मूल जलवायु दबाव और पेरिस आधार
पर्यावरणीय परिवर्तन तब शुरू होता है जब जलवायु दबाव तापमान, वर्षा, सूखे की आवृत्ति और पारिस्थितिकी तनाव को बदल देता है। पेरिस समझौता, जिसे 2015-12-12 को अपनाया गया, वैश्विक जलवायु नीति का प्रमुख आधार है। यह तापमान-लक्ष्य को राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों के चक्र से जोड़ता है। 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रहने का लक्ष्य और 1.5 डिग्री तक सीमित रखने का प्रयास, पारिस्थितिक परिवर्तन को केवल मौसम-कथा नहीं रहने देते। वे उसे शमन और अनुकूलन से मापने योग्य बनाते हैं।
जलवायु प्रभावों पर आईपीसीसी एआर6 संश्लेषण रिपोर्ट 2023 में अंतिम रूप से आई। यह भौतिक विज्ञान, प्रभाव, अनुकूलन और शमन के निष्कर्षों को साथ रखती है। इसी से स्पष्ट होता है कि ताप-लहर, सूखा, भारी वर्षा और समुद्र-स्तर जोखिम केवल पर्यावरणीय मुद्दे नहीं, बल्कि आर्थिक मुद्दे भी हैं। राजस्थान में यह दबाव पश्चिमी जिलों की अधिक गर्मी, बाड़मेर-जैसलमेर के आसपास चरागाह तनाव और जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में बढ़ती जल-मांग के रूप में दिखाई देता है।
जलवायु दबाव सामान्य पर्यावरणीय अवधारणाओं को भी बदल देता है। कार्बन पदचिह्न उन हरितगृह गैसों को बताता है जो मानव गतिविधि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती हैं। अम्ल वर्षा सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड को मृदा तथा जल रसायन से जोड़ती है। अनवीकरणीय संसाधन जीवाश्म ईंधनों को जैव-भंडार या सूर्य-प्रकाश से अलग करते हैं। कारण-श्रृंखला साफ है: हरितगृह गैसें ऊष्मन बढ़ाती हैं; ऊष्मन आवास, जल और फसल तनाव को बदलता है; प्रतिक्रिया में पेरिस योगदान, राज्य अनुकूलन योजनाएँ, नवीकरणीय ऊर्जा और जल-संरक्षण उपाय आते हैं।
शमन और अनुकूलन को अलग रखना चाहिए। शमन स्वच्छ ऊर्जा, दक्षता और भूमि-उपयोग विकल्पों से भविष्य का दबाव घटाता है। अनुकूलन पहले से तय नुकसान से लोगों, फसलों, जलाशयों और आवासों की रक्षा करता है। पश्चिमी राजस्थान दोनों पक्षों को साथ दिखाता है। नवीकरणीय ऊर्जा उत्सर्जन घटा सकती है, पर उन्हीं शुष्क जिलों को सूखा-योजना, ताप-आश्रय, जल-बजट और चरागाह पारिस्थितिकी की सुरक्षा भी चाहिए। यह दोहरा पाठ जलवायु परिवर्तन को केवल तापमान या केवल आपदा-राहत तक सीमित होने से रोकता है।
