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समाज, प्रबंधन एवं लेखाशास्त्र

मुख्य बिंदु

GAAP, लेखांकन अवधारणाएँ एवं लेखांकन मानक

पेपर I · इकाई 3 अनुभाग 1 / 14 PYQ-शैली 23 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

मुख्य बिंदु

  1. लेखांकन को अमेरिकन अकाउंटिंग एसोसिएशन (AAA, 1966) ने "आर्थिक सूचनाओं की पहचान, मापन और संप्रेषण की प्रक्रिया" के रूप में परिभाषित किया है, ताकि उपयोगकर्ता सूचित निर्णय ले सकें। AICPA (अमेरिकी प्रमाणित सार्वजनिक लेखाकार संस्थान) इसे "मुद्रा के संदर्भ में लेन-देन को अभिलेखित, वर्गीकृत एवं सारांशित करने की कला" कहता है।

  2. GAAP (सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धांत) वित्तीय लेखांकन और रिपोर्टिंग के लिए मानक दिशा-निर्देश, नियमों और परंपराओं का ढाँचा है। GAAP में शामिल हैं: (a) लेखांकन अवधारणाएँ (व्यापक मान्यताएँ), (b) लेखांकन परंपराएँ (व्यावहारिक नियम), और (c) लेखांकन मानक (विशिष्ट तकनीकी मानक)। भारत में GAAP का संचालन ICAI (भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान) करता है, जिसकी स्थापना सनदी लेखाकार अधिनियम 1949 के अंतर्गत हुई।

  3. निरंतरता अवधारणा (सतत संस्था अवधारणा): यह मान्यता है कि व्यापार भविष्य में निरंतर चलता रहेगा — सामान्यतः कम से कम 12 माह। इससे स्थायी संपत्तियाँ लागत मूल्य पर दर्ज करना और उपयोगी आयु पर ह्रास फैलाना उचित ठहरता है। यदि निरंतरता संदिग्ध हो, तो संपत्तियाँ शुद्ध वसूली योग्य मूल्य पर रिपोर्ट की जानी चाहिए।

  4. उपार्जन अवधारणा / मिलान अवधारणा: राजस्व तब मान्यता प्राप्त होती है जब वह अर्जित हो (नकद प्राप्ति पर नहीं); व्यय तब मान्यता प्राप्त होता है जब वह उत्पन्न हो (भुगतान पर नहीं)। इससे एक ही लेखा-काल में राजस्व और व्यय का मिलान होता है। नकद-आधार लेखांकन केवल नकद लेन-देन पर आधारित होता है — सरल लेकिन बड़े संगठनों के लिए कम सटीक।

  5. संगति अवधारणा: एक अवधि से दूसरी अवधि तक एक ही लेखांकन विधियाँ अपनाई जानी चाहिए। विधि में परिवर्तन प्रकट किया जाना चाहिए तथा वित्तीय प्रभाव बताया जाना चाहिए। इससे वर्ष-दर-वर्ष तुलना संभव होती है। उदाहरण: यदि कोई फर्म वर्ष 1 में सीधी रेखा विधि (SLM) का उपयोग करती है, तो वर्ष 2 में भी SLM ही अपनाना होगा, जब तक उचित कारण सहित परिवर्तन प्रकट न हो।

  6. विवेकशीलता अवधारणा (विवेकशीलता/रूढ़िवाद अवधारणा): लेखाकार को सभी संभावित हानियाँ पहले से दर्ज करनी चाहिए, परंतु अनुमानित लाभ तब तक नहीं दर्ज करने चाहिए जब तक वे वास्तविक न हों। "कोई लाभ अग्रिम मत मानो; सभी हानियों का प्रावधान करो।" उदाहरण: किसी ऋण के वास्तव में डूबने से पहले ही संदिग्ध ऋण प्रावधान बनाना; ऐसी ख्याति दर्ज न करना जिसका भुगतान नहीं किया गया।

  7. व्यापार इकाई अवधारणा (व्यावसायिक इकाई अवधारणा): व्यापार को उसके स्वामी से अलग कानूनी और लेखांकन इकाई माना जाता है। स्वामी के व्यक्तिगत लेन-देन व्यापार की पुस्तकों में दर्ज नहीं होते। यह सिद्धांत दोहरा प्रविष्टि बहीखाता (दोहरी प्रविष्टि बहीखाता) का आधार है — स्वामी की पूँजी व्यापार की देनदारी (liability) होती है।

  8. दोहरा पहलू अवधारणा (द्वि-पक्षीय/दोहरी प्रविष्टि अवधारणा): प्रत्येक लेन-देन के दो पहलू होते हैं — डेबिट और क्रेडिट, जो समान राशि के होते हैं। मौलिक लेखांकन समीकरण: संपत्तियाँ = देनदारियाँ + स्वामी की पूँजी। दोहरी प्रविष्टि प्रणाली का श्रेय लुका पचिओली (इतालवी फ्रायर) को जाता है, जिन्होंने इसे 1494 में सुम्मा दे अरिथमेटिका में पहली बार वर्णित किया।

  9. भौतिकता अवधारणा: कोई मद भौतिक होती है यदि उसकी चूक या गलत विवरण वित्तीय विवरणों के उपयोगकर्ताओं के आर्थिक निर्णयों को प्रभावित कर सके। अभौतिक मदों को सरल बनाया जा सकता है। भौतिकता सीमा कोई निश्चित प्रतिशत नहीं है — यह व्यावसायिक निर्णय की बात है। ICAI और SEBI का मार्गदर्शन: सामान्यतः शुद्ध लाभ या कुल संपत्ति के 5-10% से अधिक की मदें भौतिक होती हैं।

  10. भारत में लेखांकन मानक: ICAI ने 32 भारतीय लेखांकन मानक (AS 1–AS 32) तैयार किए, जो गैर-सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होते हैं। सूचीबद्ध और बड़ी गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए भारत ने Ind AS (भारतीय लेखांकन मानक) अपनाए — जो IFRS (अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक) के साथ अभिसरित हैं — MCA (कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय) द्वारा सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अप्रैल 2016 से अनिवार्य।

  11. IFRS (अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक) जारी किए जाते हैं IASB (अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक बोर्ड) द्वारा, जिसकी स्थापना 2001 में लंदन में हुई। IFRS को 144 देशों ने अपनाया है (2024 तक)। US GAAP से मुख्य अंतर: IFRS सिद्धांत-आधारित (निर्णय-चालित) है, जबकि US GAAP नियम-आधारित (विस्तृत निर्देशात्मक नियम) है। भारत का Ind AS IFRS के साथ अभिसरित है (समान नहीं)।

  12. ह्रास: किसी मूर्त संपत्ति की लागत का उसके उपयोगी जीवन पर व्यवस्थित आवंटन। विधियाँ: (a) सीधी रेखा विधि (SLM) — प्रत्येक वर्ष समान राशि; (b) लिखित-घटित मूल्य (WDV)/घटती शेष विधि — पुस्तक मूल्य पर निश्चित % (घटता हुआ प्रभार); (c) उत्पादन इकाइयाँ विधि — वास्तविक उपयोग पर आधारित। Indian कंपनी अधिनियम 2013 (Schedule II) ह्रास गणना के लिए संपत्तियों की उपयोगी आयु निर्धारित करता है।