मुख्य बिंदु

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    विश्व भू-आकृति को प्रक्रिया से पढ़ना बेहतर है: वलन, भ्रंशन, ज्वालामुखीयता, नदी निक्षेप, पवन अपरदन और शुष्कता।

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    हिमालय, एंडीज और आल्प्स जैसे युवा वलित पर्वत ऊँचे, अस्थिर और प्लेट अभिसरण से जुड़े हैं।

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    अरावली जैसे पुराने वलित और अवशिष्ट पर्वत राजस्थान के विद्यार्थी को युवा वलित तंत्र से स्थानीय तुलना देते हैं।

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    पठार विवर्तनिक, ज्वालामुखीय या विच्छेदित हो सकते हैं; तिब्बती पठार, दक्कन और हाड़ौती-मालवा किनारा तीन उपयोगी रूप देते हैं।

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    मैदान केवल समतल भूमि नहीं हैं; जलोढ़ मैदान, अंतर्देशीय प्रेयरी और डेल्टा क्षेत्र स्रोत तथा निकास से अलग होते हैं।

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    मरुस्थलों को उष्ण, शीत, तटीय वर्षाछाया और महाद्वीपीय प्रकारों में अलग करना जरूरी है।

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    आरएएस पुराने प्रश्नों में पर्वत-शिखर, मरुस्थल, महाद्वीप और भू-आकृति-देश जोड़े बार-बार मिलते हैं।

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    राजस्थान का संबंध सीधा है: थार, अरावली, लूणी, बीकानेर-जैसलमेर टीले और हाड़ौती पठार विश्व उदाहरणों को स्थानीय बनाते हैं।

स्थलरूप परिवार और प्रक्रिया

पर्वत, पठार, मैदान और मरुस्थल चार स्थलरूप परिवार हैं, पर ये अलग-अलग सूचियाँ नहीं हैं। पर्वत प्रायः प्लेट-सीमा या पुराने कमजोर भू-पट्टी में उत्थान को दिखाता है। पठार चौड़ा और ऊँचा धरातल है, जिसके किनारे तीखे या भीतर गहरी कटान हो सकती है। मैदान कम ढाल वाला धरातल है, जो निक्षेपण या लंबे अपरदन से बनता है। मरुस्थल को रेत से नहीं, शुष्कता से पहचाना जाता है।

एनसीईआरटी की भू-आकृति पद्धति प्रक्रिया-संबंध को साफ रखती है। अंतर्जनित बल धरातल को उठाते या तोड़ते हैं। नदियाँ, पवन, हिम और अपक्षय फिर उसी सतह को नया रूप देते हैं। राजस्थान स्थानीय जाँच का उदाहरण देता है। अरावली पुरानी प्रतिरोधी शृंखला है। हाड़ौती-मालवा किनारा विच्छेदित पठारी सीमा जैसा व्यवहार करता है। लूणी बेसिन अंतर्देशीय निकास दिखाता है। थार में शुष्कता टीलों, टीलों के बीच मैदानों और लवणीय अवसादों का रूप लेती है।

इस अध्याय में विश्व उदाहरणों से स्थलरूपों का वर्गीकरण किया जाता है और फिर उन्हें राजस्थान से जोड़ा जाता है। आरएएस मानचित्र प्रश्न रेगिस्तान-देश, शिखर-देश या मैदान-फसल जोड़ी पूछ सकता है। सही उत्तर के लिए पहले प्रक्रिया समझनी पड़ती है। तटीय पर्वत-श्रेणी के पीछे बना वर्षाछाया मरुस्थल, ऊँचे पठार के पीछे बने आंतरिक शीत मरुस्थल जैसा नहीं होता। काली मिट्टी वाला ज्वालामुखीय पठार, नई नदी-निक्षेप वाली जलोढ़ भूमि से अलग है।

स्थलाकृति मानव उपयोग भी तय करती है। पर्वतीय पट्टियाँ दर्रों, हिम-पोषित अपवाह, वन-पट्टियों और जोखिमों से जुड़ती हैं। पठार खनिज-पट्टियों, लावा मिट्टी, सपाट उच्चभूमि और जलप्रपातों से पहचाने जाते हैं। मैदान घनी कृषि और परिवहन को सहारा देते हैं। मरुस्थल पशुपालन, नमक, पवन ऊर्जा, सूखा-अनुकूलन और बिखरी नखलिस्तान या नहर बस्तियों से जुड़े होते हैं। राजस्थान में यह क्रम अरावली जल-विभाजक से चंबल-हाड़ौती पठार तक, बनास जलोढ़ से थार टीला-क्षेत्र तक दिखाई देता है। इसलिए ढाल, अपवाह, शैल-प्रकार और जलवायु को साथ पढ़ना जरूरी है। प्रक्रिया स्पष्ट होते ही सहारा, गोबी, दक्कन, ग्रेट प्लेन्स और अरावली जैसे नाम ढीले एटलस-लेबल नहीं रहते। वे तुलनात्मक भूगोल के व्यवस्थित उदाहरण बन जाते हैं।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 1M भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की महाद्वीपीय टक्कर से बने ऊँचे सक्रिय पट्टे को कौन सा स्थलरूप तंत्र सबसे ठीक दिखाता है? 1 अंक · 0 शब्द

आदर्श उत्तर

हिमालय सही है क्योंकि यह भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर से उठा सक्रिय युवा वलित पट्टा है। अरावली पुरानी कटी शृंखला है, दक्कन ज्वालामुखीय पठार है और ग्रेट प्लेन्स निक्षेपित अंतर्देशीय मैदान हैं।