मूल प्राकृतिक वनस्पति के नियंत्रण: जलवायु, मिट्टी और स्थलरूप
प्राकृतिक वनस्पति वह पौधा आवरण है जो नियोजित खेती के बिना उगता है, पर यह बेतरतीब आवरण नहीं होता। तापमान बढ़वार-ऋतु की लंबाई तय करता है। वर्षा जल उपलब्धता नियंत्रित करती है। मिट्टी जड़ों और पोषक तत्वों का आधार बनती है। स्थलरूप तापमान और जल-निकास दोनों बदलता है, जबकि मानव या पशु दबाव मूल वनस्पति को द्वितीयक झाड़ी या घासभूमि में बदल सकता है। इसी कारण समान अक्षांश पर भी समान वनस्पति नहीं मिलती। पवनमुखी ढाल, नदी घाटी, रेतीला मरुस्थल और ऊंचा पठार नमी-संतुलन को अलग-अलग बना देते हैं। अमेजन-कांगो का भूमध्यरेखीय वर्षावन साल भर की गर्मी और भारी वर्षा में पनपता है, जबकि सहारा की मरुद्भिद वनस्पति दुर्लभ वर्षा और अधिक वाष्पीकरण में जीवित रहती है। इनके बीच मानसूनी उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, अफ्रीकी सवाना घासभूमि, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के समशीतोष्ण पर्णपाती वन, प्रेयरी-पम्पास-स्टेपी-वेल्ड समशीतोष्ण घासभूमियां, टाइगा शंकुधारी वन और आर्कटिक टुंड्रा की काई-लाइकेन वनस्पति आती है। राजस्थान स्थानीय दृष्टि देता है। जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर की थार कांटेदार झाड़ी वनस्पति वैश्विक मरुद्भिद वनस्पति का भारतीय मरुस्थलीय रूप है। सिरोही से उदयपुर तक अरावली ढालें सूखे पर्णपाती टुकड़ों से पहाड़ी झाड़ी तक कम दूरी में बदलाव दिखाती हैं। यही तर्क खारे ज्वारीय डेल्टा के मैंग्रोव, जलभराव से अपघटन धीमा होने वाले शीत आर्द्र क्षेत्रों की पीट-दलदल वनस्पति और ऊंचे पर्वतों की अल्पाइन वनस्पति को भी समझाता है। ऊंचाई वहां जलवायु पट्टियों को लंबवत समेट देती है। वनस्पति सीमाएं तीखी रेखाएं नहीं, बल्कि संक्रमण क्षेत्र होती हैं। सूखे क्षेत्र की मौसमी बाढ़ वाली घाटी घास या आर्द्रभूमि पौधों को सहारा दे सकती है। आर्द्र पट्टी की चट्टानी ढाल पर झाड़ी मिल सकती है। बिगड़े हुए वन-किनारे पर परिपक्व छतरी लौटने से पहले बांस, झाड़ियां या द्वितीयक चौड़ी पत्ती वाली वनस्पति उग सकती है। किनारे इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे संक्रमण दिखाते हैं: वनभूमि सवाना में, सवाना कांटेदार झाड़ी में और कांटेदार झाड़ी लगभग निर्जन मरुस्थल में बदलती है। यही दृष्टि मूल वनस्पति और वर्तमान भूमि उपयोग को अलग करती है। पूर्व प्रेयरी पर गेहूं, भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अंगूर की खेती और कांटेदार झाड़ी में चराई पुराने पारिस्थितिक सीमांतों पर चढ़ी आर्थिक परतें हैं। सटीक वर्णन में पौधे का रूप उसके सीमित करने वाले कारक से जुड़ता है: जल, ताप, शीत, लवण, मिट्टी की हवा, ऊंचाई और उस भू-दृश्य का व्यवधान-इतिहास। प्राकृतिक वनस्पति का अध्ययन इन्हीं नियंत्रणों के संयुक्त काम को समझना है।
