मुख्य बिंदु

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    राजपूत-काल के राजस्थान में त्रिस्तरीय भूमि व्यवस्था थी

    • जागीर — सैनिक सेवा के बदले सामंतों को दी गई भूमि
    • खालसा — राज्य की सीधी प्रशासित भूमि
    • भोम — भोमिया राजपूतों की वंशानुगत ग्राम भूमि
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    मारवाड़ में रेख राजस्व आकलन की मानक इकाई थी

    • प्रत्येक गाँव की एक निश्चित रेख निर्धारित होती थी
    • हासिल वास्तव में वसूला गया राजस्व था
    • दोनों के बीच का अंतर प्रशासनिक दक्षता का माप था
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    अकबर की दहसाला व्यवस्था (1580 ई.) — 10 वर्षों की औसत उपज

    • राजपूताना में मुगल अधीनता वाले राज्यों में अपनाई गई
    • जब्त (फसल माप) पूर्वी राजस्थान में लागू हुई
    • टोडरमल ने इसे अजमेर सूबे में लागू किया
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    जागीरदारों द्वारा निम्न जातियों और आदिवासियों से बिना पारिश्रमिक के ली जाने वाली श्रम सेवा

    • खेती, ढुलाई और घरेलू काम सभी में जबरी श्रम
    • राजस्थान की सामंती व्यवस्था की सर्वाधिक शोषणकारी विशेषता
    • बिजोलिया, बेगूँ और एकी आंदोलनों का प्रत्यक्ष कारण
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    राजपूत राज्य में पाँच-स्तरीय प्रशासनिक पदानुक्रम

    • दीवान → फौजदार → हाकिम → पटवारी → चौधरी
    • प्रत्येक स्तर अपने से ऊपर वाले को जवाबदेह था
    • ग्राम-स्तर तक कर वसूली और प्रशासन सुनिश्चित होता था
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    कर्नल जेम्स टॉड की 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' (1829, 1832)

    • राजपूत राजस्व रीतियों और जागीरदारी का प्रथम व्यवस्थित दस्तावेज
    • टॉड पश्चिमी राजपूताना के राजनीतिक एजेंट थे (1818–22)
    • RPSC परीक्षाओं के लिए अनिवार्य प्राथमिक स्रोत
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    ब्रिटिश प्रभुसत्ता ने 1870 के दशक से राजपूताना में बंदोबस्त कार्य प्रारंभ किए

    • रीति-आधारित आकलन की जगह लिखित सर्वेक्षण लाए
    • मारवाड़ का प्रथम नियमित बंदोबस्त ए.पी. निकलसन (1891–95) ने किया
    • ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की पद्धति पर आधारित
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    कोटवाल राजपूत-कालीन राजधानियों और बाजार कस्बों का नगर प्रशासक

    • पुलिसिंग और नाप-तौल नियमन का प्रभारी
    • हाट में बाज़ार कर वसूल करता था
    • फौजदार का नगरीय समकक्ष
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    राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 ने 16,000 से अधिक जागीरें समाप्त कीं

    • किसानों को काश्तकारी अधिकार दिए गए — राज्य के प्रत्यक्ष अधीन
    • राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 ने सभी क्षेत्रों में एकसमान ढाँचा बनाया
    • मारवाड़ राजस्व एवं काश्तकारी अधिनियम, 1949 इसका पूर्ववर्ती था
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    नजराना — नए जागीरदार द्वारा राज्य को एकमुश्त भुगतान

    • भेंट — त्योहारों पर अनिवार्य उपहार जागीरदारों और प्रजा से
    • ये औपचारिक राजस्व व्यवस्था से परे अर्ध-राजकोषीय वसूली थी
    • शुद्ध मुगल शैली के राजस्व संग्रह से राजपूत व्यवस्था को अलग करती थीं
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    टोडरमल ने अजमेर सूबे में जब्त/दहसाला व्यवस्था लागू की

    • भूमि को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया
    • पोलज (वार्षिक जुती), परौती (आंशिक परती)
    • चाचर (तीन वर्ष परती), बंजर (बंजर भूमि)
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    मेवाड़ में पाइक व्यवस्था — वंशानुगत ग्राम रक्षा और प्रशासनिक कर्तव्य

    • निम्न श्रेणी के सामुदायिक सदस्यों को सौंपा गया
    • छोटे भूमि अनुदान सेवा के बदले दिए जाते थे
    • जागीर सिद्धांत का ग्राम-स्तरीय सूक्ष्म रूप
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    मार्च 2026 में राजस्थान सरकार ने दो ऐतिहासिक प्रशासनिक नगरों का नामांतरण किया

    • कामान (भरतपुर) का नया नाम कामवन
    • जहाजपुर (भीलवाड़ा) का नया नाम यज्ञपुर
    • अभिलेखागार प्रमाण से मान्य मध्यकालीन प्रशासनिक स्थान-नामों की पुनर्स्थापना

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M राजपूताना की त्रिस्तरीय भूमि वर्गीकरण व्यवस्था (जागीर, खालसा, भोम) की व्याख्या कीजिए। 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

राजपूत-काल के राजस्थान में भूमि तीन श्रेणियों में विभाजित थी: जागीर — सैनिक सेवा के बदले सामंतों को दी जाने वाली भूमि; खालसा — राज्य की सीधे प्रशासित भूमि जिससे शासक को राजस्व मिलता था; और भोम — भोमिया राजपूतों की वंशानुगत ग्राम भूमि जिस पर रीति-सम्मत काश्तकारी अधिकार था। यह त्रिस्तरीय व्यवस्था 1952 के जागीरदारी उन्मूलन तक सामंती राजनीतिक अर्थव्यवस्था का आधार रही।

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