मुख्य बिंदु

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    कर्म — संस्कृत में "क्रिया, कार्य" — हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन में कारण-प्रभाव का सार्वभौमिक नियम: प्रत्येक सोचे-समझे कार्य का परिणाम इस या अगले जन्म में मिलता है। भगवद्गीता (अध्याय 3) में निष्काम कर्म — फल की आकांक्षा रहित कर्म (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन — गीता 2.47)।

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    धर्म सबसे जटिल संस्कृत अवधारणाओं में से एक है — इसका अर्थ एक साथ धर्म, नैतिक कर्तव्य, ब्रह्मांडीय नियम, सामाजिक आचरण और धारण करने वाला सिद्धांत है। सामान्य धर्म (सार्वभौमिक कर्तव्य: सत्य, अहिंसा, शुद्धता) बनाम वर्णाश्रम धर्म (वर्ण और आश्रम के अनुसार विशिष्ट कर्तव्य)।

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    पुरुषार्थ — हिंदू दर्शन में मानव जीवन के चार लक्ष्य: (1) धर्म (नैतिक कर्तव्य), (2) अर्थ (भौतिक समृद्धि), (3) काम (इच्छा/आनंद), (4) मोक्ष (मुक्ति)। ये एकीकृत ढाँचा बनाते हैं — धर्म, अर्थ और काम को नियंत्रित करता है; मोक्ष अंतिम लक्ष्य है।

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    आश्रम व्यवस्था जीवन को चार आदर्श चरणों में बाँटती है: (1) ब्रह्मचर्य (0–25 वर्ष) — अध्ययन और ब्रह्मचर्य; (2) गृहस्थ (25–50) — परिवार, उपार्जन, सामाजिक कर्तव्य; (3) वानप्रस्थ (50–75) — सक्रिय जीवन से क्रमिक निवृत्ति; (4) संन्यास (75+) — मोक्ष के लिए पूर्ण त्याग।

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    कर्म और सामाजिक सुधार: स्वामी विवेकानंद (1863–1902) ने कर्म योग — ईश्वर की पूजा के रूप में मानव सेवा — की अवधारणा दी। अंबेडकर ने जाति असमानता के कार्मिक औचित्य को वैचारिक उत्पीड़न मानकर अस्वीकार किया; 1956 में बौद्ध धर्म ग्रहण किया जो इच्छाशक्ति-आधारित कर्म पर बल देता है।

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    निष्काम कर्म — गीता का सर्वाधिक प्रभावशाली नैतिक सिद्धांत — कर्म का अधिकार है, फल का नहीं। इस सिद्धांत ने महात्मा गांधी के निःस्वार्थ सेवा दर्शन और हिंसा की अस्वीकृति को प्रेरित किया। गांधी ने भगवद्गीता को अपनी "आध्यात्मिक संदर्भ पुस्तक" कहा।

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    भारतीय संविधान में धर्म: अनुच्छेद 51A (मूल कर्तव्य, 42वाँ संशोधन 1976) में धर्म से संरेखित कर्तव्य शामिल हैं — सत्य, सद्भाव, राष्ट्रीय अखंडता, पर्यावरण संरक्षण। SC ने S.R. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल विशेषता माना।

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    बौद्ध और जैन कर्म अवधारणा: बौद्ध — कर्म है सोची-समझी मानसिक क्रिया (चेतना); कोई स्थायी आत्मा नहीं (अनात्मन)। जैन — कर्म सूक्ष्म पदार्थ (पुद्गल) है जो आत्मा से चिपकता है; तपस् और अहिंसा से मुक्ति।

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    त्रिवर्ग और मोक्ष: मनुस्मृति और अर्थशास्त्र प्रथम तीन पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम) को त्रिवर्ग कहते हैं — सांसारिक जीवन के कार्यात्मक लक्ष्य। मोक्ष इन सबसे परे, पारलौकिक चतुर्थ लक्ष्य है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अर्थ को आधार माना गया — बिना भौतिक समृद्धि के धर्म और काम टिक नहीं सकते।

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    वर्णाश्रम धर्म और सामाजिक व्यवस्था: वर्ण-आश्रम ढाँचे ने जाति-कर्तव्य और जीवन-चरण कर्तव्य को मिलाकर व्यापक सामाजिक संगठन बनाया। वर्ण धर्म विशिष्ट व्यावसायिक कर्तव्य तय करता था। अंबेडकर और फुले जैसे आलोचकों ने कहा कि वर्णाश्रम धर्म ने जाति पदानुक्रम को तर्कसंगत ठहराया और शूद्रों/अछूतों को आध्यात्मिक ज्ञान एवं आर्थिक संसाधनों से वंचित किया।

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    संन्यास आश्रम और आधुनिक प्रासंगिकता: संन्यास चरण (पूर्ण त्याग) का आधुनिक समानांतर सक्रिय वृद्धावस्था की अवधारणा में दिखता है — जहाँ वृद्ध लोग निष्क्रिय सेवानिवृत्ति के बजाय परामर्श, स्वयंसेवा और ज्ञान-साझाकरण से समाज में योगदान करते हैं। रामकृष्ण मिशन और चिन्मय मिशन संन्यास आदर्श को सामाजिक सेवा में संस्थागत रूप देते हैं।

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    कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग — मोक्ष के तीन मार्ग: भगवद्गीता तीन मुख्य मार्ग बताती है: (1) कर्म योग (निःस्वार्थ कर्म), (2) भक्ति योग (ईश्वर के प्रति समर्पण), (3) ज्ञान योग (सत्य-असत्य का विवेक)। स्वामी विवेकानंद ने राज योग (ध्यान मार्ग) जोड़ा। चारों मार्ग मोक्ष — परम पुरुषार्थ — पर मिलते हैं।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M निष्काम कर्म क्या है? भारतीय दर्शन में इसका क्या महत्त्व है? 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

निष्काम कर्म (गीता 2.47) — "कर्म करने का अधिकार है, फल का नहीं।" कर्तव्य बिना फल की आकांक्षा के करना। महत्त्व: (1) परिणाम की चिंता से मुक्ति; (2) निःस्वार्थ सेवा; (3) गांधी के राजनीतिक दर्शन — व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा रहित स्वतंत्रता संघर्ष; (4) आधुनिक प्रबंधन में सेवक-नेतृत्व का आधार।**

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