मूल अठारहवीं सदी का अंतिम राजपूताना — मराठा घुसपैठ, पिंडारी संकट और तुंगा का युद्ध 1787
1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद राजपूताना पर मुगल नियंत्रण का अंतिम प्रभावी ढांचा ढीला पड़ गया और क्षेत्र चलायमान कर-वसूली तथा सैन्य दबाव की राजनीति में प्रवेश कर गया। अठारहवीं सदी के मध्य तक मराठा शक्ति उत्तर की ओर बढ़ी और सिंधिया तथा होल्कर घरानों ने जयपुर, मारवाड़, मेवाड़ और कोटा को लगातार दबाव, सौदेबाज़ी और कर-वसूली के क्षेत्र में बदल दिया। अजमेर और उसके आसपास के मार्ग विशेष रूप से संवेदनशील बने, क्योंकि उन पर नियंत्रण पूर्वी राजस्थान की आवाजाही और वसूली दोनों को प्रभावित करता था। मारवाड़ के महाराजा विजय सिंह, जिनका शासन 1752 से 1793 तक रहा, अपने राज्य की राजस्व रेखाओं को बचाने में लगे रहे, पर भीतर के दरबारी गुट और बाहर की चौथ मांग दोनों उन पर भारी पड़े। महादजी सिंधिया के ग्वालियर केंद्र और तुकोजी होल्कर के इंदौर केंद्र ने राजपूत राज्यों पर एक साथ सैन्य और आर्थिक दबाव बनाया।
इस असुरक्षा को पिंडारियों ने और बढ़ाया। ये तेज़ गति से चलने वाले घुड़सवार लुटेरे अक्सर होल्कर संरक्षण में, या बड़े मराठा अभियानों की छाया में, मेवाड़, मारवाड़ और हाड़ौती के गांवों, अन्न-मार्गों और हल्की चौकियों पर धावा बोलते थे। उनका असर इसलिए गहरा था क्योंकि वे केवल धन नहीं लूटते थे, बल्कि खेती, बाजार और मालगुजारी की नियमितता तोड़ देते थे। जब देहात असुरक्षित हुआ तो राज्यों के लिए चौथ चुकाना, सेना रखना और स्थानीय सरदारों को नियंत्रित करना कठिन हो गया। इसलिए अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों का संकट केवल युद्ध का नहीं, बल्कि राजस्व, गांव और प्रशासन के टूटते संतुलन का संकट था।
इस पूरे दौर का सबसे निर्णायक बिंदु तुंगा का युद्ध, 28 जुलाई 1787 था। जयपुर के सवाई प्रताप सिंह, जिनका शासन 1778 से 1803 तक रहा, ने मारवाड़ के महाराजा विजय सिंह के साथ मिलकर महादजी सिंधिया और उसके फ्रांसीसी प्रशिक्षित सेनापति बेनोइट डी बोइन का सामना किया। आधुनिक दौसा जिले के लालसोट के निकट तुंगा गांव के आसपास लगभग 70,000 की संयुक्त राजपूत सेना ने मराठा पक्ष को सामरिक झटका दिया। यह विजय मराठा शक्ति का अंत नहीं थी, लेकिन इसने तत्काल दबाव रोका और दिखाया कि जयपुर तथा मारवाड़ का संयुक्त प्रतिरोध अभी समाप्त नहीं हुआ है। इसी कारण तुंगा को 1790 के पाटन या मेड़ता से अलग पहचानना आवश्यक है, क्योंकि वे बाद की लड़ाइयां थीं जिनमें डी बोइन ने स्थिति पलट दी।
जयपुर के सवाई प्रताप सिंह केवल युद्धकालीन शासक नहीं थे। उनके समय में गाल्टा चित्रशैली को संरक्षण मिला और 1799 में हवा महल का निर्माण हुआ, जिसे लाल चंद उस्ताद ने रूप दिया। यह स्मारक बताता है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राजनीतिक संकट एक ही समय में साथ-साथ चल रहे थे। 1788 से 1803 के बीच मराठा दबाव से सीमांत क्षेत्रों पर तनाव बना रहा, फिर भी जयपुर दरबार ने शहरी सौंदर्य, चित्रकला और राजकीय प्रतिष्ठा को जीवित रखा। आधुनिक राजस्थान की ओर संक्रमण को समझने के लिए यही द्वंद्व महत्वपूर्ण है।
1793 में विजय सिंह के बाद की उलझनों और 1803 तक बढ़े व्यापक संकट ने मारवाड़ को मान सिंह के शासन की ओर धकेला। मारवाड़ के महाराजा मान सिंह, जिनका शासन 1803 से 1843 तक रहा, उत्तराधिकार विवादों और दरबारी संघर्षों के बीच उभरे। कृष्णा कुमारी प्रसंग 1810 ने इस विघटन को अत्यंत मार्मिक रूप में सामने रखा, जब मेवाड़ की राजकुमारी विवाह-संघर्ष में जयपुर और जोधपुर प्रतिद्वंद्विता के बीच फंस गई और उसकी विष देकर हत्या कर दी गई। उसी समय पिंडारी आक्रमण 1808-1817 ने मेवाड़, मारवाड़ और हाड़ौती में असुरक्षा को और गहरा किया। 1817 तक अनेक राजपूत शासकों को लगने लगा कि ब्रिटिश मध्यस्थता के बिना मराठा-पिंडारी चक्र को रोका नहीं जा सकता। अगला खंड 1817-1818 की उन्हीं संधियों को उठाएगा, जिन्होंने इस युग का अंत किया और राजपूताना को ब्रिटिश सर्वोच्चता के ढांचे में प्रवेश कराया।
