3. राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्थाएँ तथा उनके बदलते स्वरूप — पूर्ण नोट्स
Revenue and Administrative Systems, Changing Patternsपूरा पढ़ने के लिए मुफ़्त में साइन अप करें
सभी अनुभाग, संभावित प्रश्न और त्वरित पुनरावृत्ति तालिका पाएं।
मूल मुख्य बिंदु
- 1
राजपूत-काल के राजस्थान में त्रिस्तरीय भूमि व्यवस्था थी
- जागीर — सैनिक सेवा के बदले सामंतों को दी गई भूमि
- खालसा — राज्य की सीधी प्रशासित भूमि
- भोम — भोमिया राजपूतों की वंशानुगत ग्राम भूमि
- 2
मारवाड़ में रेख राजस्व आकलन की मानक इकाई थी
- प्रत्येक गाँव की एक निश्चित रेख निर्धारित होती थी
- हासिल वास्तव में वसूला गया राजस्व था
- दोनों के बीच का अंतर प्रशासनिक दक्षता का माप था
- 3
अकबर की दहसाला व्यवस्था (1580 ई.) — 10 वर्षों की औसत उपज
- राजपूताना में मुगल अधीनता वाले राज्यों में अपनाई गई
- जब्त (फसल माप) पूर्वी राजस्थान में लागू हुई
- टोडरमल ने इसे अजमेर सूबे में लागू किया
- 4
जागीरदारों द्वारा निम्न जातियों और आदिवासियों से बिना पारिश्रमिक के ली जाने वाली श्रम सेवा
- खेती, ढुलाई और घरेलू काम सभी में जबरी श्रम
- राजस्थान की सामंती व्यवस्था की सर्वाधिक शोषणकारी विशेषता
- बिजोलिया, बेगूँ और एकी आंदोलनों का प्रत्यक्ष कारण
- 5
राजपूत राज्य में पाँच-स्तरीय प्रशासनिक पदानुक्रम
- दीवान → फौजदार → हाकिम → पटवारी → चौधरी
- प्रत्येक स्तर अपने से ऊपर वाले को जवाबदेह था
- ग्राम-स्तर तक कर वसूली और प्रशासन सुनिश्चित होता था
- 6
कर्नल जेम्स टॉड की 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' (1829, 1832)
- राजपूत राजस्व रीतियों और जागीरदारी का प्रथम व्यवस्थित दस्तावेज
- टॉड पश्चिमी राजपूताना के राजनीतिक एजेंट थे (1818–22)
- RPSC परीक्षाओं के लिए अनिवार्य प्राथमिक स्रोत
- 7
ब्रिटिश प्रभुसत्ता ने 1870 के दशक से राजपूताना में बंदोबस्त कार्य प्रारंभ किए
- रीति-आधारित आकलन की जगह लिखित सर्वेक्षण लाए
- मारवाड़ का प्रथम नियमित बंदोबस्त ए.पी. निकलसन (1891–95) ने किया
- ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की पद्धति पर आधारित
- 8
कोटवाल राजपूत-कालीन राजधानियों और बाजार कस्बों का नगर प्रशासक
- पुलिसिंग और नाप-तौल नियमन का प्रभारी
- हाट में बाज़ार कर वसूल करता था
- फौजदार का नगरीय समकक्ष
- 9
राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 ने 16,000 से अधिक जागीरें समाप्त कीं
- किसानों को काश्तकारी अधिकार दिए गए — राज्य के प्रत्यक्ष अधीन
- राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 ने सभी क्षेत्रों में एकसमान ढाँचा बनाया
- मारवाड़ राजस्व एवं काश्तकारी अधिनियम, 1949 इसका पूर्ववर्ती था
- 10
नजराना — नए जागीरदार द्वारा राज्य को एकमुश्त भुगतान
- भेंट — त्योहारों पर अनिवार्य उपहार जागीरदारों और प्रजा से
- ये औपचारिक राजस्व व्यवस्था से परे अर्ध-राजकोषीय वसूली थी
- शुद्ध मुगल शैली के राजस्व संग्रह से राजपूत व्यवस्था को अलग करती थीं
- 11
टोडरमल ने अजमेर सूबे में जब्त/दहसाला व्यवस्था लागू की
- भूमि को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया
- पोलज (वार्षिक जुती), परौती (आंशिक परती)
- चाचर (तीन वर्ष परती), बंजर (बंजर भूमि)
- 12
मेवाड़ में पाइक व्यवस्था — वंशानुगत ग्राम रक्षा और प्रशासनिक कर्तव्य
- निम्न श्रेणी के सामुदायिक सदस्यों को सौंपा गया
- छोटे भूमि अनुदान सेवा के बदले दिए जाते थे
- जागीर सिद्धांत का ग्राम-स्तरीय सूक्ष्म रूप
- 13
मार्च 2026 में राजस्थान सरकार ने दो ऐतिहासिक प्रशासनिक नगरों का नामांतरण किया
- कामान (भरतपुर) का नया नाम कामवन
- जहाजपुर (भीलवाड़ा) का नया नाम यज्ञपुर
- अभिलेखागार प्रमाण से मान्य मध्यकालीन प्रशासनिक स्थान-नामों की पुनर्स्थापना
संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M राजपूताना की त्रिस्तरीय भूमि वर्गीकरण व्यवस्था (जागीर, खालसा, भोम) की व्याख्या कीजिए।
आदर्श उत्तर
राजपूत-काल के राजस्थान में भूमि तीन श्रेणियों में विभाजित थी: जागीर — सैनिक सेवा के बदले सामंतों को दी जाने वाली भूमि; खालसा — राज्य की सीधे प्रशासित भूमि जिससे शासक को राजस्व मिलता था; और भोम — भोमिया राजपूतों की वंशानुगत ग्राम भूमि जिस पर रीति-सम्मत काश्तकारी अधिकार था। यह त्रिस्तरीय व्यवस्था 1952 के जागीरदारी उन्मूलन तक सामंती राजनीतिक अर्थव्यवस्था का आधार रही।
~50 words • 5 marks
