मुख्य बिंदु

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    राजस्थान के पाँच प्रमुख लोक देवता (पंचपीर): पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी और हरभूजी — इनकी पूजा फड़ चित्रकला के माध्यम से भोपा-भोपी द्वारा की जाती है।

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    बाबा रामदेव (जन्म लगभग 1405 ई., रुणीचा/रामदेवरा, जैसलमेर) एकमात्र लोक देवता हैं जिन्हें हिंदू और मुसलमान दोनों "रामसा पीर" के रूप में पूजते हैं; रामदेवरा का वार्षिक मेला भाद्रपद शुक्ल 2–11 को लगता है और लगभग 5 लाख श्रद्धालु आते हैं।

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    दादू दयाल (1544–1603 ई.) दादू पंथ के संस्थापक थे; अहमदाबाद में जन्म, राजस्थान के नाराणा (नागौर) में स्थापना; 'दादू वाणी' में ~5,000 पद हैं।

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    राजस्थान में निर्गुण भक्ति: दादू पंथ, रज्जब शाखा, सुंदरदास परंपरा — तीनों मूर्तिपूजा, जातिवाद और कर्मकांड को अस्वीकार करते थे।

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    मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.), मेड़ता (नागौर) की राजकुमारी, कृष्ण-भक्त — राजस्थान की प्रमुख सगुण भक्त संत; ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती में ~1,300 भजनों की रचना।

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    ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1141–1236 ई.) ने लगभग 1193 ई. में अजमेर में चिश्ती सिलसिले की स्थापना की; ख्वाजा का उर्स (रजब 1–6) में ~1.5 लाख श्रद्धालु आते हैं।

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    षड्दर्शन: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत — सभी वेद-प्रामाण्य स्वीकार करते हैं; प्रस्थानत्रयी = उपनिषद् + भगवद्गीता + ब्रह्मसूत्र।

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    राजस्थान में जैन धर्म: दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू, 11वीं–13वीं शताब्दी) और रणकपुर मंदिर (पाली, 15वीं शताब्दी) प्रमुख तीर्थ स्थल; राजस्थान में जैनों की सर्वाधिक जनसंख्या (~1.2%)।

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    चरणदासी पंथ के संस्थापक चरण दास (1703–1782 ई., देहरा, अलवर); दो प्रमुख महिला संत — सहजो बाई और दया बाई — ने हिंदी में भक्ति साहित्य रचा।

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    करणी माता, देशनोक (बीकानेर) — चारण जाति की देवी; मंदिर में पवित्र चूहे (काबा) प्रसिद्ध; राव बीका (1488 ई.) और बीकानेर राजपरिवार से संबद्ध।

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    गोगाजी (लगभग 900 ई., दाद्रेवा, चुरू) — नागदेवता; हिंदू और मुसलमान दोनों "ज़ाहिर पीर" के रूप में पूजते हैं; गोगामेड़ी मेला (भाद्रपद शुक्ल 9), हनुमानगढ़।

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    सुहरावर्दी सिलसिले की स्थापना शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1145–1234 ई.) ने की; राजस्थान में हामिदुद्दीन नागोरी (1192–1274 ई.) प्रमुख सुहरावर्दी संत थे।

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    तेजाजी (लगभग 928–960 ई., नागौर) — पशुधन एवं नागदेवता; जाट समाज के आराध्य; परबतसर मेला (नागौर) और बाँसड़ा (अजमेर) में पूजित।

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    पाबूजी (लगभग 1239–1276 ई., कोलू, फलौदी) — ऊँट देवता; रेबारी और नायक समाज के आराध्य; 'पाबूजी री फड़' (15 मीटर लंबी) भोपा द्वारा रात्रि जागरण में प्रस्तुत।

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    राम नवमी 2026 के राष्ट्रीय उत्सवों में राजस्थान के गोविंद देव जी (जयपुर), श्रीनाथजी (नाथद्वारा) और पुष्कर जैसे मंदिरों की भागीदारी ने समकालीन राजस्थान में सगुण वैष्णव भक्ति और शासन-संस्कृति के संबंध को दर्शाया।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M भारतीय परम्परा में 'ऋण' की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

भारतीय परम्परा में ऋण का तात्पर्य उन सहज दायित्वों से है जो प्रत्येक मनुष्य देवताओं, ऋषियों और पितरों के प्रति लेकर जन्म लेता है। तीन प्रमुख ऋण हैं: देव ऋण (यज्ञ से), ऋषि ऋण (स्वाध्याय और अध्यापन से) और पितृ ऋण (श्राद्ध/पिंडदान से)। कुछ ग्रंथ चौथा — मनुष्य ऋण — भी मानते हैं जो अतिथि-सत्कार से चुकाया जाता है।

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