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समाज, प्रबंधन एवं लेखाशास्त्र

मुख्य बिंदु

कर्म, धर्म, पुरुषार्थ, आश्रम व्यवस्था

पेपर I · इकाई 3 अनुभाग 1 / 11 PYQ-शैली 26 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

मुख्य बिंदु

  1. कर्म — संस्कृत: "क्रिया, कार्य" — हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन में कारण-प्रभाव का सार्वभौमिक नियम है: प्रत्येक जानबूझकर की गई क्रिया एक संगत परिणाम उत्पन्न करती है जो इस जन्म या भविष्य के जन्मों में अनुभव को आकार देती है। भगवद्गीता (अध्याय 3) में भगवान कृष्ण निष्काम कर्म का उपदेश देते हैं — फल की आसक्ति के बिना कर्तव्य का पालन (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन — गीता 2.47)।

  2. धर्म संस्कृत के सबसे जटिल अवधारणाओं में से एक है — इसका अर्थ एक साथ धार्मिक कर्तव्य, नैतिक व्यवस्था, ब्रह्मांडीय नियम, सामाजिक आचरण और पोषण का सिद्धांत है। साधारण धर्म (सार्वभौमिक कर्तव्य: सत्य, अहिंसा, पवित्रता) बनाम वर्णाश्रम धर्म (अपने वर्ण और आश्रम अवस्था के अनुसार विशिष्ट कर्तव्य)।

  3. पुरुषार्थ — हिंदू दर्शन में मानव जीवन के चार लक्ष्य: (1) धर्म (धार्मिकता/कर्तव्य), (2) अर्थ (संपदा/भौतिक समृद्धि), (3) काम (इच्छा/प्रेम/सुख), (4) मोक्ष (मुक्ति/पुनर्जन्म-चक्र से मुक्ति)। ये एक श्रेणीबद्ध किंतु एकीकृत ढाँचा बनाते हैं जिसमें धर्म अर्थ और काम को नियंत्रित करता है; मोक्ष अंतिम लक्ष्य है।

  4. आश्रम व्यवस्था एक व्यक्ति के जीवन को चार आदर्श अवस्थाओं में विभाजित करती है: (1) ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी, 0–25 वर्ष) — अध्ययन और ब्रह्मचर्य; (2) गृहस्थ (गृहस्वामी, 25–50) — परिवार, आजीविका, सामाजिक कर्तव्य; (3) वानप्रस्थ (वन-गमन/सेवानिवृत्त, 50–75) — सक्रिय जीवन से क्रमिक विरक्ति; (4) संन्यास (त्याग, 75+) — मोक्ष के लिए पूर्ण विरक्ति।

  5. कर्म और सामाजिक सुधार: आधुनिक भारतीय सुधारकों ने कर्म की सृजनात्मक व्याख्या की। स्वामी विवेकानंद (1863–1902) ने कर्म योग की अवधारणा दी — मानवता की सेवा को ईश्वर की पूजा के रूप में (आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च)। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने जाति-असमानता के कर्मिक औचित्य को वैचारिक दमन के रूप में अस्वीकार किया; उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया (1956) जो जन्म-निर्धारित कर्म की बजाय स्वैच्छिक क्रिया पर बल देता है।

  6. निष्काम कर्म — गीता की सबसे प्रभावशाली नैतिक अवधारणा — यह मानती है कि व्यक्ति को कर्म करने का अधिकार है परंतु उसके फल पर नहीं। इस सिद्धांत ने महात्मा गाँधी के निस्वार्थ सेवा के दर्शन को और व्यक्तिगत लाभ के लिए हिंसा की अस्वीकृति को प्रभावित किया। गाँधी ने भगवद्गीता को अपनी "आध्यात्मिक संदर्भ पुस्तक" बताया।

  7. भारतीय संविधान में धर्म: अनुच्छेद 51A (मूल कर्तव्य, 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़े गए) में धर्म के अनुरूप कर्तव्य शामिल हैं — सत्य, सद्भाव, राष्ट्रीय एकता, पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, साझा विरासत की सुरक्षा। S.R. Bommai बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धर्मनिरपेक्षता (सभी धर्मों का सम्मान सहित) संविधान की मूलभूत विशेषता है।

  8. बौद्ध और जैन कर्म की अवधारणाएँ हिंदू कर्म से भिन्न हैं: बौद्ध धर्म — कर्म जानबूझकर की गई मानसिक क्रिया (चेतना) है, कर्मकांड नहीं; कोई स्थायी आत्मा नहीं (अनात्मन) — कर्म आत्मा के माध्यम से नहीं, चेतना-प्रवाह के माध्यम से प्रवाहित होता है। जैन धर्म — कर्म शाब्दिक रूप से सूक्ष्म पदार्थ (पुद्गल) है जो आत्मा से चिपकता है; मुक्ति के लिए तप (तपस्या) और अहिंसा द्वारा समस्त कर्म का नाश आवश्यक है।

  9. त्रिवर्ग और मोक्ष: मनुस्मृति और अर्थशास्त्र जैसे शास्त्रीय हिंदू ग्रंथ त्रिवर्ग — तीन प्रथम पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम) — को सांसारिक जीवन के क्रियात्मक लक्ष्य के रूप में मान्यता देते हैं। मोक्ष एक पारलौकिक चतुर्थ लक्ष्य के रूप में अलग है जो त्रिवर्ग को पार करता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र अर्थ को आधार के रूप में प्राथमिकता देता है क्योंकि भौतिक समृद्धि के बिना न धर्म न काम टिक सकता है — यह शुद्ध आध्यात्मिक व्याख्याओं से व्यावहारिक विचलन को दर्शाता है।

  10. वर्णाश्रम धर्म और सामाजिक व्यवस्था: वर्ण-आश्रम ढाँचे ने जाति-कर्तव्य को जीवन-अवस्था कर्तव्य के साथ मिलाकर एक व्यापक सामाजिक संगठन बनाया। वर्ण धर्म ने विशिष्ट व्यावसायिक कर्तव्य निर्धारित किए (ब्राह्मण — अध्ययन/शिक्षण, क्षत्रिय — रक्षा, वैश्य — व्यापार, शूद्र — सेवा)। बी.आर. अम्बेडकर और फुले सहित आलोचकों ने तर्क दिया कि वर्णाश्रम धर्म ने जाति-श्रेणी को तर्कसंगत बनाया और शूद्रों तथा अस्पृश्यों को आध्यात्मिक ज्ञान व आर्थिक संसाधनों से वंचित किया।

  11. संन्यास आश्रम और आधुनिक प्रासंगिकता: संन्यास अवस्था (पूर्ण विरक्ति) के आधुनिक समानांतर सक्रिय वृद्धावस्था की अवधारणा में हैं — जहाँ वृद्धजन निष्क्रिय विरक्ति की बजाय परामर्श, स्वैच्छिक सेवा और ज्ञान-साझाकरण के माध्यम से समाज में योगदान देते हैं। रामकृष्ण मिशन और चिन्मय मिशन जैसे संगठन सामाजिक सेवा के लिए संन्यास आदर्श को संस्थागत रूप देते हैं। भारत की राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक नीति (2011) यह विचार प्रतिबिंबित करती है कि वृद्ध व्यक्ति बोझ नहीं, एक संसाधन हैं।

  12. कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग — मोक्ष के तीन मार्ग: भगवद्गीता तीन मुख्य मार्गों की रूपरेखा देती है: (1) कर्म योग (क्रिया का मार्ग — निस्वार्थ कार्य को पूजा के रूप में), (2) भक्ति योग (भक्ति का मार्ग — ईश्वर के प्रति समर्पण), (3) ज्ञान योग (ज्ञान का मार्ग — वास्तविक और अवास्तविक के बीच विवेक)। स्वामी विवेकानंद ने राज योग (ध्यान का मार्ग) जोड़ा जिससे चार मार्ग बने। सभी चार मार्ग मोक्ष पर मिलते हैं — परम पुरुषार्थ।