मूल प्रतिहार राजवंश और प्रारंभिक मध्यकालीन राजस्थान (8वीं-10वीं शताब्दी)
बप्पा रावल और गुहिल मेवाड़ इस खंड में 734 की समानांतर राजस्थानी स्मृति के रूप में आते हैं। पर 8वीं शताब्दी के पश्चिमी भारत की बड़ी राजनीतिक रूपरेखा 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद उभरी प्रतिहार शक्ति से बनती है। बाद की परंपराएँ नागभट्ट प्रथम को पश्चिमी सीमांत पर प्रतिरोध से जोड़ती हैं। यह स्मृति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि राजस्थान कोई निष्क्रिय सीमा-प्रदेश नहीं था। मंडोर, जालोर और मारवाड़-मालवा पट्टा उसी क्षेत्र का हिस्सा थे, जहाँ से गुर्जर-प्रतिहार शक्ति फैली। इस राजवंश से राजस्थान को दो आरंभ मिलते हैं। एक रेखा मारवाड़ के मंडोर संबंध को बचाती है। दूसरी रेखा नागभट्ट और उसके उत्तराधिकारियों के साथ उज्जैन से कन्नौज तक जाती है। इसी कारण बाद के राजपूत घराने खाली भूमि से नहीं, बल्कि प्रतिहार प्रभुत्व से बने राजनीतिक संसार के भीतर उभरे।
अगला निर्णायक चरण कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष था। इसमें प्रतिहार, बंगाल के पाल और दक्कन के राष्ट्रकूट आमने-सामने थे। वत्सराज इतना ऊपर उठा कि वह इस प्रतिस्पर्धा का प्रमुख दावेदार बना। लगभग 786 में राष्ट्रकूट ध्रुव ने उसे पराजित किया और प्रतिहार विस्तार कुछ समय के लिए रुक गया। नागभट्ट द्वितीय ने फिर संतुलन पाने का प्रयास किया। पर लगभग 800 के आसपास गोविंद तृतीय के उत्तरी अभियान ने दिखा दिया कि कन्नौज का दावा दक्कनी दबाव से मुक्त नहीं रह सकता। फिर भी यह केवल पराजयों का इतिहास नहीं था। कन्नौज, जिसे पुरानी परंपरा में कन्यकुब्ज भी कहा जाता है, हर्ष के बाद उत्तर भारत की साम्राज्यिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। जब प्रतिहार वहाँ लौटे, तो वे केवल नगर नहीं, बल्कि मध्य गंगा-मैदान और पश्चिमी मार्गों को साथ संगठित करने का अधिकार जता रहे थे।
यह व्यापक दावा मिहिर भोज के समय सबसे स्पष्ट दिखा। उनका काल लगभग 836 से 885 माना जाता है। उनके शासन में कन्नौज अपने युग की सबसे शक्तिशाली उत्तर भारतीय राजसत्ता का केंद्र बना। प्रतिहार प्रभाव राजस्थान, मालवा और गंगा-मैदान को जोड़ने वाले बड़े भूभाग में फैल गया। उनकी आदिवराह मुद्राएँ विशेष महत्त्व रखती हैं। उनमें राजसत्ता, वैष्णव प्रतीक और पश्चिमी भारत की विनिमय-व्यवस्था साथ दिखाई देती है। वराह चिह्न वाली रजत द्रम्म मुद्राएँ केवल राजभक्ति का संकेत नहीं थीं। वे उस राजनीतिक अर्थव्यवस्था का चिह्न थीं जिसमें राजपूताना के व्यापारी, मंदिर-केंद्र और सैन्य कुलीन प्रतिहार प्रतिष्ठा को पहचानते थे। राजस्थान में यह स्मृति किसी एक राजधानी में बंद नहीं रही। मंडोर मारवाड़ के आधार-क्षेत्र को याद दिलाता है। ओसियां उसी प्रारंभिक मध्यकालीन स्थापत्य संसार को अपने मंदिर समूहों में सुरक्षित रखता है।
राजस्थान का प्रमाण मूर्त रूप में भी मिलता है। जोधपुर के उत्तर में स्थित ओसियां 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच के हिंदू और जैन स्मारकों का समूह है। महावीर मंदिर को अभिलेखीय प्रमाण वत्सराज के शासन से जोड़ते हैं। ओसियां का सूर्य मंदिर और दौसा जिले के आभानेरी का हर्षत माता मंदिर उसी व्यापक प्रतिहार-कालीन कलात्मक वातावरण का हिस्सा हैं। पश्चिमी और पूर्वी राजस्थान, दोनों में विकसित मंदिर-रूप दिखाई देते हैं। इसलिए प्रतिहार इतिहास को केवल कन्नौज दरबार तक सीमित नहीं किया जा सकता। इस राजवंश ने सीमांत प्रतिरोध, दूरगामी राजनीति और मंदिर संरक्षण को एक सूत्र में जोड़ा। साथ ही सावधानी भी आवश्यक है: बप्पा रावल से जुड़ा 734 मेवाड़ की प्रभावशाली उत्पत्ति-स्मृति है, पर उसकी दंतकथात्मक प्रकृति बाद के युद्धों और अभिलेखों की अपेक्षाकृत दृढ़ तिथियों से अलग है।
उत्कर्ष के बाद क्षरण शुरू हुआ। महिपाल, जिनका समय सामान्यतः 913 से 944 के बीच रखा जाता है, ने प्रतिष्ठा तो पाई, पर वैसा नियंत्रण नहीं पाया। 916 में राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस आघात ने दिखा दिया कि प्रतिहार साम्राज्य अस्थिर सामंत-निष्ठा पर बहुत निर्भर हो चुका था। 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक शाकम्भरी के चौहान, मेवाड़ के गुहिल, मालवा के परमार, बुंदेलखंड के चंदेल और दिल्ली के तोमर अधिक खुलकर उभरने लगे। अंतिम आघात उत्तर-पश्चिम से आया। महमूद ग़ज़नवी के 1018 और 1019 के अभियानों ने पुराने ढाँचे को तोड़ दिया। फिर भी प्रतिहार उपलब्धि समाप्त नहीं हुई। वह राजस्थान में राजनीतिक मिसाल, मंदिर-कला, मुद्रा-स्मृति और उस क्षेत्रीय आधार के रूप में जीवित रही, जहाँ से बाद के राजपूत राजवंश ऊपर उठे।
