मूल औद्योगिक क्षेत्र कैसे बनता है
औद्योगिक क्षेत्र कोई अकेला कारखाना-नगर नहीं होता; यह ऐसा जमाव है जहाँ कई फर्म खनिज, ऊर्जा, श्रम, परिवहन, पूँजी, बाज़ार और आपूर्ति-श्रृंखला साझा करती हैं। भारी उद्योग पहले कोयला क्षेत्रों और लौह अयस्क के पास बढ़े, फिर रेल, नदी और बंदरगाहों के साथ फैल गए। हल्के और आधुनिक उद्योग कुशल श्रम, शोध, हवाई अड्डे, कंटेनर रसद और उपभोक्ता बाज़ार को अधिक महत्व देते हैं। रूर औद्योगिक क्षेत्र राइन तंत्र पर पुराने कोयला-इस्पात मॉडल को दिखाता है, जबकि सिलिकॉन वैली उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्र विश्वविद्यालय, उद्यम-पूँजी और कुशल इंजीनियरों से बने नए औद्योगिक परिदृश्य को दिखाता है। राजस्थान में दिल्ली मार्ग पर भिवाड़ी-नीमराना-खुशखेड़ा पट्टी गलियारा-आधारित जमाव है; उसके पास रॉटरडैम जैसा समुद्री बंदरगाह नहीं, पर दिल्ली और पश्चिमी भारत के बीच सड़क, रेल और बाज़ार पहुँच है। मुख्य नियम संचयी लाभ है। मरम्मत, बिजली, गोदाम, बैंक और कुशल श्रमिक जहाँ जमा होते हैं, नई फर्मों की लागत घटती है। वही मानचित्र तीन परतें रखता है: संसाधन आधार, परिवहन मार्ग और अंतिम उद्योग। कोयला क्षेत्र ईंधन और धातुकर्म से, बंदरगाह क्षेत्र आयात-निर्यात से, और उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्र कुशल श्रम तथा शोध-वित्त से समझे जाते हैं। राजस्थान में सूखा अंतर्देशीय राज्य भी उद्योग खींचता है, जब गलियारा पहुँच, औद्योगिक भूमि और आपूर्तिकर्ता नेटवर्क बाज़ार दूरी घटाते हैं। आगे के सभी उदाहरण इसी मुख्य पैटर्न को खोलते हैं।
