मूल भाषा-मानचित्र और मौखिक स्मृति
राजस्थान की भाषा-परंपरा एक ही दरबारी भाषा से नहीं बनी। इसकी शुरुआत क्षेत्रीय भाषिक समूहों से होती है। ब्रिटानिका राजस्थानी भाषाओं को राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में बोली जाने वाली इंडो-आर्य भाषाएँ और बोलियाँ बताती है। इनके चार प्रमुख समूह माने जाते हैं: उत्तर-पूर्व में मेवाती, दक्षिण में मालवी, पश्चिम में मारवाड़ी और पूर्व-मध्य भाग में जयपुरी या ढूंढाड़ी। यह भाषा-मानचित्र इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बोली-नाम, जिले और साहित्यिक रूप राजस्थान के स्रोतों में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
मारवाड़ी जोधपुर, बीकानेर और पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्रों से जुड़ती है। मेवाड़ी उदयपुर-चित्तौड़गढ़ की ऐतिहासिक आवाज देती है। ढूंढाड़ी जयपुर और उसके आसपास के मैदानों की बोली है। हाड़ौती कोटा-बूंदी-झालावाड़ क्षेत्र से संबद्ध है। मेवाती अलवर-भरतपुर को पुराने मेवात सांस्कृतिक क्षेत्र से जोड़ती है। दैनिक धार्मिक जीवन में यही बोलियाँ भजन, लोकगाथा, कथा, कहावत और पहेली को जीवित रखती हैं।
उद्योतनसूरि की कुवलयमाला इस भाषा-इतिहास का आरंभिक पाठ-आधार देती है। राजरास इसे 8वीं सदी से जोड़ता है और 18 देशी भाषाओं, जिनमें मरु भाषा-स्मृति भी है, का उल्लेख बताता है। आड़ी और हियाली राजस्थानी लोकसाहित्य की पहेली-शब्दावली में आती हैं। इसलिए पहेली, कहावत और मुहावरे गीत और कथा के साथ पढ़े जाते हैं। राजस्थानी भाषा संस्थाएँ शिक्षण, शोध, प्रकाशन और संरक्षण के माध्यम से साहित्य को आगे बढ़ाती हैं। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से पहचानी जाती है।
बोरूंदा और रूपायन से जुड़े विजयदान देथा जैसे आधुनिक लेखक बताते हैं कि भाषा-कथा लोक आख्यान, मुद्रित साहित्य, रंगमंच और पुरस्कारों तक चलती है। डिंगल और पिंगल परंपराएँ भी इसी भाषा-मानचित्र का हिस्सा हैं। डिंगल पश्चिमी राजस्थान का वीर और युद्धात्मक स्वर देता है, जबकि पिंगल अधिक परिष्कृत काव्य-प्रयोग से जुड़ता है। बाड़मेर-जैसलमेर के मांगणियार जैसे मौखिक कलाकार वंशावली, युद्ध-कथा और भक्ति-गीत को पांडुलिपियों से बाहर जीवित रखते हैं।
इस प्रकार भाषा, साहित्य और धार्मिक जीवन एक ही सांस्कृतिक प्रणाली बनाते हैं। व्यापार-मार्ग, तीर्थ-परिक्रमा और दरबारी क्षेत्र भाषिक क्षेत्रों से मिलते हैं। इसलिए एक ही शब्द भाषिक, साहित्यिक और सामाजिक अर्थ रख सकता है। बाड़मेर-जैसलमेर की गीत-परंपरा, बीकानेर का प्रकाशन कार्य और जयपुर-ढूंढाड़ की बोली-स्मृति पांडुलिपियों से बाहर भी इस मानचित्र को जीवित रखती है। इसी से समझ में आता है कि राजस्थान की कला-संस्कृति को लिखित और मौखिक खानों में अलग-अलग नहीं बाँटा जा सकता। दरबारी कविता, लोकगीत, संत-वाणी, वंशावली और त्योहार-प्रदर्शन समान भाषिक समुदायों में चलते हैं और कई सदियों तक राजनीतिक तथा धार्मिक स्मृति को सँभालते हैं।
