मुख्य बिंदु

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    गुर्जर-प्रतिहारों ने सीमांत रक्षा, साम्राज्यिक राजनीति और मंदिर संरक्षण के माध्यम से राजस्थान, मालवा और कन्नौज को जोड़ा।

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    मिहिर भोज की आदिवराह मुद्राओं ने प्रतिहार राजसत्ता को वैष्णव प्रतीक और पश्चिमी भारत की विनिमय-व्यवस्था से जोड़ा।

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    बप्पा रावल गुहिल मेवाड़ की दंतकथा-समृद्ध संस्थापक स्मृति हैं, जबकि हम्मीर सिंह ने चित्तौड़ वापस लेकर टिकाऊ सिसोदिया सत्ता शुरू की।

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    चौहान शाकम्भरी-सांभर से अजमेर आए, जहां तारागढ़, आनासागर और अजमेर-दिल्ली धुरी ने उनकी शक्ति को आकार दिया।

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    पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 में तराईन पर मुहम्मद गोरी को हराया, पर 1192 की निर्णायक हार ने अजमेर-दिल्ली ढाल तोड़ दी।

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    राणा कुम्भा ने पंद्रहवीं शताब्दी के मेवाड़ को दुर्गों, विजय स्मारकों, संगीत-विद्या और मंदिर संरक्षण का केंद्र बनाया।

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    राव जोधा ने 1459 में जोधपुर और मेहरानगढ़ की स्थापना कर मारवाड़ की राठौड़ राजधानी को मंडोर से मजबूत पहाड़ी आसन पर पहुंचाया।

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    मराठा दबाव और पिंडारी असुरक्षा के बाद 1818 की संधियों ने प्रमुख राजपूताना राज्यों को ब्रिटिश सर्वोच्चता में ला दिया।

प्रतिहार राजवंश और प्रारंभिक मध्यकालीन राजस्थान (8वीं-10वीं शताब्दी)

बप्पा रावल और गुहिल मेवाड़ इस खंड में 734 की समानांतर राजस्थानी स्मृति के रूप में आते हैं। पर 8वीं शताब्दी के पश्चिमी भारत की बड़ी राजनीतिक रूपरेखा 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद उभरी प्रतिहार शक्ति से बनती है। बाद की परंपराएँ नागभट्ट प्रथम को पश्चिमी सीमांत पर प्रतिरोध से जोड़ती हैं। यह स्मृति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि राजस्थान कोई निष्क्रिय सीमा-प्रदेश नहीं था। मंडोर, जालोर और मारवाड़-मालवा पट्टा उसी क्षेत्र का हिस्सा थे, जहाँ से गुर्जर-प्रतिहार शक्ति फैली। इस राजवंश से राजस्थान को दो आरंभ मिलते हैं। एक रेखा मारवाड़ के मंडोर संबंध को बचाती है। दूसरी रेखा नागभट्ट और उसके उत्तराधिकारियों के साथ उज्जैन से कन्नौज तक जाती है। इसी कारण बाद के राजपूत घराने खाली भूमि से नहीं, बल्कि प्रतिहार प्रभुत्व से बने राजनीतिक संसार के भीतर उभरे।

अगला निर्णायक चरण कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष था। इसमें प्रतिहार, बंगाल के पाल और दक्कन के राष्ट्रकूट आमने-सामने थे। वत्सराज इतना ऊपर उठा कि वह इस प्रतिस्पर्धा का प्रमुख दावेदार बना। लगभग 786 में राष्ट्रकूट ध्रुव ने उसे पराजित किया और प्रतिहार विस्तार कुछ समय के लिए रुक गया। नागभट्ट द्वितीय ने फिर संतुलन पाने का प्रयास किया। पर लगभग 800 के आसपास गोविंद तृतीय के उत्तरी अभियान ने दिखा दिया कि कन्नौज का दावा दक्कनी दबाव से मुक्त नहीं रह सकता। फिर भी यह केवल पराजयों का इतिहास नहीं था। कन्नौज, जिसे पुरानी परंपरा में कन्यकुब्ज भी कहा जाता है, हर्ष के बाद उत्तर भारत की साम्राज्यिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। जब प्रतिहार वहाँ लौटे, तो वे केवल नगर नहीं, बल्कि मध्य गंगा-मैदान और पश्चिमी मार्गों को साथ संगठित करने का अधिकार जता रहे थे।

यह व्यापक दावा मिहिर भोज के समय सबसे स्पष्ट दिखा। उनका काल लगभग 836 से 885 माना जाता है। उनके शासन में कन्नौज अपने युग की सबसे शक्तिशाली उत्तर भारतीय राजसत्ता का केंद्र बना। प्रतिहार प्रभाव राजस्थान, मालवा और गंगा-मैदान को जोड़ने वाले बड़े भूभाग में फैल गया। उनकी आदिवराह मुद्राएँ विशेष महत्त्व रखती हैं। उनमें राजसत्ता, वैष्णव प्रतीक और पश्चिमी भारत की विनिमय-व्यवस्था साथ दिखाई देती है। वराह चिह्न वाली रजत द्रम्म मुद्राएँ केवल राजभक्ति का संकेत नहीं थीं। वे उस राजनीतिक अर्थव्यवस्था का चिह्न थीं जिसमें राजपूताना के व्यापारी, मंदिर-केंद्र और सैन्य कुलीन प्रतिहार प्रतिष्ठा को पहचानते थे। राजस्थान में यह स्मृति किसी एक राजधानी में बंद नहीं रही। मंडोर मारवाड़ के आधार-क्षेत्र को याद दिलाता है। ओसियां उसी प्रारंभिक मध्यकालीन स्थापत्य संसार को अपने मंदिर समूहों में सुरक्षित रखता है।

राजस्थान का प्रमाण मूर्त रूप में भी मिलता है। जोधपुर के उत्तर में स्थित ओसियां 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच के हिंदू और जैन स्मारकों का समूह है। महावीर मंदिर को अभिलेखीय प्रमाण वत्सराज के शासन से जोड़ते हैं। ओसियां का सूर्य मंदिर और दौसा जिले के आभानेरी का हर्षत माता मंदिर उसी व्यापक प्रतिहार-कालीन कलात्मक वातावरण का हिस्सा हैं। पश्चिमी और पूर्वी राजस्थान, दोनों में विकसित मंदिर-रूप दिखाई देते हैं। इसलिए प्रतिहार इतिहास को केवल कन्नौज दरबार तक सीमित नहीं किया जा सकता। इस राजवंश ने सीमांत प्रतिरोध, दूरगामी राजनीति और मंदिर संरक्षण को एक सूत्र में जोड़ा। साथ ही सावधानी भी आवश्यक है: बप्पा रावल से जुड़ा 734 मेवाड़ की प्रभावशाली उत्पत्ति-स्मृति है, पर उसकी दंतकथात्मक प्रकृति बाद के युद्धों और अभिलेखों की अपेक्षाकृत दृढ़ तिथियों से अलग है।

उत्कर्ष के बाद क्षरण शुरू हुआ। महिपाल, जिनका समय सामान्यतः 913 से 944 के बीच रखा जाता है, ने प्रतिष्ठा तो पाई, पर वैसा नियंत्रण नहीं पाया। 916 में राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस आघात ने दिखा दिया कि प्रतिहार साम्राज्य अस्थिर सामंत-निष्ठा पर बहुत निर्भर हो चुका था। 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक शाकम्भरी के चौहान, मेवाड़ के गुहिल, मालवा के परमार, बुंदेलखंड के चंदेल और दिल्ली के तोमर अधिक खुलकर उभरने लगे। अंतिम आघात उत्तर-पश्चिम से आया। महमूद ग़ज़नवी के 1018 और 1019 के अभियानों ने पुराने ढाँचे को तोड़ दिया। फिर भी प्रतिहार उपलब्धि समाप्त नहीं हुई। वह राजस्थान में राजनीतिक मिसाल, मंदिर-कला, मुद्रा-स्मृति और उस क्षेत्रीय आधार के रूप में जीवित रही, जहाँ से बाद के राजपूत राजवंश ऊपर उठे।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 MCQ निम्नलिखित घटनाओं को सही कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: सिंध पर अरब अधिकार; मेवाड़ में बप्पा रावल की परंपरा; राष्ट्रकूट ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय; मिहिर भोज का राज्यारोहण।
  1. A सिंध पर अरब अधिकार -> मेवाड़ में बप्पा रावल की परंपरा -> ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय -> मिहिर भोज का राज्यारोहण सही उत्तर
  2. B मेवाड़ में बप्पा रावल की परंपरा -> सिंध पर अरब अधिकार -> मिहिर भोज का राज्यारोहण -> ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय
  3. C सिंध पर अरब अधिकार -> ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय -> मेवाड़ में बप्पा रावल की परंपरा -> मिहिर भोज का राज्यारोहण
  4. D मिहिर भोज का राज्यारोहण -> ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय -> सिंध पर अरब अधिकार -> मेवाड़ में बप्पा रावल की परंपरा

व्याख्या

सही क्रम 712, 734, 786 और 836 है। सिंध पर अरब अधिकार 712 में हुआ, बप्पा रावल और आरंभिक गुहिल मेवाड़ की परंपरा 734 से जोड़ी जाती है, ध्रुव राष्ट्रकूट द्वारा वत्सराज की पराजय लगभग 786 में मानी जाती है, और मिहिर भोज का राज्यारोहण लगभग 836 में रखा जाता है। विकल्प ख आकर्षक लग सकता है क्योंकि राजस्थान की कथात्मक स्मृति में बप्पा रावल पहले उभरते हैं, लेकिन सिंध की घटना उनसे पहले की है। विकल्प ग भी भ्रामक है क्योंकि वह 786 को 734 से पहले रख देता है और मेवाड़ की प्रारंभिक धारा को बाद के कन्नौज संघर्ष में मिला देता है।