मूल पत्थर से पहले वंश-सूत्र
राजस्थान का स्थापत्य पहले वंशों से शुरू होता है, फिर दुर्ग-द्वार तक पहुंचता है। बप्पा रावल और प्रारंभिक गुहिल मेवाड़ 734 की उस मूल-स्मृति से जुड़ता है जिससे चित्तौड़ और आगे की सिसोदिया शक्ति को प्रारंभिक ढांचा मिला। एकलिंगजी-गुहिल संबंध मेवाड़ में धार्मिक वैधता, राजवंश और चित्तौड़ नियंत्रण को साथ समझाता है। मेवाड़ के राणा कुम्भा 1433-1468 के दौर में इसी ढांचे को दुर्ग, संगीत, मंदिर-नवीनीकरण और विजय स्थापत्य में बदलते हैं; उनका नाम चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, कुम्भा श्याम और विजय स्तम्भ से जुड़ता है। मेवाड़ के राणा सांगा 1508-1528 और खानवा से जुड़े हैं, जहां राजपूत संघ उत्तर भारत की राजनीति से टकराता है। मारवाड़ में मारवाड़ के राव जोधा 1459 में मंडोर से जोधपुर की ओर राठौड़ सत्ता को ले जाते हैं, और मारवाड़ के राव मालदेव 1531-1562 में सम्मेल के युद्ध से पहले मारवाड़ की शक्ति को फैलाते हैं। बीकानेर में राय सिंह और आमेर-जयपुर में कछवाहा शासन इसी मानचित्र की अन्य रेखाएं हैं। इसलिए शासक, राजधानी, दुर्ग, मंदिर और युद्ध-स्मृति को एक ही श्रृंखला में रखना पड़ता है। यही क्रम बप्पा रावल को मूल-स्मृति, राणा कुम्भा को निर्माण, राणा सांगा को संघ-राजनीति, राव जोधा को राजधानी और सवाई जय सिंह द्वितीय को नगर-योजना से अलग जोड़ता है। क्षेत्रीय पहचान भी अलग रहती है: मेवाड़ अरावली, मारवाड़ मरु-शक्ति, बीकानेर समतल दुर्ग और कछवाहा आमेर-जयपुर योजना से जुड़ते हैं।
