ, अधिक नमी-धारण।
- बांगर: पुरानी जलोढ़ मिट्टी, ऊँचे इलाके, अच्छी जल-निकासी; खादर से थोड़ी कम उपजाऊ; प्रायः गहराई में कंकड़ (कैल्शियम कार्बोनेट की गाँठें) होती हैं।
विशेषताएँ:
- बनावट: बालुई दोमट से सिल्टी मृत्तिका दोमट
- कार्बनिक पदार्थ: मध्यम (0.5–1.5%) — रेगिस्तानी मिट्टी से अधिक
- pH: 7.0–8.0 (उदासीन से हल्का क्षारीय)
- पोषक तत्त्व: पोटेशियम में समृद्ध; नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी (उर्वरक आवश्यक)
- जल-धारण क्षमता: अच्छी से मध्यम
- गहराई: सामान्यतः गहरी (1–3 मी.)
कृषि महत्त्व: पूर्वी जलोढ़ क्षेत्र राजस्थान की प्रमुख रबी फसलें — गेहूँ, सरसों, धनिया — और खरीफ फसलें सोयाबीन और मक्का उगाता है। कोटा, बूंदी और सवाई माधोपुर जिलों में चंबल कमांड क्षेत्र (प्रमुख सिंचाई परियोजना) ~4.73 लाख हेक्टेयर जलोढ़ भूमि को सिंचित करता है। फसल-विशिष्ट आंकड़ों के लिए देखें विषय #87।
3.3 लाल मिट्टी (Alfisols / Ultisols)
लाल मिट्टी अपना विशिष्ट रंग फेरिक ऑक्साइड (Fe₂O₃) से प्राप्त करती है — जो प्री-कैम्ब्रियन नाइसिक और शिस्टोज चट्टानों के अपक्षय के दौरान निकलता है। यह राजस्थान के लगभग 3.5% क्षेत्र में पाई जाती है।
भौगोलिक विस्तार: डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले (प्राथमिक सांद्रण), दक्षिणी चित्तौड़गढ़, दक्षिणी राजसमंद, उदयपुर जिले के कुछ भाग — मूलतः मेवाड़-जनजातीय पट्टी का वागड़ क्षेत्र।
विशेषताएँ:
- बनावट: लोहमय कंकड़ युक्त बालुई दोमट; कंकड़ीला उप-सतह
- रंग: लाल से लालिमायुक्त भूरा; आर्द्र होने पर पीलापन
- कार्बनिक पदार्थ: कम से मध्यम
- pH: 6.0–7.5 (हल्का अम्लीय से उदासीन — राजस्थान की अधिकांश क्षारीय मिट्टियों से भिन्न)
- पोषक स्थिति: नाइट्रोजन, फास्फोरस, कैल्शियम और ह्यूमस की कमी; लोहे और एल्युमीनियम में अपेक्षाकृत समृद्ध
- गहराई: उथली से मध्यम; चट्टानी उप-स्तर सामान्य
कृषि चुनौतियाँ: पतली मृदा परत और कम जल-धारण क्षमता लाल मिट्टी को सूखा-संभावित बनाती है। डूंगरपुर और बांसवाड़ा में 800–1,000 मिमी वार्षिक वर्षा होती है (पर्याप्त नमी), लेकिन मिट्टी की कम जल-धारण क्षमता उत्पादकता सीमित करती है। जनजातीय समुदाय वर्षा-आधारित कृषि करते हैं — मक्का, मूँगफली और लघु मोटे अनाज। माही, सोम, जाखम नदियों से लघु सिंचाई आंशिक रूप से क्षतिपूर्ति करती है।
3.4 लैटेराइट मिट्टी (Oxisols / Ultisols)
लैटेराइट मिट्टी तीव्र उष्णकटिबंधीय अपक्षय परिस्थितियों में बनती है, जहाँ अधिक वर्षा और तापमान सिलिका निक्षालन कराते हैं, जिससे लोहे और एल्युमीनियम ऑक्साइड का सांद्रण शेष रह जाता है। ये राजस्थान की मिट्टियों का बहुत छोटा अनुपात (< 1%) बनाती हैं।
भौगोलिक विस्तार: दक्षिणी राजस्थान के अधिकतम वर्षा वाले सीमांत क्षेत्र — विशेष रूप से उदयपुर जिले की फुलवारी की नाल और सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य पट्टियाँ, सिरोही का आबू रोड क्षेत्र (माउंट आबू के निकट — 1,500 मिमी से अधिक वर्षा), और प्रतापगढ़ जिला।
विशेषताएँ:
- सूखने पर कठोर (कुछ क्षेत्रों में निर्माण सामग्री के रूप में उपयोग)
- कम सिलिका, अधिक लोहे और एल्युमीनियम ऑक्साइड
- पादप पोषक तत्त्वों में बहुत कम; अम्लीय pH (5.0–6.5)
- भारी संशोधन के बिना खाद्य फसलों के लिए अनुपयुक्त
आर्थिक टिप्पणी: लैटेराइट पत्थर ऐतिहासिक रूप से निर्माण में खनन किया जाता रहा है (जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक भवन)। मृदा उपयुक्तता मुख्यतः सागौन और मिश्रित पर्णपाती वन के लिए है, खाद्य फसलों के लिए नहीं।
3.5 काली मिट्टी (रेगुर) — (Vertisols)
काली मिट्टी, USDA/ICAR वर्गीकरण में Vertisols, दक्षिण-पूर्वी पठार क्षेत्र में राजस्थान की सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि मिट्टियों में से एक है। यह दक्कन ट्रैप बेसाल्ट से बनी है जो हाड़ौती पठार तक विस्तृत है।
भौगोलिक विस्तार: कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ जिले — "हाड़ौती क्षेत्र"; साथ ही दक्षिण-पूर्वी चित्तौड़गढ़ और सवाई माधोपुर के कुछ भाग। यह पट्टी दक्कन ज्वालामुखीयता के प्रभाव क्षेत्र के साथ मेल खाती है।
विशेषताएँ:
- बनावट: भारी मृत्तिका (मोंटमोरिलोनाइट खनिज); अत्यंत बारीक
- रंग: गहरा भूरा से काला (उच्च लोहा और मैग्नेशियम अंश)
- प्रमुख गुण: स्व-मल्चिंग — गीले होने पर फूलती और सूजती है; सूखने पर सिकुड़ती और दरकती है। दरारें कार्बनिक पदार्थ को समाहित करने में सहायक हैं।
- pH: 7.5–8.5 (उदासीन से हल्का क्षारीय)
- पोषक स्थिति: कैल्शियम, मैग्नेशियम और लोहे में समृद्ध; नाइट्रोजन, फास्फोरस और कार्बनिक पदार्थ की कमी
- जल-धारण क्षमता: बहुत अधिक; मानसून के बाद लंबे समय तक नमी बनाए रखती है — शुष्क-काल कृषि के लिए उपयुक्त
- गहराई: सामान्यतः गहरी (1–2 मी.), कभी-कभी पहाड़ी ढलानों पर उथली
कृषि महत्त्व: काली मिट्टी कोटा और बारां जिलों में राजस्थान का सोयाबीन क्षेत्र आधार है — राजस्थान भारत का तीसरा सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक है, जो लगभग पूरी तरह इसी क्षेत्र से आता है। कपास, सरसों, चना और ज्वार प्रमुख फसलें हैं। कोटा बैराज और चंबल कमांड क्षेत्र सिंचाई इस पहले से नमी-संरक्षी मिट्टी की उत्पादकता को और बढ़ाती है।
3.6 भूरी/वन मिट्टी (Inceptisols / Alfisols)
भूरी/वन मिट्टी अरावली श्रेणी और विंध्यन पठार सीमांत की ढलानों और कटकों पर प्राकृतिक वन आवरण के अंतर्गत विकसित होती है। ये एक छोटी लेकिन पारिस्थितिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मृदा श्रेणी है।
भौगोलिक विस्तार: अरावली पहाड़ी पट्टियाँ — सिरोही, पाली, राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, अजमेर (पुष्कर, तारागढ़), अलवर (सरिस्का वन) और कोटा-बारां का विंध्यन सीमांत।
विशेषताएँ:
- रंग: भूरा से लालिमायुक्त भूरा
- बनावट: बालुई दोमट से दोमट; ढलानों पर अच्छी जल-निकासी
- कार्बनिक पदार्थ: मध्यम से अधिक (वन आवरण में) — 1.5–3.0%
- pH: 6.5–7.5
- गहराई: उथली से मध्यम; चट्टानी उभार सामान्य
- पोषक तत्त्व: रेगिस्तानी/लाल मिट्टी से बेहतर नाइट्रोजन और ह्यूमस, किंतु उथली परत से सीमित
भूमि उपयोग: मुख्यतः आरक्षित और संरक्षित वनों के अंतर्गत (सरिस्का टाइगर रिजर्व, फुलवारी की नाल, कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य)। वन कटाई में सीमित कृषि होती है। अरावली वनीकरण कार्यक्रम (वन विभाग + MGNREGA अभिसरण) का उद्देश्य क्षतिग्रस्त अरावली ढलानों की बहाली और ऊपरी मृदा अपरदन रोकना है।
3.7 लवणीय-क्षारीय मिट्टी (Salids / Natrustalfs)
लवणीय-क्षारीय मिट्टी तब बनती है जब लवण (विशेषकर सोडियम क्लोराइड, सोडियम सल्फेट, सोडियम कार्बोनेट) जमा होते हैं: (a) प्राकृतिक आंतरिक अपवाह बेसिन (महाद्वीपीय खारी झीलें), या (b) अनुचित सिंचाई से मानवजनित द्वितीयक लवणीकरण।
भौगोलिक विस्तार:
- प्राकृतिक लवणीय मिट्टी: सांभर झील (जयपुर/नागौर), डीडवाना (नागौर), डेगाना (नागौर), पचपदरा (बाड़मेर), फलोदी (जोधपुर), लूणकरणसर (बीकानेर) — शेखावाटी-मारवाड़ अपवाह की आंतरिक खारी झील पट्टी।
- द्वितीयक लवणीय मिट्टी (IGNP-प्रेरित): उत्तरी राजस्थान — श्री गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर के कुछ भाग — जहाँ 1980 के दशक से भारी नहर सिंचाई और अपर्याप्त जल-निकासी ने जलस्तर ऊँचा किया है, जलभराव और द्वितीयक लवण संचय उत्पन्न हुआ है। IGNP कमांड क्षेत्र में लगभग 1.54 लाख हेक्टेयर पूर्व में उत्पादक भूमि प्रभावित है।
विशेषताएँ:
- विद्युत चालकता (EC): > 4 dS/m (लवणीय) और/या ESP > 15 (सोडिक/क्षारीय)
- pH: सोडिक मिट्टी में > 8.5 (सोडियम कार्बोनेट प्रमुख)
- सतह पर सफेद नमक की परत दृश्यमान
- पौधे: केवल लवण-सहिष्णु प्रजातियाँ (हैलोफाइट्स) प्राकृतिक रूप से उगती हैं — Tamarix, Salicornia, Suaeda
सुधार उपाय:
- सोडिक मिट्टी के लिए जिप्सम प्रयोग (CaSO₄) — सोडियम को कैल्शियम आयनों से प्रतिस्थापित करता है; राजस्थान भारत का सबसे बड़ा जिप्सम उत्पादक (बीकानेर/नागौर — देखें विषय #88)
- IGNP कमांड क्षेत्र में जलस्तर कम करने के लिए उप-सतह जल-निकासी टाइलें
- जड़ क्षेत्र के नीचे लवण बहाने के लिए अतिरिक्त सिंचाई जल से निक्षालन
- लवण-सहिष्णु किस्मों की खेती (करनाल गेहूँ किस्में, लवण-सहिष्णु धान किस्में)
