मूल हिंदू मेलों की कैलेंडर रेखा
राजस्थान के सामाजिक जीवन की पहली परत चंद्र कैलेंडर और स्थान से बनती है। पुष्कर मेला कार्तिक पूर्णिमा पर अजमेर में लगता है। यह अजमेर जिला, पुष्कर सरोवर, ब्रह्मा मंदिर क्षेत्र और ऊँट-पशु बाजार को एक साथ रखता है। मेला-सप्ताह कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चलता है। इसी कारण पुष्कर पश्चिमी भारत के सबसे प्रसिद्ध पशु-तीर्थ मेलों में गिना जाता है।
गणगौर चैत्र शुक्ल तृतीया को मेवाड़ और जयपुर का अलग कैलेंडर-संकेत बनाती है। यह होली के बाद शुरू होकर गौरी और ईसर की पूजा से पूरी होती है। इसलिए उदयपुर की झील-शोभायात्रा और जयपुर की नगर-शोभायात्रा चैत्र से जुड़ती हैं, कार्तिक से नहीं। नाथद्वारा इसमें क्षेत्रीय गुलाबी गणगौर रूप जोड़ता है। गणगौर चक्र चैत्र में मनाया जाता है और गुलाबी सजावट, वस्त्र तथा चित्र-भाषा इसे हरि गणगौर और चुनरी गणगौर से अलग करती है।
हरियाली तीज और कजली तीज एक ही हिंदू-उत्सव परिवार में मुख्य मास-भ्रम पैदा करती हैं। हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया और जयपुर से जुड़ती है। कजली तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया और बूंदी से संबंधित है। झालरापाटन में लगने वाला चंद्रभागा मेला, जो झालावाड़ से लगभग 6 किमी दूर है, एक और कार्तिक आधार है। यह चंद्रभागा नदी के तट पर कार्तिक पूर्णिमा के आसपास होता है। इसमें नदी-स्नान ऊँट, घोड़े, गाय, बैल और भैंस वाले पशु मेले से जुड़ता है।
इन उत्सवों में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी भी दिखाई देती है। झूले, गीत, शोभायात्राएँ, सजी प्रतिमाएँ, मेहंदी और विवाहित स्त्रियों की पूजा इनके प्रमुख संकेत हैं। यह पैटर्न केवल भक्ति तक सीमित नहीं है। मेले विनिमय, पशु-व्यापार, शिल्प-बिक्री, वेश-प्रदर्शन और जाति-समुदाय नेटवर्क को भी केंद्रित करते हैं। पुष्कर में मरुस्थलीय पशुपालक, व्यापारी और तीर्थयात्री आते हैं। गणगौर और तीज स्त्री-भागीदारी, विवाह-संकेत और शहरी जुलूसों को सामने लाते हैं। बूंदी की कजली तीज चित्रित द्वारों, राजकीय स्मृति-यात्राओं और स्थानीय बाजारों से हाड़ौती पहचान को जोड़ती है।
साफ कैलेंडर-श्रृंखला है: कार्तिक-पुष्कर और चंद्रभागा, चैत्र-गणगौर, श्रावण-हरियाली तीज और भाद्रपद-कजली तीज। जिला-नामों के साथ यह श्रृंखला पुष्कर को मरु महोत्सव से, गणगौर को करणी माता नवरात्रि से और कजली तीज को जयपुर की श्रावणी तीज से अलग करती है। यही क्रम बाजार-लय भी बताता है। शीत और वर्षा-बाद के मेले पशु-आवागमन को सहारा देते हैं। तीज जैसी वर्षा-ऋतु परंपराएँ हरियाली, झूले और गीतों को आगे लाती हैं। जयपुर और उदयपुर में राजकीय शोभायात्राओं ने ऐतिहासिक ढाँचा दिया, पर गाँवों में घरेलू पूजा, मिट्टी की प्रतिमाएँ और स्त्री-गीत परंपराएँ महलों से बाहर भी जीवित रहीं। राजकीय मार्ग और पड़ोस-स्तर की पूजा का यह मेल राजस्थान की विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान है।
